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हंस अवतार की कथा – ब्रह्मा को ज्ञान की प्राप्ति
बहुत समय पहले की बात है, जब सृष्टि का आरंभ हो रहा था। भगवान विष्णु अपने शेषनाग पर योगनिद्रा में लीन थे। उनकी नाभि से एक सुंदर कमल निकला, जिस पर चतुर्मुख ब्रह्मा जी का जन्म हुआ।
ब्रह्मा जी जब पहली बार जागे तो वे चारों ओर देखने लगे। उन्हें केवल अंधकार और जल ही दिखाई दे रहा था। वे सोचने लगे – “मैं कौन हूं? मैं कहां से आया हूं? इस संसार का निर्माता कौन है?”
ब्रह्मा जी ने अपने चारों मुखों से चारों दिशाओं में देखा, परंतु उन्हें कुछ भी समझ नहीं आया। वे अपने जन्म के रहस्य को जानने के लिए उत्सुक हो गए। उन्होंने कमल के डंठल के सहारे नीचे जाने का निश्चय किया।
हजारों वर्षों तक ब्रह्मा जी कमल के डंठल के सहारे नीचे की ओर जाते रहे, परंतु उन्हें कमल की जड़ नहीं मिली। थक-हारकर वे वापस ऊपर आ गए और गहरे चिंतन में डूब गए।
तभी आकाश में एक दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। उस प्रकाश से एक सुंदर हंस प्रकट हुआ। यह कोई साधारण हंस नहीं था, बल्कि स्वयं भगवान विष्णु का हंस अवतार था।
हंस अवतार में भगवान विष्णु का तेज अद्भुत था। उनके पंख मोतियों की तरह चमक रहे थे और उनकी आंखों में करुणा और ज्ञान की गहराई थी। ब्रह्मा जी ने हंस को देखकर पूछा – “हे सुंदर हंस! आप कौन हैं? क्या आप मेरे प्रश्नों का उत्तर दे सकते हैं?”
हंस अवतार ने मधुर स्वर में कहा – “हे ब्रह्मा! मैं तुम्हारे सभी प्रश्नों का उत्तर दूंगा। परंतु पहले तुम मेरी बात ध्यान से सुनो।”
हंस अवतार की कथा सुनाते हुए भगवान विष्णु बोले – “मैं ही इस संपूर्ण सृष्टि का आधार हूं। मैं ही काल हूं, मैं ही महाकाल हूं। तुम मेरी नाभि से उत्पन्न हुए हो, इसलिए तुम मेरे पुत्र हो।”
ब्रह्मा जी को यह बात समझ नहीं आई। वे बोले – “यदि आप सच कह रहे हैं तो मुझे अपना वास्तविक रूप दिखाइए।”
तब हंस अवतार ने अपना दिव्य रूप प्रकट किया। अचानक चारों ओर अद्भुत प्रकाश फैल गया। ब्रह्मा जी ने देखा कि हंस का रूप बदलकर चतुर्भुज भगवान विष्णु का हो गया। उनके हाथों में शंख, चक्र, गदा और पद्म शोभायमान थे।
भगवान विष्णु ने कहा – “हे ब्रह्मा! अब तुम्हें सृष्टि का निर्माण करना है। मैं तुम्हें वह ज्ञान दूंगा जिससे तुम इस कार्य को पूरा कर सकोगे।”
हंस अवतार की कथा में भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को वेदों का ज्ञान दिया। उन्होंने बताया कि कैसे पंच महाभूतों – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से सृष्टि का निर्माण करना है।
“सबसे पहले तुम मन से संकल्प करो,” हंस अवतार ने समझाया। “फिर उस संकल्प को शब्द का रूप दो। शब्द से स्पर्श, स्पर्श से रूप, रूप से रस और रस से गंध की उत्पत्ति होगी।”
ब्रह्मा जी ने पूछा – “प्रभु, मैं सृष्टि का निर्माण तो कर दूंगा, परंतु जीवों में चेतना कैसे आएगी?”
हंस अवतार मुस्कराए और बोले – “हे ब्रह्मा! जीवात्मा मेरा ही अंश है। जब तुम शरीर का निर्माण करोगे, तो मैं उसमें चेतना का संचार कर दूंगा। इस प्रकार जीव और जगत दोनों का निर्माण होगा।”
हंस अवतार की कथा में एक और महत्वपूर्ण शिक्षा छुपी थी। भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को बताया – “जैसे हंस दूध और पानी को अलग कर देता है, वैसे ही तुम्हें भी सत्य और असत्य में भेद करना सिखाना होगा।”
ब्रह्मा जी ने विनम्रता से पूछा – “प्रभु, यदि मुझसे कोई त्रुटि हो जाए तो?”
“चिंता मत करो,” हंस अवतार ने आश्वासन दिया। “मैं सदैव तुम्हारे साथ हूं। जब भी आवश्यकता होगी, मैं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करूंगा।”
इसके बाद हंस अवतार ने ब्रह्मा जी को ध्यान और तपस्या की विधि सिखाई। उन्होंने बताया कि कैसे मंत्रों के द्वारा सृष्टि की शक्तियों को नियंत्रित किया जा सकता है।
हंस अवतार की कथा का सबसे महत्वपूर्ण भाग तब आया जब भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को गायत्री मंत्र का ज्ञान दिया। उन्होंने कहा – “यह मंत्र सभी मंत्रों की जननी है। इससे तुम्हें सृष्टि के निर्माण में सहायता मिलेगी।”
ब्रह्मा जी ने गायत्री मंत्र का जाप करना शुरू किया। मंत्र की शक्ति से उनके मन में स्पष्टता आई और वे सृष्टि के रहस्यों को समझने लगे।
हंस अवतार ने अंत में कहा – “हे ब्रह्मा! अब तुम्हारा कार्य शुरू होता है। तुम चारों वेदों को प्रकट करो – ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद। ये वेद मानव जाति के लिए ज्ञान के स्रोत बनेंगे।”
ब्रह्मा जी ने अपने चार मुखों से चारों वेदों का उच्चारण किया। वेदों की ध्वनि से संपूर्ण ब्रह्मांड गूंज उठा। इस प्रकार ज्ञान का प्रकाश फैलने लगा।
हंस अवतार की कथा में भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी को यह भी बताया कि सृष्टि में संतुलन कैसे बनाए रखना है। उन्होंने कहा – “जब भी अधर्म बढ़ेगा, मैं अवतार लेकर धर्म की स्थापना करूंगा।”
ब्रह्मा जी को पूर्ण ज्ञान प्राप्त हो गया। वे समझ गए कि वे भगवान विष्णु के पुत्र हैं और उनका कार्य सृष्टि का निर्माण करना है। उन्होंने हंस अवतार को प्रणाम किया और कहा – “प्रभु, आपकी कृपा से मुझे सब कुछ समझ आ गया है।”
हंस अवतार मुस्कराए और धीरे-धीरे अंतर्ध्यान हो गए। परंतु उनका आशीर्वाद ब्रह्मा जी के साथ रह गया।
इसके बाद ब्रह्मा जी ने सृष्टि का निर्माण शुरू किया। उन्होंने सबसे पहले सप्त ऋषियों का निर्माण किया, फिर देवताओं, मनुष्यों, पशु-पक्षियों और वनस्पतियों का।
हंस अवतार की कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि ज्ञान ही सबसे बड़ी शक्ति है। भगवान विष्णु ने हंस का रूप धारण करके ब्रह्मा जी को वह ज्ञान दिया जिससे संपूर्ण सृष्टि का निर्माण संभव हुआ।
हंस अवतार की कथा यह भी सिखाती है कि गुरु का महत्व कितना अधिक है। जैसे भगवान विष्णु ने ब्रह्मा जी के गुरु बनकर उन्हें ज्ञान दिया, वैसे ही हमें भी अपने गुरुओं का सम्मान करना चाहिए।
आज भी जब हम हंस को देखते हैं तो हमें भगवान विष्णु के इस अवतार की याद आती है। हंस की तरह हमें भी सत्य और असत्य में भेद करना सीखना चाहिए।
इस प्रकार हंस अवतार की कथा – ब्रह्मा को ज्ञान की यह पावन गाथा समाप्त होती है, जो हमें सिखाती है कि ज्ञान, भक्ति और गुरु की कृपा से कोई भी कार्य असंभव नहीं है।












