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शिव के गणों की अद्भुत कथाएं – नंदी और भृंगी की वीरता

बहुत समय पहले की बात है, जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव अपने गणों के साथ निवास करते थे। शिव के गणों की कथाएं आज भी लोगों के मन में श्रद्धा और भक्ति जगाती हैं। इन गणों में सबसे प्रमुख थे नंदी और भृंगी, जो अपनी अटूट भक्ति और वीरता के लिए प्रसिद्ध थे।

एक दिन की बात है, जब भगवान शिव गहरे ध्यान में लीन थे। उनके चारों ओर उनके प्रिय गण बैठे हुए थे। नंदी जी शिवजी के द्वार पर पहरा दे रहे थे, जबकि भृंगी जी उनकी सेवा में तत्पर थे। अचानक आकाश में एक तेज़ प्रकाश चमका और एक असुर राजा प्रकट हुआ।

“मैं महाबली असुर हूँ!” उसने गर्जना की। “मैंने तीनों लोकों को जीत लिया है। अब मैं शिव से युद्ध करना चाहता हूँ। उन्हें जगाओ!”

नंदी जी ने शांत स्वर में कहा, “हे असुर राज! भगवान शिव इस समय ध्यान में हैं। तुम वापस जाओ और बाद में आना।”

“नहीं!” असुर चिल्लाया। “मैं अभी युद्ध चाहता हूँ। अगर तुम मेरा रास्ता नहीं छोड़ोगे तो पहले तुमसे युद्ध करूंगा।”

यह सुनकर भृंगी जी भी नंदी के पास आ गए। दोनों गणों ने एक-दूसरे की ओर देखा और मन ही मन निश्चय कर लिया कि वे अपने स्वामी की निद्रा भंग नहीं होने देंगे।

“ठीक है असुर राज,” नंदी जी ने कहा। “पहले हमसे युद्ध करो। अगर तुम हमें हरा दोगे, तभी शिवजी तक पहुँच सकोगे।”

असुर ने अपनी तलवार निकाली और नंदी पर आक्रमण कर दिया। नंदी जी ने अपने सींगों से उसका वार रोका। शिव के गणों की कथाएं बताती हैं कि नंदी की शक्ति अपार थी। वे असुर के हर वार को आसानी से रोक रहे थे।

इधर भृंगी जी ने अपना त्रिशूल उठाया और असुर पर प्रहार किया। भृंगी की गति इतनी तेज़ थी कि असुर को समझ ही नहीं आ रहा था कि वार कहाँ से आ रहा है।

युद्ध देखकर अन्य गण भी एकत्रित हो गए। गणेश जी के मूषक, कार्तिकेय के मयूर, और अन्य दिव्य गण सभी अपने स्वामी की रक्षा के लिए तैयार हो गए। शिव के गणों की कथाएं में इस एकजुटता का विशेष महत्व है।

असुर ने देखा कि वह अकेला है और सामने पूरी गण सेना खड़ी है। फिर भी उसने हार नहीं मानी। उसने अपनी माया का प्रयोग करके हज़ारों असुरों की सेना बना ली।

“अब देखते हैं तुम्हारी वीरता!” असुर ने कहा।

नंदी जी ने भृंगी से कहा, “मित्र, हमें अपनी पूरी शक्ति का प्रयोग करना होगा। शिवजी का ध्यान भंग नहीं होना चाहिए।”

भृंगी जी ने सिर हिलाया और दोनों ने मिलकर एक दिव्य मंत्र का जाप किया। अचानक उनके शरीर से तेज़ प्रकाश निकलने लगा। यह प्रकाश इतना तीव्र था कि असुर की माया टूट गई और उसकी नकली सेना गायब हो गई।

“यह कैसे संभव है?” असुर चिल्लाया।

“यही है शिव के गणों की कथाएं की सच्चाई,” नंदी जी ने समझाया। “हमारी शक्ति भगवान शिव की भक्ति से आती है। जब तक हमारे हृदय में शिव भक्ति है, कोई भी शक्ति हमें हरा नहीं सकती।”

भृंगी जी ने आगे कहा, “हे असुर राज! तुम्हारी शक्ति केवल अहंकार पर आधारित है, जबकि हमारी शक्ति प्रेम और भक्ति पर टिकी है। इसीलिए हम अजेय हैं।”

असुर को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने देखा कि ये गण केवल अपनी रक्षा नहीं कर रहे, बल्कि अपने स्वामी के प्रति अपना कर्तव्य निभा रहे हैं।

“मुझे क्षमा करें,” असुर ने कहा। “मैं समझ गया हूँ कि सच्ची शक्ति भक्ति में है, अहंकार में नहीं। क्या आप मुझे भी शिव भक्त बनने का मार्ग दिखाएंगे?”

नंदी और भृंगी दोनों मुस्कराए। उन्होंने असुर को शिव मंत्र सिखाया और भक्ति का मार्ग दिखाया। शिव के गणों की कथाएं हमें यही सिखाती हैं कि सच्ची वीरता दूसरों को हराने में नहीं, बल्कि उन्हें सही राह दिखाने में है।

जब भगवान शिव का ध्यान पूरा हुआ, तो उन्होंने देखा कि उनके गण एक नए भक्त को मंत्र सिखा रहे हैं। शिवजी बहुत प्रसन्न हुए।

“मेरे प्रिय गणों,” शिवजी ने कहा, “तुमने न केवल मेरी रक्षा की, बल्कि एक शत्रु को मित्र भी बनाया। यही है सच्ची वीरता।”

उस दिन के बाद से वह असुर भी शिव का भक्त बन गया और कैलाश पर्वत पर अन्य गणों के साथ सेवा करने लगा। शिव के गणों की कथाएं हमें सिखाती हैं कि प्रेम और भक्ति की शक्ति से हम किसी भी कठिनाई का सामना कर सकते हैं और शत्रुओं को भी मित्र बना सकते हैं।

इस प्रकार नंदी और भृंगी की वीरता और भक्ति की यह कथा आज भी हमें प्रेरणा देती है कि सच्ची शक्ति हिंसा में नहीं, बल्कि प्रेम और करुणा में निहित है।

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