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विद्या क्यों नष्ट हो गयी? बेताल पच्चीसी अठारहवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।

“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।

विक्रम मौन रहकर आगे बढ़ते रहे। बेताल ने अपनी कहानी आरंभ की।

“प्राचीन काल में मगध देश में एक प्रसिद्ध विद्वान् ब्राह्मण रहता था, जिसका नाम विद्यानंद था।” बेताल ने कहा। “उसके पास अनमोल ग्रंथ और दुर्लभ विद्याएं थीं। उसके तीन पुत्र थे – ज्ञानदेव, विद्यादेव और धर्मदेव।”

विद्यानंद अपने जीवन के अंतिम दिनों में चिंतित था कि उसकी विद्या का क्या होगा। उसने अपने तीनों पुत्रों को बुलाया और कहा, “पुत्रों! मेरे पास तीन अमूल्य ग्रंथ हैं। पहला है ‘सर्वविद्या संग्रह’, दूसरा है ‘धर्मशास्त्र रत्न’ और तीसरा है ‘राजनीति चंद्रिका’।”

पिता ने आगे कहा, “ज्ञानदेव! तुम सबसे बड़े हो, तुम्हें ‘सर्वविद्या संग्रह’ मिलेगा। विद्यादेव! तुम्हें ‘धर्मशास्त्र रत्न’ और धर्मदेव! तुम्हें ‘राजनीति चंद्रिका’ प्राप्त होगी।”

पिता की मृत्यु के बाद तीनों भाइयों में विभाजन हुआ। ज्ञानदेव को लगा कि उसे सबसे महत्वपूर्ण ग्रंथ मिला है। वह अहंकार में डूब गया और दूसरों को हीन समझने लगा।

विद्यादेव धर्म के नाम पर कट्टर बन गया। वह केवल अपने धर्मशास्त्र को ही सत्य मानता था और दूसरे मतों का विरोध करता था।

धर्मदेव राजनीति की चालबाजी में फंस गया। वह केवल सत्ता और धन के लिए अपनी विद्या का दुरुपयोग करने लगा।

समय बीतने के साथ तीनों भाइयों में शत्रुता बढ़ती गई। ज्ञानदेव ने अपने अहंकार के कारण शिष्यों को ठीक से नहीं सिखाया। विद्यादेव ने धर्म के नाम पर लोगों में फूट डाली। धर्मदेव ने राजनीति में भ्रष्टाचार को बढ़ावा दिया।

“एक दिन तीनों भाइयों के बीच भयंकर विवाद हुआ।” बेताल ने आगे कहा। “ज्ञानदेव ने क्रोध में आकर अपना ग्रंथ जला दिया और कहा, ‘यदि मेरी विद्या का सम्मान नहीं, तो यह नष्ट हो जाए।'”

विद्यादेव ने भी अपना ग्रंथ नदी में फेंक दिया और कहा, “जब धर्म का पतन हो रहा है, तो इस शास्त्र की क्या आवश्यकता।”

धर्मदेव ने अपना ग्रंथ चोरों को बेच दिया और कहा, “राजनीति तो धन कमाने का साधन है।”

इस प्रकार तीनों अमूल्य ग्रंथ नष्ट हो गए। गांव के लोग दुखी हुए क्योंकि उनके गुरु की अनमोल विद्या समाप्त हो गई।

एक बुजुर्ग व्यक्ति ने तीनों भाइयों से कहा, “तुमने अपने पिता की विद्या को नष्ट कर दिया। अब तुम्हारे पास क्या बचा है?”

तीनों भाइयों को अपनी गलती का एहसास हुआ, लेकिन अब बहुत देर हो चुकी थी।

बेताल ने कहानी समाप्त करके पूछा, “राजा विक्रम! बताइए, इन तीनों भाइयों में से विद्या को नष्ट करने में सबसे बड़ा दोषी कौन था?”

राजा विक्रम ने सोचकर उत्तर दिया, “बेताल! सबसे बड़ा दोषी ज्ञानदेव था। क्योंकि उसके पास सर्वविद्या का संग्रह था। वह चाहता तो अपने भाइयों को समझा सकता था और विद्या की रक्षा कर सकता था। लेकिन उसने अहंकार के कारण ऐसा नहीं किया।”

“धिक्कार है राजन्!” बेताल चिल्लाया। “आपने फिर बोल दिया। अब मैं वापस पेड़ पर जा रहा हूं।”

यह कहकर बेताल फिर से उड़ गया और अपने पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रम धैर्य के साथ वापस उसे लेने चल दिए।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि विद्या का अहंकार, धर्म की कट्टरता और राजनीति का दुरुपयोग विद्या को नष्ट कर देता है। विद्या तभी फलती-फूलती है जब उसका सदुपयोग किया जाए।

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