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हातिम ताई और जलपरी की अद्भुत कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब अरब की धरती पर हातिम ताई नाम का एक महान योद्धा रहता था। वह अपनी वीरता, दानवीरता और न्याय के लिए पूरे संसार में प्रसिद्ध था। हातिम ताई का दिल सोने जैसा था और वह हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तैयार रहता था।
एक दिन हातिम ताई अपने घोड़े पर सवार होकर एक रेगिस्तान से गुजर रहा था। अचानक उसे दूर से एक सुंदर नीले रंग की झील दिखाई दी। प्यास से व्याकुल होकर वह झील के किनारे पहुंचा। जैसे ही वह पानी पीने के लिए झुका, झील के पानी में से एक अद्भुत जलपरी प्रकट हुई।
जलपरी का रूप अत्यंत सुंदर था। उसके बाल मोतियों की तरह चमक रहे थे और आंखें समुद्र की तरह गहरी नीली थीं। परंतु उसके चेहरे पर गहरी चिंता की छाया थी।
“हे महान योद्धा!” जलपरी ने कहा, “मैं इस झील की रक्षक हूं। मेरा नाम नीलिमा है। मुझे पता है कि आप हातिम ताई हैं और आपका दिल दया से भरा है।”
हातिम ताई ने विनम्रता से कहा, “हां, मैं हातिम ताई हूं। बताइए, आप इतनी चिंतित क्यों लग रही हैं? क्या मैं आपकी कोई सहायता कर सकता हूं?”
जलपरी की आंखों में आंसू आ गए। उसने बताया, “एक दुष्ट जादूगर ने मेरी छोटी बहन को बंदी बना लिया है। वह उसे एक अंधेरी गुफा में कैद करके रखा है। उस जादूगर के पास एक जादुई अंगूठी है जो उसे अपार शक्ति देती है।”
हातिम ताई का दिल दया से भर गया। उसने तुरंत कहा, “चिंता न करें, नीलिमा। मैं आपकी बहन को अवश्य मुक्त कराऊंगा। बताइए, वह गुफा कहां है?”
जलपरी ने उत्तर दिया, “वह गुफा यहां से सात दिन की यात्रा पर काले पहाड़ों में है। परंतु रास्ता अत्यंत खतरनाक है। वहां भयानक राक्षस और जंगली जानवर रहते हैं।”
हातिम ताई ने मुस्कराते हुए कहा, “खतरों से मैं कभी नहीं डरता। न्याय और सच्चाई के लिए मैं किसी भी कष्ट को सहने के लिए तैयार हूं।”
जलपरी ने आभार से कहा, “आपकी दयालुता के लिए धन्यवाद। यह जादुई मोती लीजिए। यह आपको खतरे के समय सुरक्षा प्रदान करेगा।” उसने हातिम ताई को एक चमकता हुआ नीला मोती दिया।
अगले दिन प्रातःकाल हातिम ताई अपनी यात्रा पर निकल पड़ा। रास्ते में उसे अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। पहले दिन उसे एक भयानक शेर मिला, परंतु हातिम ताई की वीरता देखकर शेर ने उसे रास्ता दे दिया।
तीसरे दिन एक विशाल अजगर ने उसका रास्ता रोका। हातिम ताई ने अपनी तलवार से अजगर से युद्ध किया और उसे हरा दिया। पांचवें दिन उसे एक गहरी नदी पार करनी पड़ी जिसमें मगरमच्छ थे।
अंततः सातवें दिन हातिम ताई काले पहाड़ों तक पहुंच गया। वहां एक अंधेरी गुफा थी जिसके मुंह पर भयानक जादुई आग जल रही थी। गुफा के अंदर से रोने की आवाज आ रही थी।
हातिम ताई ने जलपरी का दिया हुआ मोती निकाला। मोती की नीली रोशनी ने जादुई आग को बुझा दिया। वह गुफा के अंदर गया तो देखा कि एक छोटी जलपरी जंजीरों में बंधी हुई रो रही थी।
अचानक एक भयानक आवाज गूंजी, “कौन है जो मेरी गुफा में घुसने का दुस्साहस कर रहा है?” एक काला जादूगर प्रकट हुआ। उसकी आंखें लाल थीं और हाथ में जादुई अंगूठी चमक रही थी।
हातिम ताई ने निडरता से कहा, “मैं हातिम ताई हूं। इस निर्दोष जलपरी को तुरंत मुक्त करो!”
जादूगर हंसा, “मूर्ख योद्धा! मेरी जादुई अंगूठी के सामने तुम कुछ नहीं हो।” उसने अंगूठी से एक जादुई किरण छोड़ी।
परंतु हातिम ताई के पास जलपरी का दिया हुआ मोती था। मोती की शक्ति ने जादूगर की किरण को रोक दिया। एक भयानक युद्ध शुरू हुआ। हातिम ताई अपनी तलवार से लड़ रहा था और जादूगर अपनी जादुई शक्तियों से।
युद्ध के दौरान हातिम ताई ने देखा कि जादूगर की सारी शक्ति उसकी अंगूठी में है। उसने एक चतुर योजना बनाई। वह जानबूझकर गिर गया और जादूगर के पास आने का इंतजार करने लगा।
जब जादूगर उसके पास आया, हातिम ताई ने तुरंत उछलकर उसकी अंगूठी छीन ली। अंगूठी के बिना जादूगर की सारी शक्ति समाप्त हो गई। वह एक साधारण बूढ़ा आदमी बन गया।
“कृपया मुझे माफ कर दो!” जादूगर ने गिड़गिड़ाते हुए कहा। “मैं अब कभी किसी को परेशान नहीं करूंगा।”
हातिम ताई ने दयालुता दिखाते हुए कहा, “मैं तुम्हें माफ करता हूं, परंतु अब तुम्हें अच्छे काम करने होंगे।” उसने छोटी जलपरी की जंजीरें तोड़ दीं।
छोटी जलपरी खुशी से रो पड़ी। “धन्यवाद, हातिम ताई! आपने मेरी जान बचाई है।”
हातिम ताई उस छोटी जलपरी को लेकर वापस झील पर पहुंचा। जब नीलिमा ने अपनी बहन को देखा तो वह खुशी से नाच उठी। “हे महान हातिम ताई! आपका यह उपकार मैं कभी नहीं भूल सकती।”
जलपरी ने कहा, “आपने मेरे परिवार को बचाया है। इसके बदले में मैं आपको एक वरदान देती हूं। जब भी आप किसी मुसीबत में होंगे, इस झील के पास आकर मेरा नाम लेना। मैं तुरंत आपकी सहायता के लिए आऊंगी।”
हातिम ताई ने विनम्रता से कहा, “मैंने केवल अपना कर्तव्य निभाया है। दूसरों की सहायता करना ही मेरा धर्म है।”
इस प्रकार हातिम ताई और जलपरी की कहानी समाप्त हुई। हातिम ताई की वीरता और दयालुता की यह कहानी आज भी लोगों के दिलों में बसी हुई है।
सीख: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें हमेशा दूसरों की सहायता के लिए तैयार रहना चाहिए। सच्चाई और न्याय के लिए लड़ना चाहिए, चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं। दयालुता और वीरता से हम किसी भी समस्या का समाधान कर सकते हैं।
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