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गांधारी की आंखों पर पट्टी – त्याग की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब गांधार देश में एक सुंदर राजकुमारी रहती थी। उसका नाम था गांधारी। वह अपनी सुंदरता और गुणों के लिए पूरे देश में प्रसिद्ध थी। गांधारी के पिता राजा सुबल थे, जो एक न्यायप्रिय और दयालु राजा थे।

एक दिन राजा सुबल के पास हस्तिनापुर से संदेश आया। महाराज भीष्म ने गांधारी के लिए विवाह का प्रस्ताव भेजा था। परंतु यह प्रस्ताव किसी साधारण राजकुमार के लिए नहीं था, बल्कि धृतराष्ट्र के लिए था, जो जन्म से अंधे थे।

जब गांधारी को यह बात पता चली, तो वह बहुत दुखी हुई। उसने अपने पिता से कहा, “पिताजी, मैं एक अंधे व्यक्ति से विवाह कैसे कर सकती हूं?”

राजा सुबल ने अपनी पुत्री को समझाया, “बेटी, यह हमारे लिए सम्मान की बात है। हस्तिनापुर जैसे महान राज्य से रिश्ता होना हमारे राज्य के लिए अच्छा है। और याद रखो, विवाह केवल रूप-रंग के आधार पर नहीं होता।”

गांधारी ने रात भर सोचा। उसे अपने गुरु की शिक्षा याद आई – “पत्नी का धर्म है कि वह अपने पति के सुख-दुख में बराबर की भागीदार हो।”

अगली सुबह गांधारी ने एक अद्भुत निर्णय लिया। उसने अपनी दासी से कहा, “एक मोटा कपड़ा लेकर आओ।” जब दासी कपड़ा लेकर आई, तो गांधारी ने उस कपड़े को अपनी आंखों पर पट्टी की तरह बांध लिया।

सभी लोग हैरान रह गए। राजा सुबल ने पूछा, “बेटी, यह तुम क्या कर रही हो?”

गांधारी ने दृढ़ता से कहा, “पिताजी, जब मेरे होने वाले पति धृतराष्ट्र इस संसार की सुंदरता नहीं देख सकते, तो मैं भी इसे नहीं देखूंगी। मैंने अपनी आंखों पर यह पट्टी इसलिए बांधी है कि मैं अपने पति के दुख में बराबर की भागीदार बन सकूं।”

यह सुनकर सभी लोगों की आंखों में आंसू आ गए। गांधारी का यह त्याग देखकर सभी को लगा कि वह कोई साधारण राजकुमारी नहीं, बल्कि एक महान आत्मा है।

विवाह के दिन जब गांधारी हस्तिनापुर पहुंची, तो गांधारी की आंखों पर पट्टी देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित रह गए। धृतराष्ट्र जब यह बात जानी तो वे बहुत प्रभावित हुए।

धृतराष्ट्र ने कहा, “गांधारी, तुमने जो त्याग किया है, वह अतुलनीय है। तुम सच्ची पत्नी हो।”

गांधारी ने उत्तर दिया, “स्वामी, पति-पत्नी का रिश्ता केवल देखने से नहीं बनता। यह प्रेम, समझ और त्याग से बनता है। मैंने यह पट्टी इसलिए बांधी है कि हम दोनों के बीच कोई अंतर न रहे।”

समय बीतता गया और गांधारी ने कभी भी अपनी आंखों पर पट्टी नहीं खोली। उन्होंने सौ पुत्रों को जन्म दिया, जिनमें सबसे बड़ा दुर्योधन था। गांधारी ने अपने सभी पुत्रों को प्रेम दिया, लेकिन उन्हें सही-गलत की पहचान भी सिखाई।

जब महाभारत का युद्ध हुआ और गांधारी के सभी पुत्र मारे गए, तब भी उन्होंने धैर्य नहीं खोया। उन्होंने कहा, “यह सब अधर्म का फल है। मैंने अपने पुत्रों को सही राह दिखाने की कोशिश की थी, लेकिन वे अपने अहंकार में अंधे हो गए थे।”

गांधारी का जीवन हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम त्याग में है। उन्होंने अपनी आंखों की रोशनी का त्याग करके दिखाया कि पति-पत्नी का रिश्ता शारीरिक सुंदरता पर नहीं, बल्कि आत्मिक जुड़ाव पर आधारित होता है।

शिक्षा: गांधारी की कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम वही है जो कठिनाइयों में साथ देता है। त्याग और समर्पण से ही रिश्ते मजबूत बनते हैं। हमें भी अपने प्रियजनों के साथ खुशी और गम दोनों में साथ खड़ा होना चाहिए। गांधारी के त्याग की तरह, समझदारी और त्याग की कहानियाँ भी महत्वपूर्ण हैं।

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