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बुद्ध अवतार की कथा – भगवान विष्णु का नौवां अवतार

बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म का ह्रास हो रहा था और असुरों का प्रभाव बढ़ता जा रहा था। उस समय भगवान विष्णु ने बुद्ध अवतार लेकर संसार में शांति और अहिंसा का संदेश फैलाने का निश्चय किया।

कपिलवस्तु नगर में राजा शुद्धोधन का राज्य था। उनकी रानी माया देवी एक धर्मपरायण और दयालु महिला थीं। एक दिन रानी माया देवी ने एक अद्भुत स्वप्न देखा। उन्होंने देखा कि एक सफेद हाथी उनके गर्भ में प्रवेश कर रहा है। यह स्वप्न देखकर वे बहुत प्रसन्न हुईं।

राज्य के ज्योतिषियों ने बताया कि रानी के गर्भ में एक महान आत्मा का जन्म होगा, जो या तो एक महान राजा बनेगा या फिर एक महान संत। यह सुनकर राजा शुद्धोधन बहुत खुश हुए।

समय आने पर, लुम्बिनी वन में एक शाल वृक्ष के नीचे राजकुमार सिद्धार्थ का जन्म हुआ। जन्म के समय ही अनेक चमत्कार हुए। आकाश से फूलों की वर्षा हुई, देवताओं ने शंख बजाए, और पूरा वातावरण दिव्य प्रकाश से भर गया।

“यह बालक संसार को नया मार्ग दिखाएगा,” ऋषि आसित ने भविष्यवाणी की। “इसके द्वारा धर्म की रक्षा होगी और अहिंसा का प्रचार होगा।”

राजकुमार सिद्धार्थ का पालन-पोषण बड़े लाड़-प्यार से हुआ। वे बहुत बुद्धिमान और दयालु थे। बचपन से ही उनमें करुणा और दया के भाव दिखाई देते थे। एक बार जब वे बगीचे में खेल रहे थे, तो उन्होंने देखा कि एक चिड़िया तीर लगने से घायल हो गई है।

राजकुमार सिद्धार्थ ने तुरंत उस चिड़िया को उठाया और उसकी सेवा की। उन्होंने कहा, “सभी जीवों में प्राण हैं, सभी को जीने का अधिकार है।” यह देखकर सभी समझ गए कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।

जैसे-जैसे राजकुमार बड़े होते गए, उनके मन में संसार के दुखों को लेकर प्रश्न उठने लगे। एक दिन जब वे नगर भ्रमण पर निकले, तो उन्होंने चार दृश्य देखे जिन्होंने उनके जीवन की दिशा बदल दी।

पहले उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा जो कमजोरी से चल रहा था। फिर उन्होंने एक बीमार व्यक्ति को देखा जो दर्द से कराह रहा था। तीसरे में उन्होंने एक मृत व्यक्ति को देखा जिसे लोग श्मशान ले जा रहे थे। अंत में उन्होंने एक संन्यासी को देखा जो शांत और प्रसन्न दिख रहा था।

“यह संसार दुखों से भरा है,” राजकुमार ने सोचा। “बुढ़ापा, बीमारी, और मृत्यु से कैसे मुक्ति पाई जा सकती है?”

इन दृश्यों ने राजकुमार सिद्धार्थ के मन में वैराग्य जगा दिया। उन्होंने निश्चय किया कि वे सत्य की खोज में निकलेंगे। एक रात, जब सभी सो रहे थे, राजकुमार ने अपना राजसी वस्त्र त्यागा और साधारण कपड़े पहनकर महल छोड़ दिया।

वन में जाकर उन्होंने कई गुरुओं से शिक्षा ली। उन्होंने कठोर तपस्या की, लेकिन उन्हें लगा कि केवल शरीर को कष्ट देने से सत्य नहीं मिलता। तब उन्होंने मध्यम मार्ग अपनाया – न तो अधिक भोग और न ही अधिक त्याग।

बोधगया में एक पीपल के वृक्ष के नीचे बैठकर राजकुमार सिद्धार्थ ने गहरा ध्यान लगाया। उस समय मार नामक असुर ने उन्हें भ्रम में डालने की कोशिश की। मार ने अपनी सेना भेजी, फिर अपनी सुंदर कन्याओं को भेजा, लेकिन राजकुमार अपने ध्यान में स्थिर रहे।

“तुम कौन हो जो यहाँ बैठे हो?” मार ने पूछा।

“मैं सत्य की खोज में हूँ,” राजकुमार ने शांति से उत्तर दिया। “मैं सभी जीवों के कल्याण के लिए यहाँ हूँ।”

मार ने कहा, “तुम्हारे पास क्या प्रमाण है कि तुम इस स्थान के अधिकारी हो?”

तब राजकुमार ने अपना हाथ भूमि पर रखा और कहा, “यह पृथ्वी मेरी साक्षी है।” उसी समय पृथ्वी माता ने गर्जना की और मार की सेना भाग गई।

रात भर ध्यान करते रहने के बाद, प्रातःकाल जब सूर्य उदय हुआ, राजकुमार सिद्धार्थ को ज्ञान प्राप्त हुआ। वे बुद्ध बन गए – जिसका अर्थ है ‘जागा हुआ’ या ‘ज्ञान प्राप्त’।

बुद्ध को समझ आया कि दुख का कारण तृष्णा और अज्ञान है। उन्होंने चार आर्य सत्य और अष्टांगिक मार्ग की खोज की। अब उनका मिशन था – इस ज्ञान को संसार के लोगों तक पहुँचाना।

सारनाथ में उन्होंने अपना पहला उपदेश दिया। पाँच साधकों को उन्होंने अपना पहला संदेश दिया। “सभी जीव दुख से मुक्त हों, सभी प्राणी सुखी हों,” यह था उनका संदेश।

बुद्ध अवतार की कथा में सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि उन्होंने अहिंसा का प्रचार किया। उन्होंने कहा कि किसी भी जीव को हानि नहीं पहुँचानी चाहिए। यह संदेश उस समय बहुत क्रांतिकारी था जब यज्ञों में पशु बलि दी जाती थी।

एक बार एक क्रूर डाकू अंगुलिमाल ने बुद्ध को मारने की कोशिश की। लेकिन बुद्ध की करुणा और शांति देखकर वह पिघल गया और उनका शिष्य बन गया। यह दिखाता है कि प्रेम और करुणा से सबसे कठोर हृदय भी बदल सकता है।

बुद्ध ने जाति-पाति का भेदभाव नहीं माना। उन्होंने कहा कि सभी मनुष्य समान हैं। उनके संघ में राजा हो या भिखारी, ब्राह्मण हो या शूद्र, सभी को समान स्थान मिलता था।

एक दिन एक माँ अपने मृत बच्चे को लेकर बुद्ध के पास आई। वह रो-रोकर कह रही थी, “भगवन्, मेरे बच्चे को जिंदा कर दीजिए।”

बुद्ध ने कहा, “मैं तुम्हारे बच्चे को जिंदा कर दूंगा, लेकिन तुम्हें एक शर्त माननी होगी। तुम गाँव में जाकर उस घर से सरसों के दाने लाना जहाँ कभी कोई नहीं मरा हो।”

माँ पूरे गाँव में गई, लेकिन उसे ऐसा कोई घर नहीं मिला जहाँ कभी कोई न मरा हो। तब उसे समझ आया कि मृत्यु जीवन का सत्य है और उसे स्वीकार करना चाहिए।

बुद्ध के उपदेशों से असुरों को भ्रम में डालना का काम भी हुआ। जो लोग गलत रास्ते पर चल रहे थे, वे बुद्ध की शिक्षाओं से प्रभावित होकर सही मार्ग पर आ गए। इस प्रकार धर्म की रक्षा हुई।

बुद्ध ने 45 वर्षों तक निरंतर उपदेश दिया। उन्होंने हजारों लोगों को शिक्षा दी। राजा-महाराजा से लेकर साधारण किसान तक, सभी उनके उपदेशों से प्रभावित हुए।

राजा बिम्बिसार, राजा प्रसेनजित जैसे महान राजाओं ने बुद्ध की शरण ली। उन्होंने अपने राज्यों में अहिंसा और न्याय की नीति अपनाई।

बुद्ध की शिक्षाओं का मुख्य सिद्धांत था – “अप्प दीपो भव” यानी अपना दीपक स्वयं बनो। उन्होंने कहा कि हर व्यक्ति में बुद्धत्व प्राप्त करने की क्षमता है।

बुद्ध अवतार की कथा यह सिखाती है कि सच्चा धर्म प्रेम, करुणा और अहिंसा में है। बुद्ध ने दिखाया कि बिना किसी को हानि पहुँचाए भी संसार में सुधार लाया जा सकता है।

जब बुद्ध के महापरिनिर्वाण का समय आया, तो उन्होंने अपने शिष्यों से कहा, “सभी संस्कार नाशवान हैं। अपने कल्याण के लिए निरंतर प्रयत्न करते रहो।”

इस प्रकार भगवान विष्णु के बुद्ध अवतार ने संसार को अहिंसा, करुणा और मध्यम मार्ग का संदेश दिया। उन्होंने दिखाया कि सच्चा धर्म वही है जो सभी जीवों का कल्याण करे।

आज भी बुद्ध की शिक्षाएँ हमें प्रेरणा देती हैं कि हम अपने जीवन में शांति, करुणा और अहिंसा को अपनाएँ।

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