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हनुमान जी का सूर्य को फल समझकर खाने का प्रसंग

बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान हनुमान बालक थे। वे अपनी माता अंजना के साथ एक पर्वत पर रहते थे। बालक हनुमान अत्यंत शक्तिशाली और चंचल थे, परंतु उन्हें अपनी शक्तियों का ज्ञान नहीं था।

एक प्रातःकाल की बात है। सूर्य देव अपने सुनहरे रथ पर सवार होकर आकाश में चमक रहे थे। उनकी लालिमा से पूरा आकाश सुनहरा हो गया था। बालक हनुमान की नींद खुली तो उन्होंने देखा कि आकाश में एक बड़ा सा लाल-पीला गोल फल लटक रहा है।

“माता, देखिए! आकाश में कितना बड़ा और सुंदर फल लटक रहा है!” हनुमान जी ने अपनी माता से कहा।

अंजना माता मुस्कराईं और बोलीं, “वत्स, वह सूर्य देव हैं, कोई फल नहीं। वे सभी जीवों को प्रकाश और ऊर्जा देते हैं।”

परंतु भूखे बालक हनुमान को वह एक स्वादिष्ट फल ही लगा। उन्होंने सोचा, “इतना बड़ा फल खाने से मेरी भूख अवश्य मिट जाएगी।” और वे सूर्य को फल समझकर खाने की कोशिश करने का निश्चय कर लिया।

अचानक हनुमान जी हवा में उछले और आकाश की ओर उड़ने लगे। उनकी गति इतनी तेज़ थी कि हवा में गर्जना होने लगी। वे तेज़ी से सूर्य की ओर बढ़ रहे थे।

सूर्य देव यह देखकर चकित रह गए। उन्होंने सोचा, “यह बालक कौन है जो मुझ तक पहुंचने का साहस कर रहा है?” जैसे-जैसे हनुमान जी सूर्य के पास पहुंचे, उनका आकार बढ़ता गया और वे एक विशाल रूप धारण कर लिया।

इधर पृथ्वी पर सभी देवता चिंतित हो गए। यदि हनुमान जी सूर्य को निगल जाते, तो संसार में अंधकार छा जाता। इंद्र देव अपने वज्र के साथ हनुमान जी को रोकने के लिए आए।

“रुको बालक! तुम जो कर रहे हो, वह ठीक नहीं है!” इंद्र देव ने गर्जना की।

परंतु हनुमान जी ने उनकी बात नहीं सुनी। वे सूर्य को फल समझकर खाने की कोशिश में लगे रहे। अंततः इंद्र देव को अपना वज्र चलाना पड़ा। वज्र हनुमान जी की ठुड्डी पर लगा और वे बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़े।

यह देखकर हनुमान जी के पिता वायु देव अत्यंत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी गति रोक दी। पूरे संसार में हवा रुक गई। सभी जीव-जंतु सांस लेने में कष्ट अनुभव करने लगे।

“जब तक मेरे पुत्र को न्याय नहीं मिलता, तब तक मैं अपनी गति नहीं चलाऊंगा,” वायु देव ने कहा।

सभी देवता ब्रह्मा जी के पास गए और पूरी स्थिति बताई। ब्रह्मा जी समझ गए कि यह बालक कोई साधारण बालक नहीं है। उन्होंने हनुमान जी को जीवित कर दिया और उन्हें अनेक वरदान दिए।

“वत्स, तुम्हें अजेय शक्ति प्राप्त है। तुम संकट के समय भगवान राम की सेवा करोगे,” ब्रह्मा जी ने आशीर्वाद दिया।

सूर्य देव भी प्रसन्न होकर बोले, “बालक, तुम्हारे साहस से मैं प्रभावित हूं। मैं तुम्हें अपना शिष्य बनाता हूं और तुम्हें सभी विद्याओं का ज्ञान दूंगा।”

इस प्रकार हनुमान जी का सूर्य को फल समझकर खाने का प्रसंग समाप्त हुआ। बाद में सूर्य देव ने हनुमान जी को सभी शास्त्रों और युद्ध कलाओं की शिक्षा दी।

जब हनुमान जी होश में आए तो उन्होंने अपनी माता से पूछा, “माता, मैंने क्या किया था?”

अंजना माता ने प्रेम से समझाया, “वत्स, तुमने सूर्य को फल समझकर खाने की कोशिश की थी। परंतु अब तुम्हें समझना होगा कि तुम्हारी शक्ति का उपयोग केवल धर्म की रक्षा के लिए करना है।”

इस घटना से हनुमान जी को अपनी शक्ति का एहसास हुआ। उन्होंने प्रण लिया कि वे अपनी शक्ति का उपयोग केवल भलाई के लिए करेंगे। यही कारण है कि आगे चलकर वे भगवान राम के सबसे बड़े भक्त और सहायक बने।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि शक्ति का उपयोग सोच-समझकर करना चाहिए। बिना जाने-समझे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए। हनुमान जी की तरह हमें भी अपनी क्षमताओं का उपयोग दूसरों की भलाई के लिए करना चाहिए। समझदार बंदर की कहानी और दो सिर वाले बच्चे की कहानी भी इसी प्रकार की शिक्षाएं देती हैं।

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