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असली वर कौन? – बेताल पच्चीसी – पाँचवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लादे हुए श्मशान से निकल रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से अपनी मधुर आवाज़ में कहा, “राजन्! सुनो एक और कहानी।”

विक्रम चुपचाप सुनने लगे।

“कलिंग देश में राजा चंद्रगुप्त का राज्य था।” बेताल ने कहानी शुरू की। “उस राज्य में सुंदरी नाम की एक अत्यंत रूपवान कन्या रहती थी। उसके पिता का नाम धनपाल था, जो एक धनी सेठ था।”

सुंदरी की सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी। उसके नेत्र हिरण के समान थे, मुख चंद्रमा के समान उज्ज्वल था और उसकी मुस्कान में जादू था।

“एक दिन तीन युवक अलग-अलग दिशाओं से सुंदरी के घर आए।” बेताल आगे बोला। “पहला युवक था विद्यासागर, जो महान विद्वान था। दूसरा था धनवान, जो अत्यधिक धनी था। तीसरा था वीरसिंह, जो महान योद्धा था।”

तीनों ने एक साथ सुंदरी के पिता धनपाल से उसका हाथ माँगा। धनपाल बड़ी दुविधा में पड़ गया। तीनों ही युवक अपने-अपने क्षेत्र में श्रेष्ठ थे।

“पिताजी, मैं इन तीनों में से किसी को भी नहीं जानती।” सुंदरी ने कहा। “आप जो उचित समझें, वही करें।”

धनपाल ने सोचा और कहा, “मैं तुम तीनों को एक वर्ष का समय देता हूँ। जो भी इस समय में सबसे बड़ा कार्य करके दिखाएगा, उसी से मैं अपनी पुत्री का विवाह करूँगा।”

तीनों युवक अपने-अपने रास्ते चले गए।

विद्यासागर ने अपना पूरा समय अध्ययन में लगाया। उसने दिव्य शास्त्रों का अध्ययन किया और एक ऐसा मंत्र सीखा जिससे वह दूर बैठे-बैठे किसी की भी स्थिति जान सकता था।

धनवान ने अपना धन बढ़ाने में लगाया। उसने व्यापार किया और एक दिव्य विमान खरीदा जो हवा में उड़ सकता था और पलक झपकते ही कहीं भी पहुँच सकता था।

वीरसिंह ने अपनी वीरता बढ़ाने में समय लगाया। उसने एक ऐसा दिव्य अमृत प्राप्त किया जो मृत व्यक्ति को भी जीवित कर सकता था।

“एक वर्ष बाद जब तीनों वापस लौटे, तो विद्यासागर ने अपने मंत्र से देखा कि सुंदरी की मृत्यु हो गई है।” बेताल ने आगे कहा।

तीनों को बहुत दुख हुआ। विद्यासागर ने तुरंत अपने मंत्र से सुंदरी की स्थिति बताई। धनवान ने अपने दिव्य विमान से तीनों को तुरंत श्मशान पहुँचाया। वहाँ वीरसिंह ने अपने दिव्य अमृत से सुंदरी को जीवित कर दिया।

सुंदरी जीवित हो गई और पहले से भी अधिक सुंदर हो गई।

अब समस्या यह थी कि तीनों ने मिलकर सुंदरी को बचाया था। धनपाल फिर दुविधा में पड़ गया कि असली वर कौन है?

विद्यासागर का कहना था, “मैंने अपने ज्ञान से सुंदरी की स्थिति बताई, इसलिए मैं असली वर हूँ।”

धनवान का कहना था, “मेरे विमान के बिना हम समय पर नहीं पहुँच सकते थे, इसलिए मैं असली वर हूँ।”

वीरसिंह का कहना था, “मैंने अपने अमृत से सुंदरी को जीवित किया, इसलिए मैं असली वर हूँ।”

बेताल ने कहानी समाप्त करते हुए कहा, “राजा विक्रम! बताओ कि इन तीनों में से असली वर कौन है? यदि तुम जानते हुए भी नहीं बताओगे तो तुम्हारा सिर फट जाएगा।”

राजा विक्रमादित्य ने सोचा और कहा, “बेताल! वीरसिंह ही असली वर है।”

“क्यों?” बेताल ने पूछा।

“क्योंकि विद्यासागर ने केवल जानकारी दी, जैसे एक मित्र करता है। धनवान ने परिवहन की सुविधा दी, जैसे एक सेवक करता है। परंतु वीरसिंह ने सुंदरी को नया जीवन दिया। जो व्यक्ति किसी को दूसरा जन्म देता है, वही उसका सच्चा स्वामी होता है। इसलिए वीरसिंह ही असली वर है।”

विक्रम के उत्तर से प्रसन्न होकर बेताल फिर से हँसा और पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रमादित्य को फिर से उसे लाने जाना पड़ा।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्चा प्रेम वह है जो जीवन देता है, केवल सहायता करना ही प्रेम नहीं है।

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