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राम अवतार की कथा – रामायण की संपूर्ण गाथा
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अधर्म और पाप का राज था। राक्षसराज रावण अपने अत्याचारों से सभी को परेशान कर रहा था। देवता और ऋषि-मुनि सभी उसके डर से कांप रहे थे। तब भगवान विष्णु ने धरती पर राम अवतार लेने का निश्चय किया।
अयोध्या नगरी में राजा दशरथ का राज था। वे बहुत धर्मात्मा और न्यायप्रिय राजा थे, लेकिन उनके कोई संतान नहीं थी। इस दुख से व्याकुल होकर उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से सलाह ली। महर्षि ने कहा, “राजन! आप पुत्रेष्टि यज्ञ करवाइए। भगवान अवश्य आपकी मनोकामना पूरी करेंगे।”
राजा दशरथ ने महर्षि ऋष्यश्रृंग से पुत्रेष्टि यज्ञ करवाया। यज्ञ की समाप्ति पर अग्निदेव प्रकट हुए और उन्होंने राजा को दिव्य खीर का कटोरा दिया। राजा दशरथ ने वह खीर अपनी तीनों रानियों – कौशल्या, कैकेयी और सुमित्रा को दी।
समय आने पर रानी कौशल्या के गर्भ से राम का जन्म हुआ। कैकेयी के गर्भ से भरत और सुमित्रा के गर्भ से लक्ष्मण और शत्रुघ्न का जन्म हुआ। चारों भाइयों में राम सबसे बड़े थे और सबसे गुणवान भी।
राम का बचपन अयोध्या में बहुत खुशी से बीता। वे अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ से शिक्षा प्राप्त करते थे। राम में सभी दिव्य गुण थे – वे सत्यवादी, धर्मपरायण, और सभी का सम्मान करने वाले थे। लक्ष्मण उनके सबसे प्रिय भाई थे और हमेशा उनके साथ रहते थे।
एक दिन महर्षि विश्वामित्र अयोध्या आए। उन्होंने राजा दशरथ से कहा, “राजन! राक्षस मेरे यज्ञ में विघ्न डाल रहे हैं। राम और लक्ष्मण को मेरे साथ भेजिए।” राजा दशरथ पहले तो हिचके, लेकिन गुरु वशिष्ठ के कहने पर उन्होंने राम और लक्ष्मण को महर्षि विश्वामित्र के साथ भेज दिया।
वन में राम ने राक्षसी ताड़का का वध किया और सुबाहु तथा मारीच को भगाया। महर्षि विश्वामित्र बहुत प्रसन्न हुए और उन्होंने राम को अनेक दिव्य अस्त्र-शस्त्र दिए।
इसके बाद महर्षि विश्वामित्र राम और लक्ष्मण को मिथिला ले गए। वहां राजा जनक की पुत्री सीता का स्वयंवर हो रहा था। राजा जनक ने घोषणा की थी कि जो भी शिव धनुष को उठाकर उस पर प्रत्यंचा चढ़ाएगा, सीता का विवाह उसी से होगा।
अनेक राजा-महाराजा आए थे, लेकिन कोई भी उस धनुष को हिला तक नहीं सका। तब राम आगे बढ़े। उन्होंने धनुष को आसानी से उठाया और प्रत्यंचा चढ़ाने के लिए उसे खींचा। धनुष इतनी जोर से टूटा कि उसकी आवाज सारी पृथ्वी पर गूंज गई।
“राम ने शिव धनुष तोड़ दिया!” सभा में खुशी की लहर दौड़ गई। राजा जनक ने बहुत प्रसन्न होकर सीता का विवाह राम से कर दिया। साथ ही उर्मिला का विवाह लक्ष्मण से, मांडवी का विवाह भरत से और श्रुतकीर्ति का विवाह शत्रुघ्न से हुआ।
अयोध्या वापस आने पर राजा दशरथ ने राम को युवराज बनाने की घोषणा की। सारी प्रजा खुश थी क्योंकि राम सभी के प्रिय थे। लेकिन रानी कैकेयी की दासी मंथरा ने उसके कान भरे। उसने कहा, “रानी! अगर राम राजा बने तो भरत का क्या होगा?”
मंथरा के बहकावे में आकर कैकेयी ने राजा दशरथ से दो वरदान मांगे – पहला कि भरत को राजा बनाया जाए और दूसरा कि राम को चौदह साल का वनवास दिया जाए। राजा दशरथ को अपना वचन निभाना पड़ा।
जब राम को वनवास की बात पता चली, तो उन्होंने बिना किसी शिकायत के इसे स्वीकार कर लिया। उन्होंने कहा, “पिताजी का वचन सबसे ऊपर है। मैं खुशी से वनवास जाऊंगा।”
सीता और लक्ष्मण ने भी राम के साथ वन जाने का निश्चय किया। सीता ने कहा, “पति के बिना मेरा जीवन अधूरा है।” लक्ष्मण ने कहा, “भैया के बिना मैं एक पल भी नहीं रह सकता।”
राम, सीता और लक्ष्मण ने अयोध्या छोड़ दी। राजा दशरथ इस दुख को सहन नहीं कर सके और उनकी मृत्यु हो गई। भरत जब वापस आए तो उन्होंने राज्य लेने से इनकार कर दिया और राम को वापस लाने के लिए वन गए।
भरत ने राम से कहा, “भैया! आप वापस चलिए और राज्य संभालिए।” लेकिन राम ने कहा, “भरत! पिताजी का वचन पूरा करना जरूरी है। मैं चौदह साल बाद ही वापस आऊंगा।” भरत ने राम की चरण पादुका ली और कहा कि वे उसी के नाम पर राज्य चलाएंगे।
वन में राम, सीता और लक्ष्मण ने कई स्थानों पर निवास किया। वे चित्रकूट, दंडकारण्य और पंचवटी में रहे। वहां उन्होंने अनेक ऋषि-मुनियों से मुलाकात की और उनकी सेवा की।
पंचवटी में एक दिन राक्षसी शूर्पणखा आई। वह राम पर मोहित हो गई और उनसे विवाह करना चाहती थी। राम ने मना कर दिया तो वह सीता पर आक्रमण करने लगी। लक्ष्मण ने शूर्पणखा की नाक काट दी।
शूर्पणखा अपने भाई खर और दूषण के पास गई। उन्होंने चौदह हजार राक्षसों के साथ राम पर आक्रमण किया। राम ने अकेले ही सभी राक्षसों का वध कर दिया। यह समाचार सुनकर रावण बहुत क्रोधित हुआ।
रावण ने मारीच की सहायता से सीता का हरण करने की योजना बनाई। मारीच ने सुनहरे हिरण का रूप धारण किया। सीता ने राम से उस हिरण को पकड़ने के लिए कहा। राम हिरण के पीछे गए और लक्ष्मण को सीता की रक्षा के लिए कहा।
मारीच ने राम की आवाज में सहायता मांगी। सीता ने लक्ष्मण को राम की सहायता के लिए भेजा। “लक्ष्मण! जल्दी जाओ, राम को सहायता की जरूरत है!” लक्ष्मण ने सीता के चारों ओर लक्ष्मण रेखा खींची और कहा कि वे इसे न लांघें।
रावण साधु का वेश धारण करके आया। उसने सीता से भिक्षा मांगी। सीता ने लक्ष्मण रेखा लांघकर भिक्षा देनी चाही। रावण ने तुरंत अपना असली रूप दिखाया और सीता का हरण कर लिया।
जटायु ने सीता को बचाने की कोशिश की, लेकिन रावण ने उसके पंख काट दिए। राम और लक्ष्मण वापस आए तो सीता को न पाकर बहुत दुखी हुए। मरते समय जटायु ने राम को बताया कि रावण सीता को दक्षिण दिशा में ले गया है।
सीता की खोज में राम और लक्ष्मण दक्षिण की ओर चले। रास्ते में उनकी मुलाकात हनुमान से हुई। हनुमान ने उन्हें सुग्रीव से मिलवाया। सुग्रीव की बाली से शत्रुता थी। राम ने बाली का वध करके सुग्रीव को किष्किंधा का राजा बनाया।
सुग्रीव ने अपनी वानर सेना को सीता की खोज के लिए भेजा। हनुमान ने समुद्र पार करके लंका में सीता को ढूंढा। उन्होंने सीता को राम की अंगूठी दी और उनसे कहा कि राम जल्दी ही उन्हें छुड़ाने आएंगे।
हनुमान ने लंका में तहलका मचाया और रावण के पुत्र अक्षयकुमार का वध किया। रावण ने हनुमान की पूंछ में आग लगवाई, लेकिन हनुमान ने पूरी लंका जला दी। वापस आकर उन्होंने राम को सीता का समाचार दिया।
राम ने वानर सेना के साथ लंका की ओर प्रस्थान किया। समुद्र के किनारे पहुंचकर राम ने समुद्र से रास्ता मांगा। जब समुद्र नहीं माना तो राम ने अपना धनुष उठाया। समुद्र डर गया और उसने कहा, “प्रभु! नल और नील आपके लिए पुल बना देंगे।”
वानरों ने पांच दिन में समुद्र पर पुल बना दिया। राम की सेना लंका पहुंची। रावण के भाई विभीषण ने राम की शरण ली। राम ने उसे लंका का राजा बनाने का वचन दिया।
लंका में भयंकर युद्ध हुआ। रावण के पुत्र मेघनाद ने लक्ष्मण को शक्ति से घायल कर दिया। हनुमान संजीवनी बूटी लेने हिमालय गए। पूरा पर्वत उठाकर लाने से लक्ष्मण की जान बच गई।
अंत में राम और रावण के बीच युद्ध हुआ। रावण के दस सिर थे और वह बहुत शक्तिशाली था। राम ने ब्रह्मास्त्र का प्रयोग किया। रावण का वध हो गया और धरती पर धर्म की विजय हुई।
सीता को मुक्त कराने के बाद राम ने उनसे अग्नि परीक्षा ली। सीता अग्नि में प्रवेश कर गईं। अग्निदेव ने सीता को सकुशल राम को सौंप दिया और कहा कि वे पूर्णतः पवित्र हैं।
चौदह साल का वनवास पूरा होने पर राम, सीता और लक्ष्मण अयोध्या वापस आए। भरत ने बहुत खुशी से राज्य राम को सौंप दिया। पूरी अयोध्या में दीपावली मनाई गई।
राम का राज्याभिषेक हुआ और वे अयोध्या के राजा बने। उनके राज्य में सभी सुखी थे। कोई दुख, कोई बीमारी, कोई अन्याय नहीं था। इसे रामराज्य कहा जाता है।
राम अवतार की यह कथा हमें सिखाती है कि सत्य, धर्म और न्याय की हमेशा विजय होती है। राम ने दिखाया कि आदर्श पुत्र, आदर्श पति, आदर्श भाई और आदर्श राजा कैसे होना चाहिए। उनका जीवन हमारे लिए प्रेरणा का स्रोत है।
इस प्रकार भगवान विष्णु के राम अवतार ने धरती से पाप और अधर्म का समाप्ति किया।












