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यशोदा और नंद बाबा का अटूट प्रेम – कृष्ण की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब गोकुल में एक साधारण ग्वाले नंद बाबा और उनकी पत्नी यशोदा मैया रहते थे। उनका जीवन सरल था, लेकिन उनके हृदय में भगवान के लिए अपार प्रेम था। यशोदा और नंद बाबा का प्रेम न केवल एक-दूसरे के लिए था, बल्कि समस्त संसार के कल्याण के लिए भी था।

एक रात, जब आकाश में तारे चमक रहे थे, वसुदेव जी अपने नवजात पुत्र को लेकर गोकुल पहुंचे। वे जानते थे कि केवल यशोदा और नंद बाबा का प्रेम ही इस दिव्य बालक की रक्षा कर सकता है। नंद बाबा ने बिना किसी प्रश्न के उस बालक को अपनाया, मानो वह उनका अपना पुत्र हो।

“यशोदा, देखो तो, कितना सुंदर बालक है यह,” नंद बाबा ने कहा। यशोदा मैया ने जैसे ही उस बालक को देखा, उनका हृदय प्रेम से भर गया। वे समझ गईं कि यह कोई साधारण बालक नहीं है।

दिन बीतते गए और कन्हैया बड़ा होने लगा। यशोदा और नंद बाबा का प्रेम उसके चारों ओर एक सुरक्षा कवच की तरह था। जब भी कोई राक्षस या असुर कन्हैया को हानि पहुंचाने आता, माता-पिता का प्रेम उसकी रक्षा करता।

एक दिन पूतना राक्षसी गोकुल में आई। वह एक सुंदर स्त्री का रूप धारण करके यशोदा मैया के पास आई। “मैं आपके लाल को दूध पिलाना चाहती हूं,” उसने कहा। यशोदा मैया का मातृत्व प्रेम इतना पवित्र था कि वे तुरंत समझ गईं कि कुछ गड़बड़ है।

“नहीं बहन, मेरा कन्हैया अभी सो रहा है,” यशोदा मैया ने दृढ़ता से कहा। लेकिन पूतना ने जबरदस्ती कन्हैया को गोद में उठा लिया। उसके स्तनों में विष था, लेकिन यशोदा और नंद बाबा का प्रेम इतना शक्तिशाली था कि कन्हैया ने न केवल विष को निष्प्रभावी कर दिया, बल्कि पूतना के प्राणों को भी मुक्ति दिला दी।

नंद बाबा जब खेत से लौटे तो उन्होंने देखा कि एक विशाल राक्षसी का शरीर गांव के बाहर पड़ा है। “यशोदा, यह क्या हुआ?” उन्होंने पूछा। यशोदा मैया ने सारी घटना सुनाई। नंद बाबा समझ गए कि उनका लाल कोई साधारण बालक नहीं है, लेकिन उनका प्रेम और भी गहरा हो गया।

जैसे-जैसे कृष्ण बड़े होते गए, उनकी लीलाएं भी बढ़ती गईं। वे मक्खन चुराते, गायों को छुड़ाते, और गोपियों के साथ खेलते। कभी-कभी गांव वाले यशोदा मैया के पास शिकायत लेकर आते।

“यशोदा बहन, आपका कन्हैया फिर हमारा मक्खन चुरा गया,” एक गोपी ने कहा। यशोदा मैया मुस्कराईं, “अरे, वह तो बच्चा है। बच्चे ऐसे ही शरारत करते हैं।” यशोदा और नंद बाबा का प्रेम इतना निस्वार्थ था कि वे कृष्ण की हर शरारत को प्रेम से देखते थे।

एक दिन यशोदा मैया ने कृष्ण को मिट्टी खाते देखा। “कन्हैया, मुंह खोलो,” उन्होंने कहा। जब कृष्ण ने मुंह खोला तो यशोदा मैया को उसमें संपूर्ण ब्रह्मांड दिखाई दिया। वे चकित रह गईं, लेकिन फिर तुरंत अपने मातृत्व प्रेम में खो गईं।

“मेरा लाल कितना अनोखा है,” उन्होंने सोचा। लेकिन उनके लिए वह सिर्फ उनका प्यारा बेटा था। यशोदा और नंद बाबा का प्रेम इतना पवित्र था कि वे कृष्ण की दिव्यता को भूलकर केवल उसके बचपन का आनंद लेते थे।

नंद बाबा भी कृष्ण से अत्यधिक प्रेम करते थे। जब कृष्ण गायों के साथ वन में जाते, तो नंद बाबा चिंतित हो जाते। “यशोदा, कहीं हमारा लाल जंगल में खो न जाए,” वे कहते। यशोदा मैया उन्हें समझातीं, “चिंता मत करो, भगवान हमारे कन्हैया की रक्षा करेंगे।”

एक दिन कालिया नाग ने यमुना नदी को विषाक्त कर दिया। गायें पानी पीकर बीमार हो गईं। कृष्ण ने कालिया नाग को हराया और नदी को पवित्र किया। जब यह समाचार गोकुल पहुंचा, तो यशोदा और नंद बाबा का प्रेम गर्व से भर गया।

“हमारा बेटा कितना बहादुर है,” नंद बाबा ने कहा। यशोदा मैया ने कृष्ण को गले लगाया, “तुमने बहुत अच्छा काम किया, लेकिन अगली बार इतना खतरा मत उठाना।”

समय बीतता गया और कृष्ण युवा होते गए। एक दिन अक्रूर जी गोकुल आए और कहा कि कृष्ण को मथुरा जाना होगा। यह सुनकर यशोदा मैया और नंद बाबा का हृदय टूट गया।

“नहीं, मैं अपने कन्हैया को कहीं नहीं भेजूंगी,” यशोदा मैया ने रोते हुए कहा। नंद बाबा भी दुखी थे, लेकिन वे समझ गए कि यह कृष्ण की नियति है। यशोदा और नंद बाबा का प्रेम इतना निस्वार्थ था कि उन्होंने अपने दुख को छुपाकर कृष्ण को आशीर्वाद दिया।

विदाई के समय कृष्ण ने कहा, “मैया, बाबा, मैं हमेशा आपके हृदय में रहूंगा। आपका प्रेम ही मेरी सबसे बड़ी शक्ति है।” यशोदा मैया और नंद बाबा ने समझा कि सच्चा प्रेम कभी अलग नहीं होता।

कृष्ण के जाने के बाद भी यशोदा और नंद बाबा का प्रेम उनके साथ था। वे जानते थे कि उनका लाल संसार का कल्याण करने गया है। उनका प्रेम निस्वार्थ था, इसलिए वे खुश थे कि उनके बेटे का जीवन एक महान उद्देश्य के लिए है।

शिक्षा: यह कहानी हमें सिखाती है कि सच्चा प्रेम निस्वार्थ होता है। यशोदा और नंद बाबा ने कृष्ण से बिना शर्त प्रेम किया। उन्होंने कभी यह नहीं सोचा कि वे उनके असली माता-पिता नहीं हैं। उनका प्रेम इतना पवित्र था कि भगवान कृष्ण भी उन्हें अपने सच्चे माता-पिता मानते थे। हमें भी अपने परिवार से ऐसा ही निस्वार्थ प्रेम करना चाहिए।

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