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विचित्रवीर्य का जन्म और मृत्यु – महाभारत की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा शांतनु का राज था। राजा शांतनु एक न्यायप्रिय और धर्मपरायण राजा थे। उनकी पहली पत्नी गंगा से एक पुत्र भीष्म हुआ था, जो अपनी प्रतिज्ञा के कारण आजीवन अविवाहित रहने का संकल्प ले चुका था।
एक दिन राजा शांतनु यमुना नदी के किनारे घूम रहे थे। वहाँ उन्होंने एक अत्यंत सुंदर कन्या को देखा। वह कन्या सत्यवती थी, जो एक मछुआरे की पुत्री थी। राजा शांतनु उस पर मोहित हो गए और उससे विवाह करना चाहते थे।
जब राजा शांतनु ने सत्यवती के पिता से उसका हाथ माँगा, तो मछुआरे ने एक शर्त रखी। उसने कहा, “महाराज, मैं अपनी पुत्री का विवाह आपसे तभी करूँगा जब आप वचन दें कि सत्यवती के पुत्र ही हस्तिनापुर के राजा बनेंगे।”
राजा शांतनु इस शर्त से परेशान हो गए क्योंकि भीष्म उनके ज्येष्ठ पुत्र थे। जब भीष्म को इस बात का पता चला, तो उन्होंने अपने पिता की खुशी के लिए एक महान त्याग किया। उन्होंने प्रतिज्ञा की कि वे कभी विवाह नहीं करेंगे और न ही राज्य का दावा करेंगे।
राजा शांतनु और सत्यवती का विवाह हुआ। कुछ समय बाद सत्यवती ने दो पुत्रों को जन्म दिया – चित्रांगद और विचित्रवीर्य। विचित्रवीर्य का जन्म एक शुभ मुहूर्त में हुआ था और सभी ने उसे हस्तिनापुर का भावी राजा माना।
जब राजा शांतनु की मृत्यु हुई, तो चित्रांगद राजा बने। परंतु दुर्भाग्य से, चित्रांगद की भी युद्ध में मृत्यु हो गई। अब विचित्रवीर्य हस्तिनापुर के राजा बने। वे अभी भी युवा थे और भीष्म उनके संरक्षक बने।
विचित्रवीर्य एक सुंदर और गुणवान राजकुमार थे। उनमें सभी राजसी गुण थे – वे दयालु, न्यायप्रिय और प्रजावत्सल थे। भीष्म ने उनके लिए उपयुक्त वधू की तलाश शुरू की।
उस समय काशी नरेश की तीन पुत्रियाँ थीं – अंबा, अंबिका और अंबालिका। तीनों राजकुमारियाँ अत्यंत सुंदर और गुणवती थीं। काशी नरेश ने उनके स्वयंवर का आयोजन किया था।
भीष्म ने सोचा कि ये राजकुमारियाँ विचित्रवीर्य के लिए उपयुक्त होंगी। स्वयंवर में जाकर, भीष्म ने अपनी वीरता का प्रदर्शन करते हुए तीनों राजकुमारियों का हरण किया और उन्हें हस्तिनापुर ले आए।
हस्तिनापुर पहुँचकर जब अंबा ने बताया कि वह पहले से ही राजा शाल्व से प्रेम करती है, तो भीष्म ने उसे वापस भेज दिया। अंबिका और अंबालिका का विवाह विचित्रवीर्य से हुआ।
विचित्रवीर्य अपनी दोनों पत्नियों के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। वे एक आदर्श पति और राजा थे। प्रजा उनसे बहुत प्रेम करती थी। परंतु भाग्य में कुछ और ही लिखा था।
कुछ वर्षों बाद, विचित्रवीर्य गंभीर रूप से बीमार पड़ गए। राज्य के सभी वैद्यों ने उनका इलाज किया, परंतु कोई फायदा नहीं हुआ। विचित्रवीर्य की मृत्यु कम उम्र में ही हो गई, और वे निःसंतान ही चल बसे।
विचित्रवीर्य की मृत्यु से पूरा हस्तिनापुर शोक में डूब गया। भीष्म, सत्यवती, अंबिका और अंबालिका सभी दुःखी थे। अब हस्तिनापुर के सिंहासन का कोई उत्तराधिकारी नहीं था।
सत्यवती ने भीष्म से कहा कि वे अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर विवाह करें और वंश को आगे बढ़ाएं। परंतु भीष्म ने अपनी प्रतिज्ञा का सम्मान करते हुए मना कर दिया।
तब सत्यवती ने अपने पुत्र व्यास से कहा कि वे नियोग प्रथा के अनुसार अंबिका और अंबालिका से संतान उत्पन्न करें। इस प्रकार धृतराष्ट्र और पांडु का जन्म हुआ, जो आगे चलकर महाभारत के मुख्य पात्र बने।
विचित्रवीर्य का जन्म और मृत्यु हमें सिखाता है कि जीवन अनिश्चित है। विचित्रवीर्य एक आदर्श राजा थे, परंतु उनकी अकाल मृत्यु ने दिखाया कि हमें हर पल का सदुपयोग करना चाहिए। उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी पत्नियों से जो संतान हुई, उन्होंने महाभारत के महान युद्ध में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जीवन में हमेशा अच्छे कर्म करने चाहिए। विचित्रवीर्य ने अपने छोटे से जीवन में भी प्रजा का कल्याण किया। हमें भी अपने जीवन में धर्म और न्याय का पालन करना चाहिए, चाहे हमारा जीवन कितना भी छोटा हो।











