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वत्सासुर का वध – श्री कृष्ण की वीरता की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण वृंदावन में अपने सखाओं के साथ गायों को चराने जाया करते थे। उस समय कंस राजा के भेजे गए अनेक असुर वृंदावन में आकर बालकों को हानि पहुंचाने का प्रयास करते रहते थे।
एक सुंदर प्रभात का समय था। सूर्य देव अपनी स्वर्णिम किरणों से धरती को जगा रहे थे। श्री कृष्ण अपने मित्रों बलराम, सुदामा, श्रीदामा और अन्य ग्वाल-बालों के साथ गायों को लेकर वन में चरने के लिए निकले। उनकी मधुर बांसुरी की आवाज़ से पूरा वन गूंज रहा था।
“आज हम गायों को नदी के उस पार ले चलते हैं, वहां हरी-भरी घास है,” कृष्ण ने अपने मित्रों से कहा। सभी बालक खुशी से हां कह दिए और गायों के साथ आगे बढ़ने लगे।
जब वे नदी के किनारे पहुंचे, तो वहां एक विशाल बछड़ा दिखाई दिया। वह अन्य बछड़ों से बहुत बड़ा और अलग दिख रहा था। उसकी आंखें लाल थीं और उसके शरीर से अजीब सी गंध आ रही थी।
“यह बछड़ा तो बहुत अजीब लग रहा है,” बलराम ने कृष्ण से कहा। “इसकी आंखों में क्रोध दिख रहा है।”
कृष्ण ने अपनी दिव्य दृष्टि से देखा और समझ गए कि यह कोई साधारण बछड़ा नहीं है। यह वत्सासुर नामक राक्षस था, जो बछड़े का रूप धारण करके उन्हें धोखा देने आया था। कंस ने इसे भेजा था कि यह कृष्ण और उनके मित्रों को हानि पहुंचाए।
वत्सासुर धीरे-धीरे गायों के झुंड में मिल गया। वह अपना असली रूप छुपाकर मौका देख रहा था कि कब वह कृष्ण पर आक्रमण करे। परंतु भगवान कृष्ण सब कुछ समझ चुके थे।
अचानक वत्सासुर ने अपना असली रूप दिखाया। वह एक भयानक राक्षस था, जिसके नुकीले दांत और लंबे नाखून थे। उसने जोर से दहाड़ लगाई और कृष्ण की ओर दौड़ा।
“सभी पीछे हट जाओ!” कृष्ण ने अपने मित्रों से कहा। सभी ग्वाल-बाल डर गए और दूर जाकर खड़े हो गए।
वत्सासुर ने कृष्ण पर आक्रमण किया। उसने अपने सींगों से कृष्ण को मारने का प्रयास किया, परंतु कृष्ण बहुत चतुर थे। वे आसानी से उसके आक्रमण से बच गए।
“तू समझता है कि तू मुझे हरा सकता है?” वत्सासुर ने गर्जना करते हुए कहा। “मैं कंस का सबसे शक्तिशाली योद्धा हूं!”
कृष्ण मुस्कराए और बोले, “हे दुष्ट! तूने निर्दोष बछड़े का रूप धारण करके छल किया है। अब तुझे अपने कर्मों का फल भुगतना होगा।”
इसके बाद एक रोमांचक युद्ध शुरू हुआ। वत्सासुर अपनी पूरी शक्ति से कृष्ण पर आक्रमण कर रहा था, परंतु कृष्ण उसके हर वार को आसानी से रोक रहे थे। कभी वे उछलकर उसके आक्रमण से बचते, कभी एक तरफ हटकर।
अंत में कृष्ण ने वत्सासुर की पूंछ पकड़ी और उसे हवा में घुमाने लगे। वत्सासुर चिल्लाने लगा, परंतु कृष्ण की पकड़ से छूट नहीं सका। कृष्ण ने उसे तेज़ी से घुमाया और फिर एक बड़े पेड़ पर दे मारा।
वत्सासुर का वध हो गया। वह अपने असली रूप में वापस आ गया और धरती पर गिर पड़ा। उसकी मृत्यु के साथ ही उसकी आत्मा को मोक्ष मिल गया, क्योंकि भगवान के हाथों मरना भी एक वरदान है।
सभी ग्वाल-बाल कृष्ण की वीरता देखकर प्रसन्न हो गए। वे ताली बजाकर कृष्ण की जय-जयकार करने लगे। “कृष्ण! तुमने फिर से हमारी रक्षा की है,” बलराम ने कहा।
गायें भी अब सुरक्षित थीं। वे शांति से घास चरने लगीं। कृष्ण ने अपनी बांसुरी उठाई और मधुर धुन बजाने लगे। पूरा वन फिर से खुशी से भर गया।
जब वे शाम को घर लौटे, तो माता यशोदा ने पूछा, “आज वन में कैसा दिन बीता, कन्हैया?”
कृष्ण ने मुस्कराते हुए कहा, “माता, आज भी सब कुशल रहा। गायें खुश हैं और हम सब सुरक्षित हैं।”
इस प्रकार भगवान कृष्ण ने एक बार फिर अपनी दिव्य शक्ति का प्रदर्शन करते हुए वत्सासुर का वध किया और वृंदावन को सुरक्षित रखा। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली हो, अच्छाई हमेशा उस पर विजय पाती है। हमें भी कृष्ण की तरह साहसी बनना चाहिए और गलत का सामना करना चाहिए।
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