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शिव-पार्वती की अद्भुत लीलाएं: गणेश जन्म कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती का निवास था। शिव-पार्वती लीलाएं सदा से ही संसार के कल्याण के लिए होती रही हैं। एक दिन माता पार्वती स्नान करने की तैयारी कर रही थीं।
“आज मैं शांति से स्नान करना चाहती हूं,” माता पार्वती ने सोचा। उन्होंने अपने शरीर के उबटन से एक सुंदर बालक का निर्माण किया और उसमें प्राण फूंक दिए। वह बालक तुरंत जीवित हो गया।
“माता, आपकी क्या सेवा करूं?” बालक ने विनम्रता से पूछा।
माता पार्वती ने प्रेम से कहा, “पुत्र, तुम द्वार पर खड़े होकर पहरा दो। जब तक मैं स्नान न कर लूं, किसी को भी अंदर मत आने देना।”
बालक ने माता की आज्ञा स्वीकार की और द्वार पर खड़ा हो गया। वह बहुत वीर और निडर था।
कुछ समय बाद भगवान शिव कैलाश लौटे। वे अपने घर में प्रवेश करना चाहते थे, लेकिन द्वार पर एक अनजान बालक को देखकर रुक गए।
“बालक, तुम कौन हो? मेरे घर के द्वार पर क्यों खड़े हो?” शिवजी ने पूछा।
बालक ने दृढ़ता से उत्तर दिया, “मैं माता पार्वती का पुत्र हूं। उन्होंने मुझे आज्ञा दी है कि जब तक वे स्नान न कर लें, किसी को भी अंदर न जाने दूं।”
भगवान शिव को बड़ा आश्चर्य हुआ। उन्होंने कहा, “मैं इस घर का स्वामी हूं। मुझे अंदर जाने दो।”
परंतु बालक ने मना कर दिया। “माफ करिए, लेकिन माता की आज्ञा के बिना मैं किसी को भी अंदर नहीं जाने दूंगा।”
शिव-पार्वती लीलाएं कभी-कभी इस प्रकार की परिस्थितियां उत्पन्न करती हैं जो संसार को शिक्षा देती हैं। भगवान शिव को क्रोध आ गया। उन्होंने अपना त्रिशूल उठाया और बालक का सिर काट दिया।
जब माता पार्वती स्नान करके बाहर आईं और अपने पुत्र की यह दशा देखी, तो वे बहुत दुखी हुईं। उनका क्रोध भयंकर रूप धारण कर गया।
“यह क्या किया आपने?” माता पार्वती ने रोते हुए कहा। “यह मेरा पुत्र था। मैंने इसे अपने हाथों से बनाया था।”
भगवान शिव को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने माता पार्वती से क्षमा मांगी और कहा, “प्रिये, मैं इस बालक को पुनः जीवित कर दूंगा।”
शिवजी ने अपने गणों को आज्ञा दी, “जाओ और उत्तर दिशा में जाकर पहला जीव जो तुम्हें मिले, उसका सिर काटकर ले आओ।”
गण तुरंत चल पड़े। उत्तर दिशा में उन्हें सबसे पहले एक हाथी मिला। उन्होंने हाथी का सिर काटा और वापस ले आए।
भगवान शिव ने हाथी का सिर बालक के धड़ पर रखा और अपनी दिव्य शक्ति से उसे जीवित कर दिया। बालक तुरंत खड़ा हो गया, लेकिन अब उसका सिर हाथी का था।
“माता, पिता, मैं आपका सेवक हूं,” बालक ने हाथ जोड़कर कहा।
माता पार्वती की खुशी का ठिकाना न रहा। भगवान शिव ने बालक को गले लगाया और कहा, “आज से तुम मेरे प्रिय पुत्र हो। तुम्हारा नाम गणेश होगा और तुम सभी गणों के नाथ होगे।”
इस प्रकार शिव-पार्वती लीलाएं संसार को एक महान देवता प्रदान करती हैं। भगवान शिव ने आगे कहा, “गणेश, तुम सभी कार्यों के प्रथम पूज्य होगे। कोई भी शुभ कार्य तुम्हारी पूजा के बिना संपन्न नहीं होगा।”
माता पार्वती ने भी आशीर्वाद दिया, “पुत्र, तुम विघ्न हर्ता होगे। जो भी तुम्हारी सच्चे मन से पूजा करेगा, उसके सभी विघ्न दूर हो जाएंगे।”
तभी से भगवान गणेश को विघ्नहर्ता और गणपति के नाम से जाना जाता है। सभी देवता भी गणेश जी का सम्मान करते हैं।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए। गणेश जी ने अपनी माता की आज्ञा का पालन किया और इसीलिए वे सबके प्रिय बने।
शिव-पार्वती लीलाएं हमेशा संसार का कल्याण करती हैं। यह कथा भी हमें सिखाती है कि कभी-कभी कठिनाइयों से भी अच्छे परिणाम निकलते हैं।
आज भी जब हम कोई नया काम शुरू करते हैं, तो सबसे पहले “गणपति बप्पा मोरया” कहकर गणेश जी का आशीर्वाद लेते हैं। वे हमारे सभी कार्यों में सफलता दिलाते हैं।
इस प्रकार भगवान शिव और माता पार्वती की यह लीला संपन्न हुई, जिससे संसार को गणेश जी जैसे महान देवता मिले।









