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पत्नी किसकी – बेताल पच्चीसी छठी कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान से निकलकर तांत्रिक के पास जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।
“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।
प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक सुंदर नगर था। वहाँ धर्मदत्त नाम का एक धनी सेठ रहता था। उसकी एक अत्यंत सुंदर कन्या थी जिसका नाम मालती था। मालती की सुंदरता की चर्चा दूर-दूर तक फैली हुई थी।
एक दिन मालती अपनी सखियों के साथ देवी के मंदिर गई। वहाँ उसकी भेंट तीन युवकों से हुई। पहला युवक सुंदरवर्मा था, जो अपनी सुंदरता के लिए प्रसिद्ध था। दूसरा था विद्यावान् जो अपनी विद्या और बुद्धि के लिए जाना जाता था। तीसरा था धनवान् जो अपार संपत्ति का स्वामी था।
तीनों युवकों ने मालती को देखते ही उससे प्रेम कर लिया। वे सभी उससे विवाह करना चाहते थे। मालती भी तीनों को देखकर असमंजस में पड़ गई कि वह किससे विवाह करे।
“पिताजी, मैं किससे विवाह करूं? तीनों ही अपने-अपने गुणों में श्रेष्ठ हैं।” मालती ने अपने पिता से कहा।
धर्मदत्त ने सोचा और कहा, “पुत्री, जो भी तुम्हारे लिए सबसे कठिन कार्य करे, उससे तुम्हारा विवाह होगा।”
इस बात की जानकारी तीनों युवकों को मिली। वे सभी मालती को प्रभावित करने के लिए तैयार हो गए।
कुछ दिनों बाद मालती अचानक बीमार पड़ गई और उसकी मृत्यु हो गई। तीनों युवक बहुत दुखी हुए। सुंदरवर्मा ने कहा, “मैं मालती की चिता के पास ही रहूंगा और उसकी राख की रक्षा करूंगा।”
विद्यावान् ने कहा, “मैं संसार त्यागकर तीर्थयात्रा पर जाऊंगा और मालती की आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करूंगा।”
धनवान् ने कहा, “मैं मालती की अस्थियों को गंगा में प्रवाहित करने ले जाऊंगा।”
सुंदरवर्मा मालती की चिता के पास रहकर उसकी राख की रक्षा करने लगा। विद्यावान् तीर्थयात्रा पर निकल गया। धनवान् मालती की अस्थियों को लेकर गंगा की ओर चल दिया।
तीर्थयात्रा के दौरान विद्यावान् को एक महान् ऋषि मिले। ऋषि के पास एक दिव्य मंत्र था जो मृत व्यक्ति को जीवित कर सकता था। विद्यावान् ने ऋषि से वह मंत्र सीखा।
जब विद्यावान् वापस लौटा तो उसने देखा कि सुंदरवर्मा अभी भी मालती की राख की रक्षा कर रहा था और धनवान् भी गंगा से वापस आ गया था।
विद्यावान् ने कहा, “मित्रों, मैंने एक ऐसा मंत्र सीखा है जो मालती को जीवित कर सकता है।”
तीनों ने मिलकर मंत्र का जाप किया। चमत्कार हुआ और मालती जीवित हो गई। वह पहले से भी अधिक सुंदर लग रही थी।
अब समस्या यह थी कि पत्नी किसकी होगी? तीनों ने अपना-अपना दावा पेश किया।
सुंदरवर्मा ने कहा, “मैंने मालती की राख की रक्षा की है, इसलिए वह मेरी पत्नी है।”
विद्यावान् ने कहा, “मैंने मंत्र सीखकर उसे जीवित किया है, इसलिए वह मेरी पत्नी है।”
धनवान् ने कहा, “मैंने उसकी अस्थियों को पवित्र गंगा में प्रवाहित किया है, इसलिए वह मेरी पत्नी है।”
तीनों में विवाद होने लगा। मामला राजा के पास पहुंचा। राजा भी असमंजस में पड़ गया कि न्याय क्या है।
बेताल ने कहानी समाप्त करके कहा, “राजा विक्रम! बताइए कि पत्नी किसकी होनी चाहिए? यदि आप जानते हुए भी चुप रहे तो आपका सिर फट जाएगा।”
राजा विक्रमादित्य ने सोचकर उत्तर दिया, “बेताल! मालती धनवान् की पत्नी होनी चाहिए। क्योंकि जिसने उसकी अस्थियों को गंगा में प्रवाहित किया, उसने उसे पिता का कर्तव्य निभाया। जिसने राख की रक्षा की, उसने भाई का कर्तव्य निभाया। और जिसने उसे जीवित किया, उसने पुत्र का कर्तव्य निभाया। केवल धनवान् ने ही पति का कर्तव्य निभाया है।”
“वाह राजन्! आपका उत्तर सही है।” यह कहकर बेताल फिर से पेड़ पर जा लटका।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हर रिश्ते का अपना महत्व और कर्तव्य होता है। सच्चा प्रेम वही है जो निस्वार्थ भाव से किया जाए।
इस प्रकार, सच्चे प्रेम और कर्तव्यों की महत्ता को समझना आवश्यक है।











