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पांडु और माद्री का विवाह – महाभारत की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा पांडु का शासन था। राजा पांडु एक वीर और न्यायप्रिय शासक थे। उनका पहला विवाह कुंती से हुआ था, जो एक गुणवान और धर्मपरायण रानी थी।
एक दिन राजा पांडु को मद्र देश की राजकुमारी माद्री के अद्भुत सौंदर्य और गुणों के बारे में पता चला। माद्री न केवल अत्यंत सुंदर थी, बल्कि वह बुद्धिमान, दयालु और सभी कलाओं में निपुण भी थी। उसकी प्रसिद्धि दूर-दूर तक फैली हुई थी।
राजा पांडु ने सोचा, “मद्र देश से संबंध स्थापित करना हस्तिनापुर के लिए अच्छा होगा। माद्री जैसी गुणवती कन्या से विवाह करना उचित रहेगा।”
पांडु ने अपने मंत्रियों से सलाह ली। सभी ने कहा कि यह विवाह राज्य के लिए हितकारी होगा। तब राजा पांडु ने मद्र देश के राजा शल्य के पास विवाह का प्रस्ताव भेजा।
मद्र देश के राजा शल्य को जब पांडु का संदेश मिला, तो वे बहुत प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा, “पांडु एक महान योद्धा और न्यायप्रिय राजा हैं। मेरी बहन माद्री के लिए इससे अच्छा वर कोई नहीं हो सकता।”
राजा शल्य ने तुरंत हस्तिनापुर में संदेश भेजा कि वे इस रिश्ते के लिए सहमत हैं। पांडु और माद्री का विवाह तय हो गया।
विवाह की तैयारियां शुरू हो गईं। हस्तिनापुर में खुशी का माहौल था। रानी कुंती ने भी इस विवाह का स्वागत किया और माद्री को अपनी छोटी बहन की तरह अपनाने का निश्चय किया।
विवाह का दिन आया। मद्र देश से एक भव्य बारात लेकर राजा शल्य हस्तिनापुर पहुंचे। माद्री अत्यंत सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनकर तैयार थी। उसका चेहरा चांद की तरह चमक रहा था।
विवाह समारोह में सभी रीति-रिवाज पूरे किए गए। पंडितों ने वैदिक मंत्रों का उच्चारण किया। पांडु और माद्री का विवाह बड़ी धूमधाम से संपन्न हुआ।
जब माद्री हस्तिनापुर के राजमहल में आई, तो रानी कुंती ने उसका हार्दिक स्वागत किया। कुंती ने कहा, “माद्री, तुम मेरी छोटी बहन हो। हम दोनों मिलकर इस राज्य की सेवा करेंगी।”
माद्री ने विनम्रता से उत्तर दिया, “दीदी, आपका आशीर्वाद मेरे साथ है तो मैं अपने कर्तव्यों का पालन अच्छी तरह कर सकूंगी।”
दोनों रानियों के बीच प्रेम और सम्मान का रिश्ता बना। वे एक-दूसरे का सहयोग करती थीं और राज्य के कल्याण में योगदान देती थीं।
राजा पांडु अपनी दोनों पत्नियों से बहुत प्रेम करते थे। वे न्याय के साथ दोनों का सम्मान करते थे। महल में शांति और खुशी का वातावरण था।
कुछ समय बाद, एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। शिकार के दौरान राजा पांडु पर एक ऋषि का श्राप लग गया। इस श्राप के कारण वे वन में जाकर तपस्या करने को विवश हो गए।
दोनों रानियां कुंती और माद्री ने अपने पति के साथ वन जाने का निश्चय किया। उन्होंने कहा, “पति के बिना महल में रहने से अच्छा है कि हम उनके साथ वन में कष्ट सहें।”
वन में रहते हुए, देवताओं की कृपा से कुंती को पांच पुत्र प्राप्त हुए – युधिष्ठिर, भीम और अर्जुन। माद्री को भी दो पुत्र मिले – नकुल और सहदेव। ये पांचों पुत्र पांडव कहलाए।
माद्री एक आदर्श पत्नी और माता थी। वह अपने पुत्रों नकुल और सहदेव को अच्छे संस्कार देती थी। वह कुंती के पुत्रों से भी उतना ही प्रेम करती थी जितना अपने पुत्रों से।
जब राजा पांडु का देहांत हुआ, तो माद्री का दुख असीम था। उसने अपने पति के साथ सती होने का निश्चय किया। उसने कुंती से कहा, “दीदी, मेरे पुत्रों की देखभाल करना। वे आपके पुत्रों के समान हैं।”
कुंती ने वादा किया कि वह सभी पांच पुत्रों को समान प्रेम देगी। माद्री की मृत्यु के बाद, कुंती ने अपना वचन निभाया और नकुल-सहदेव को अपने पुत्रों की तरह पाला।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि पारिवारिक रिश्तों में प्रेम, सम्मान और त्याग का महत्व होता है। माद्री और कुंती का रिश्ता दिखाता है कि सच्चा प्रेम ईर्ष्या से ऊपर होता है। एक आदर्श पत्नी और माता अपने परिवार के लिए हर कष्ट सहने को तैयार रहती है।














