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मोहिनी अवतार की कथा – अमृत वितरण की दिव्य गाथा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवता और असुर मिलकर समुद्र मंथन कर रहे थे। इस महान कार्य का उद्देश्य था अमृत प्राप्त करना, जो पीने वाले को अमर बना देता था। समुद्र मंथन के दौरान कई अनमोल रत्न निकले – कामधेनु गाय, उच्चैःश्रवा घोड़ा, ऐरावत हाथी, और अंत में धन्वंतरि भगवान अमृत कलश लेकर प्रकट हुए।
जैसे ही अमृत कलश दिखाई दिया, देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध छिड़ गया। सभी अमृत पाना चाहते थे। असुर बहुत शक्तिशाली थे और उन्होंने अमृत कलश छीन लिया। देवता परेशान हो गए और भगवान विष्णु के पास सहायता मांगने गए।
“हे प्रभु!” इंद्र देव ने कहा, “असुरों ने अमृत कलश छीन लिया है। यदि वे अमृत पी लेंगे तो अमर हो जाएंगे और तीनों लोकों में अत्याचार करेंगे। कृपया हमारी रक्षा करें।”
भगवान विष्णु मुस्कराए और बोले, “चिंता मत करो। मैं एक उपाय करूंगा।” तभी भगवान विष्णु ने अपनी माया शक्ति का प्रयोग किया और एक अत्यंत सुंदर स्त्री का रूप धारण किया। यह रूप इतना मनमोहक था कि उसे देखकर सभी मंत्रमुग्ध हो जाते थे। इस अवतार का नाम था मोहिनी।
मोहिनी अवतार धारण करके भगवान विष्णु असुरों के पास पहुंचे। उनकी सुंदरता देखकर सभी असुर मोहित हो गए। मोहिनी ने मधुर स्वर में कहा, “हे महान योद्धाओं! मैं देख रही हूं कि आप सब अमृत के लिए लड़ रहे हैं। क्यों न मैं इसका न्यायपूर्ण वितरण कर दूं?”
असुरों का राजा बलि बोला, “हे सुंदरी! तुम कौन हो? तुम्हारी सुंदरता देवलोक की अप्सराओं को भी मात देती है।”
मोहिनी ने मुस्कराते हुए कहा, “मैं समुद्र मंथन से निकली हूं। मेरा काम है न्याय करना। यदि आप चाहें तो मैं देवताओं और असुरों के बीच अमृत का बंटवारा कर सकती हूं।”
असुर मोहिनी की सुंदरता में इतने खो गए कि उन्होंने बिना सोचे-समझे हां कह दी। उन्होंने अमृत कलश मोहिनी को सौंप दिया। मोहिनी ने कहा, “आप सब दो पंक्तियों में बैठ जाइए – एक तरफ देवता और दूसरी तरफ असुर। मैं सबको न्याय के साथ अमृत दूंगी।”
सभी ने मोहिनी की बात मानी। देवता एक पंक्ति में बैठे और असुर दूसरी पंक्ति में। मोहिनी अवतार में भगवान विष्णु ने अमृत वितरण शुरू किया। वे पहले देवताओं की पंक्ति में गईं और उन्हें अमृत पिलाना शुरू किया।
मोहिनी की सुंदरता और मधुर वाणी में असुर इतने मोहित थे कि उन्हें पता ही नहीं चला कि केवल देवताओं को ही अमृत दिया जा रहा है। जब भी कोई असुर सवाल करता, मोहिनी अपनी मुस्कान से उसे शांत कर देती।
इसी बीच राहु नाम का एक चतुर असुर था। उसने देखा कि मोहिनी केवल देवताओं को अमृत दे रही है। राहु चुपचाप देवताओं की पंक्ति में जाकर सूर्य और चंद्रमा के बीच बैठ गया। जब मोहिनी उसके पास पहुंची तो उसने भी अमृत पिया।
लेकिन सूर्य और चंद्रमा ने राहु को पहचान लिया। उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु को इशारा किया। भगवान विष्णु ने अपना सुदर्शन चक्र चलाया और राहु का सिर काट दिया। लेकिन तब तक अमृत राहु के गले से नीचे नहीं उतरा था, इसलिए उसका सिर अमर हो गया। यही राहु आज भी सूर्य और चंद्रमा को ग्रहण लगाता है।
जब सभी देवताओं ने अमृत पी लिया, तब असुरों को एहसास हुआ कि वे धोखा खा गए हैं। वे बहुत क्रोधित हुए और मोहिनी पर आक्रमण करने दौड़े। तभी मोहिनी का रूप गायब हो गया और भगवान विष्णु अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए।
“हे असुरों!” भगवान विष्णु ने कहा, “तुमने स्वयं ही मुझसे अमृत वितरण करने को कहा था। मैंने न्याय किया है। देवता धर्म की रक्षा करते हैं, इसलिए वे अमृत के हकदार थे।”
असुरों को समझ आ गया कि वे भगवान विष्णु की माया में फंस गए थे। कुछ असुर क्रोधित हुए और युद्ध करना चाहा, लेकिन अब देवता अमृत पीकर शक्तिशाली हो गए थे। उन्होंने असुरों को हरा दिया।
इस प्रकार मोहिनी अवतार की कथा में भगवान विष्णु ने अपनी बुद्धि और माया से देवताओं की रक्षा की। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई पर अच्छाई की जीत होती है। धर्म की रक्षा के लिए भगवान हमेशा तैयार रहते हैं।
मोहिनी अवतार की यह गाथा यह भी दिखाती है कि भगवान विष्णु किसी भी रूप में आकर अपने भक्तों की रक्षा कर सकते हैं। उन्होंने स्त्री का रूप धारण करके दिखाया कि नारी शक्ति कितनी महान है।
अमृत वितरण की इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि लालच और अहंकार का अंत बुरा होता है। असुरों ने अपने अहंकार के कारण धोखा खाया। वहीं देवताओं ने विनम्रता से भगवान की शरण ली और विजयी हुए।
आज भी जब कोई व्यक्ति मुश्किल में होता है और सच्चे मन से भगवान विष्णु को याद करता है, तो वे किसी न किसी रूप में उसकी सहायता करते हैं। मोहिनी अवतार की कथा हमें याद दिलाती है कि धर्म और सत्य की हमेशा जीत होती है।
इस तरह समाप्त होती है मोहिनी अवतार की अद्भुत कथा, जो हमें सिखाती है कि भगवान अपने भक्तों की रक्षा के लिए कोई भी रूप धारण कर सकते हैं।















