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मधु-कैटभ वध: भगवान विष्णु की वीरता की कहानी

बहुत समय पहले, जब यह संसार अभी बना ही था, तब एक अद्भुत घटना घटी थी। उस समय भगवान विष्णु शेषनाग की शैया पर क्षीरसागर में योगनिद्रा में लीन थे। उनकी नाभि से एक सुंदर कमल निकला था, जिस पर ब्रह्मा जी विराजमान थे।

ब्रह्मा जी सृष्टि की रचना में व्यस्त थे। वे नए-नए जीवों और लोकों का निर्माण कर रहे थे। अचानक उन्होंने देखा कि भगवान विष्णु के कानों से दो बूंदें निकलीं। ये बूंदें पानी में गिरकर दो भयंकर राक्षसों में बदल गईं।

पहले राक्षस का नाम मधु था और दूसरे का नाम कैटभ था। ये दोनों राक्षस बहुत ही शक्तिशाली और दुष्ट थे। उनके शरीर पहाड़ों की तरह विशाल थे और आंखें आग की तरह जल रही थीं।

मधु और कैटभ ने जैसे ही आंखें खोलीं, वे चारों ओर देखने लगे। उन्होंने देखा कि ब्रह्मा जी कमल पर बैठकर सृष्टि की रचना कर रहे हैं। दोनों राक्षसों के मन में बुरे विचार आए।

“देखो कैटभ, यह कौन है जो हमारे सामने बैठा है?” मधु ने गर्जना करते हुए कहा।

“लगता है यह कोई देवता है, मधु। चलो इसे परेशान करते हैं,” कैटभ ने दुष्टता से मुस्कराते हुए उत्तर दिया।

दोनों राक्षस ब्रह्मा जी के पास पहुंचे और उन्हें डराने लगे। मधु-कैटभ ने ब्रह्मा जी से कहा, “हे छोटे देवता! तुम यहां क्या कर रहे हो? यह स्थान अब हमारा है।”

ब्रह्मा जी समझ गए कि ये दोनों राक्षस बहुत खतरनाक हैं। वे जानते थे कि अकेले वे इन दुष्ट राक्षसों का सामना नहीं कर सकते। उन्होंने तुरंत भगवान विष्णु को जगाने का निश्चय किया।

ब्रह्मा जी ने अपने हाथ जोड़कर भगवान विष्णु से प्रार्थना की, “हे प्रभु! कृपया जागिए। दो भयंकर राक्षस आपके कानों से उत्पन्न हुए हैं और वे सृष्टि को नष्ट करना चाहते हैं।”

लेकिन भगवान विष्णु गहरी योगनिद्रा में थे। वे नहीं जाग रहे थे। तब ब्रह्मा जी ने योगमाया देवी की स्तुति की। योगमाया देवी ने भगवान विष्णु की नींद हटा दी।

जैसे ही भगवान विष्णु की आंखें खुलीं, उन्होंने देखा कि दो विशाल राक्षस ब्रह्मा जी को परेशान कर रहे हैं। उनकी आंखों में क्रोध की चमक आई।

भगवान विष्णु ने गंभीर स्वर में कहा, “मधु और कैटभ! तुम दोनों यहां से चले जाओ और ब्रह्मा जी को परेशान करना बंद करो।”

लेकिन दोनों राक्षस हंसने लगे। मधु ने अहंकार से कहा, “तुम कौन होते हो हमें आदेश देने वाले? हम तुम्हारे ही शरीर से पैदा हुए हैं।”

कैटभ ने भी घमंड से कहा, “हां, और अब हम तुम्हें युद्ध की चुनौती देते हैं। यदि तुममें हिम्मत है तो हमारा सामना करो।”

भगवान विष्णु समझ गए कि अब युद्ध अवश्यंभावी है। वे अपनी शैया से उठे और अपने दिव्य अस्त्र-शस्त्र धारण किए। उनके हाथ में सुदर्शन चक्र चमक रहा था।

मधु-कैटभ वध का महान युद्ध शुरू हुआ। यह युद्ध हजारों वर्षों तक चला। दोनों राक्षस बहुत शक्तिशाली थे, लेकिन भगवान विष्णु उनसे भी अधिक बलवान थे।

युद्ध के दौरान मधु और कैटभ ने अपनी सारी शक्ति लगा दी। वे भगवान विष्णु पर तरह-तरह के अस्त्र फेंकते रहे। लेकिन भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र और अन्य दिव्य अस्त्रों से उनका सामना किया।

युद्ध इतना भयंकर था कि पूरा ब्रह्मांड हिल रहा था। समुद्र में बड़ी-बड़ी लहरें उठ रही थीं। देवता भी डर गए थे।

अंत में, भगवान विष्णु ने एक चतुर योजना बनाई। उन्होंने दोनों राक्षसों से कहा, “मधु और कैटभ, तुम दोनों वास्तव में बहुत वीर हो। मैं तुम्हारी वीरता से प्रभावित हूं।”

दोनों राक्षस खुश हो गए। उन्होंने कहा, “तो फिर हमारी जीत मान लो।”

भगवान विष्णु ने मुस्कराते हुए कहा, “नहीं, लेकिन मैं तुम्हें एक वरदान देना चाहता हूं। तुम जो चाहो मांग सकते हो।”

मधु और कैटभ ने सोचा कि वे जीत गए हैं। उन्होंने कहा, “ठीक है, तो हम भी तुम्हें एक वरदान देते हैं। तुम जो चाहो मांग सकते हो।”

भगवान विष्णु ने तुरंत कहा, “मैं चाहता हूं कि तुम दोनों मेरे हाथों मृत्यु को प्राप्त हो जाओ।”

दोनों राक्षस समझ गए कि वे चालाकी में फंस गए हैं। लेकिन अब वे अपना वचन वापस नहीं ले सकते थे। उन्होंने केवल एक शर्त रखी कि वे पानी में नहीं मरना चाहते।

उस समय चारों ओर केवल पानी ही पानी था। भगवान विष्णु ने अपनी जांघों को फैलाया और उन्हें सूखी जगह बना दिया। फिर उन्होंने अपने सुदर्शन चक्र से मधु-कैटभ वध किया।

दोनों राक्षसों के मरने के बाद, उनके शरीर से पृथ्वी का निर्माण हुआ। इसीलिए पृथ्वी को मधु-कैटभ की हड्डियों से बनी हुई कहा जाता है।

ब्रह्मा जी बहुत खुश हुए। उन्होंने भगवान विष्णु की स्तुति की और कहा, “प्रभु, आपने सृष्टि की रक्षा की है। अब मैं शांति से अपना कार्य कर सकूंगा।”

इस प्रकार मधु-कैटभ वध की यह महान कथा समाप्त हुई। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली हो, अंत में सत्य और धर्म की ही जीत होती है। भगवान विष्णु हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और दुष्टों का नाश करते हैं।

आज भी जब हम मुश्किल में होते हैं, तो भगवान विष्णु की इस वीरता को याद करके हिम्मत पाते हैं। वे हमारे रक्षक हैं और हमेशा हमारी सहायता के लिए तैयार रहते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि बुद्धिमानी और साहस से हर समस्या का समाधान किया जा सकता है।

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