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खिचड़ी पकाने की शर्त – बीरबल की बुद्धिमानी

सर्दियों का मौसम था और दिल्ली में कड़ाके की ठंड पड़ रही थी। बादशाह अकबर अपने महल में आग के पास बैठकर गर्माहट ले रहे थे। तभी उनके मन में एक विचार आया।

“बीरबल!” अकबर ने आवाज लगाई।

“जी हुजूर, हाजिर है।” बीरबल ने सलाम करते हुए कहा।

अकबर ने मुस्कराते हुए कहा, “बीरबल, आज मैं तुम्हें एक चुनौती देता हूं। यदि तुम इस कड़ाके की सर्दी में बिना आग के खिचड़ी पका सको, तो मैं तुम्हें हजार स्वर्ण मुद्राएं दूंगा।”

दरबारी हंसने लगे। उन्हें लगा कि इस बार बीरबल की हार निश्चित है। आखिर बिना आग के खिचड़ी कैसे पक सकती है?

बीरबल ने शांति से कहा, “हुजूर, मैं आपकी यह चुनौती स्वीकार करता हूं। लेकिन मुझे तीन दिन का समय चाहिए।”

“ठीक है, तुम्हें तीन दिन मिले।” अकबर ने कहा।

अगले दिन सुबह बीरबल अपने घर के आंगन में गया। उसने एक बड़ा सा काला पत्थर लिया और उसे धूप में रख दिया। दिन भर तेज धूप में वह पत्थर गर्म होता रहा।

शाम को बीरबल ने उस गर्म पत्थर को कपड़े में लपेटा और रात भर उसे गर्म रखा। दूसरे दिन फिर वही प्रक्रिया दोहराई।

तीसरे दिन बीरबल दरबार में पहुंचा। उसके हाथ में एक छोटा सा बर्तन था जिसमें पकी हुई खिचड़ी थी।

“हुजूर, यह रही आपकी खिचड़ी।” बीरबल ने बर्तन अकबर के सामने रखा।

अकबर और सभी दरबारी हैरान रह गए। अकबर ने खिचड़ी चखी – वह बिल्कुल पकी हुई थी।

“यह कैसे संभव है बीरबल? तुमने आग का इस्तेमाल कैसे नहीं किया?” अकबर ने पूछा।

बीरबल ने मुस्कराते हुए कहा, “हुजूर, मैंने सूर्य देव की आग का इस्तेमाल किया है। दिन में पत्थर को धूप में गर्म करके, रात में उसकी गर्मी से खिचड़ी पकाई है। यह भी तो प्राकृतिक आग ही है।”

अकबर खुश हो गए। उन्होंने कहा, “वाह बीरबल! तुमने एक बार फिर अपनी बुद्धिमानी का परिचय दिया है। लेकिन मैं तुम्हें एक और चुनौती देता हूं।”

“जी हुजूर, कहिए।” बीरबल ने कहा।

“अब तुम्हें बिना सूर्य की गर्मी के खिचड़ी पकानी होगी।” अकबर ने कहा।

बीरबल ने सोचा और फिर कहा, “हुजूर, यदि मैं यह भी कर दूं तो क्या मिलेगा?”

“दो हजार स्वर्ण मुद्राएं।” अकबर ने कहा।

अगले दिन बीरबल ने एक अलग तरीका अपनाया। उसने चावल और दाल को पानी में भिगोया और फिर उन्हें एक कपड़े में बांधकर अपने शरीर की गर्मी से पकाने की कोशिश की। लेकिन यह तरीका काम नहीं आया।

तब बीरबल को एक और विचार आया। उसने गाय के गोबर के उपले बनाए और उन्हें सुखाया। फिर रगड़कर आग जलाई और खिचड़ी पकाई।

दरबार में पहुंचकर बीरबल ने कहा, “हुजूर, यह खिचड़ी मैंने गोबर के उपलों से पकाई है। यह भी प्राकृतिक ईंधन है, न कि कृत्रिम आग।”

अकबर हंसने लगे। “बीरबल, तुम हमेशा कोई न कोई रास्ता निकाल ही लेते हो। लेकिन अब मैं तुम्हें असली चुनौती देता हूं।”

“जी हुजूर।”

“अब तुम्हें बिना किसी गर्मी के स्रोत के खिचड़ी पकानी होगी – न सूर्य की गर्मी, न आग, न उपले, कुछ भी नहीं।”

इस बार बीरबल भी सोच में पड़ गया। वह जानता था कि यह असंभव है। तब उसे एक चतुर विचार आया।

अगले दिन बीरबल दरबार में आया और बोला, “हुजूर, मैं हार मान लेता हूं। बिना गर्मी के खिचड़ी पकाना असंभव है। लेकिन मैं आपसे एक सवाल पूछना चाहता हूं।”

“पूछो।” अकबर ने कहा।

“हुजूर, क्या आप बिना पानी के नहाने की चुनौती स्वीकार करेंगे?” बीरबल ने पूछा।

अकबर हंसने लगे। “यह तो असंभव है बीरबल।”

“बिल्कुल सही कहा हुजूर। जैसे बिना पानी के नहाना असंभव है, वैसे ही बिना गर्मी के खाना पकाना भी असंभव है। हर काम के लिए उसके मूल तत्व की जरूरत होती है।” बीरबल ने समझाया。

अकबर को बीरबल की बात समझ आ गई। उन्होंने कहा, “तुम सही कह रहे हो बीरबल। मैंने तुमसे असंभव चुनौती की थी। तुम्हारी बुद्धिमानी के लिए यह हजार स्वर्ण मुद्राएं तुम्हारी हैं।”

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हर समस्या का समाधान बुद्धि और धैर्य से निकाला जा सकता है। लेकिन कुछ चीजें प्रकृति के नियमों के अनुसार ही होती हैं, और हमें उन्हें स्वीकार करना चाहिए। बीरबल ने दिखाया कि असंभव लगने वाले काम भी रचनात्मक सोच से संभव हो सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक नियमों का सम्मान करना भी जरूरी है।

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