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गुरु नानक का रामेश्वरम् में उपदेश – सत्य की शिक्षा
बहुत समय पहले की बात है, जब गुरु नानक देव जी अपनी धर्म यात्रा पर निकले थे। वे भारत के कोने-कोने में जाकर लोगों को सत्य और प्रेम का संदेश देते थे। इसी यात्रा के दौरान वे दक्षिण भारत के पवित्र तीर्थ स्थल रामेश्वरम् पहुंचे।
रामेश्वरम् का मंदिर अपनी भव्यता के लिए प्रसिद्ध था। यहां दूर-दूर से श्रद्धालु आते थे। गुरु नानक जी जब मंदिर के पास पहुंचे, तो उन्होंने देखा कि एक बूढ़ा ब्राह्मण बड़ी श्रद्धा से समुद्र की ओर मुंह करके पानी चढ़ा रहा था।
“हे भगवान, मेरे पूर्वजों को यह जल पहुंचे,” वह ब्राह्मण बार-बार कह रहा था और अपनी अंजुली में पानी लेकर सूर्य की दिशा में फेंक रहा था।
गुरु नानक जी यह देखकर मुस्कराए और वे भी समुद्र के किनारे गए। उन्होंने अपनी अंजुली में पानी लिया और उल्टी दिशा में, पश्चिम की ओर फेंकने लगे।
यह देखकर ब्राह्मण जी हैरान हो गए। वे गुरु नानक के पास आए और बोले, “हे महात्मा जी, आप गलत दिशा में पानी फेंक रहे हैं। पूर्वजों को जल पहुंचाने के लिए सूर्य की दिशा में पानी चढ़ाना चाहिए।”
गुरु नानक जी ने विनम्रता से उत्तर दिया, “भाई साहब, मैं अपने खेतों को पानी दे रहा हूं। मेरे खेत पंजाब में हैं, इसलिए मैं पश्चिम दिशा में पानी फेंक रहा हूं।”
ब्राह्मण जी हंसे और बोले, “यह कैसी मूर्खता की बात है! भला यहां से फेंका गया पानी पंजाब तक कैसे पहुंच सकता है?”
गुरु नानक जी की आंखों में करुणा थी। वे बोले, “जब मेरा पानी पंजाब तक नहीं पहुंच सकता, तो आपका पानी आपके पूर्वजों तक कैसे पहुंचेगा जो इससे भी कहीं दूर हैं?”
इस बात को सुनकर ब्राह्मण जी सोच में पड़ गए। धीरे-धीरे मंदिर के अन्य पुजारी और श्रद्धालु भी वहां इकट्ठे हो गए। सभी गुरु नानक के इस रामेश्वरम् में उपदेश को सुनने के लिए उत्सुक थे।
गुरु नानक जी ने सभी को संबोधित करते हुए कहा, “हे भाइयों, सच्ची भक्ति केवल बाहरी कर्मकांडों में नहीं है। ईश्वर हमारे हृदय में बसता है। यदि हमारा मन पवित्र है, हमारे कर्म अच्छे हैं, तो हमें किसी विशेष स्थान या रीति-रिवाज की आवश्यकता नहीं।”
एक युवा पुजारी ने प्रश्न किया, “गुरु जी, तो क्या तीर्थ यात्रा व्यर्थ है?”
गुरु नानक जी ने समझाया, “तीर्थ यात्रा तब सार्थक है जब हम अपने मन को भी पवित्र बनाएं। यदि हम यहां आकर भी अहंकार, लालच और द्वेष से भरे रहें, तो यात्रा का कोई फायदा नहीं। सच्चा तीर्थ तो हमारे अंदर है।”
रामेश्वरम् के मुख्य पुजारी जी भी वहां आ गए थे। उन्होंने गुरु नानक से पूछा, “महात्मा जी, आप हमें सच्ची भक्ति का मार्ग बताइए।”
गुरु नानक जी ने अपना रामेश्वरम् में उपदेश जारी रखते हुए कहा, “सच्ची भक्ति में तीन बातें हैं – सत्य, संतोष और सेवा। हमेशा सच बोलो, जो मिला है उसमें संतुष्ट रहो, और दूसरों की निस्वार्थ सेवा करो। यही सच्चा धर्म है।”
एक बुजुर्ग महिला ने पूछा, “गुरु जी, हम गरीब लोग बड़े दान-पुण्य नहीं कर सकते। हमारे लिए क्या उपाय है?”
गुरु नानक जी ने प्रेम से कहा, “माता जी, सबसे बड़ा दान है – दयालुता। किसी भूखे को रोटी देना, प्यासे को पानी देना, दुखी को सांत्वना देना – यही सच्चा दान है। ईश्वर के लिए धन की नहीं, प्रेम की आवश्यकता है।”
सूर्यास्त का समय हो रहा था। समुद्र की लहरें मंद-मंद बह रही थीं। गुरु नानक जी ने अपने उपदेश का समापन करते हुए कहा, “जैसे यह समुद्र सभी नदियों का पानी स्वीकार करता है, वैसे ही ईश्वर सभी जातियों, धर्मों के लोगों से प्रेम करता है। हमें भी सभी के साथ प्रेम और सम्मान से पेश आना चाहिए।”
उस दिन रामेश्वरम् में उपदेश सुनकर सैकड़ों लोगों के हृदय में सच्चे धर्म की ज्योति जली। वे समझ गए कि असली तीर्थ बाहर नहीं, बल्कि हमारे अंदर है।
गुरु नानक जी के जाने के बाद भी रामेश्वरम् के लोग उनकी शिक्षाओं को याद करते रहे। वह ब्राह्मण जी, जो पहले पानी चढ़ाते थे, अब गरीबों की सेवा में लग गए। मंदिर के पुजारी भी सभी जातियों के लोगों का स्वागत करने लगे।
शिक्षा: इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि सच्चा धर्म बाहरी दिखावे में नहीं, बल्कि हमारे अच्छे कर्मों और पवित्र मन में है। ईश्वर सभी से समान प्रेम करता है, और हमें भी सभी के साथ प्रेम और दया का व्यवहार करना चाहिए।














