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गुरु नानक की मक्का-मदीना यात्रा की पावन कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब गुरु नानक देव जी अपनी धर्म यात्राओं पर निकले थे। वे सभी धर्मों के पवित्र स्थानों पर जाकर लोगों को सच्चाई का संदेश देते थे। उनके साथ उनके वफादार साथी मरदाना भी थे, जो हमेशा अपना रबाब लेकर चलते थे।
एक दिन गुरु नानक जी ने मरदाना से कहा, “मरदाना, अब हमें मक्का-मदीना की यात्रा करनी चाहिए। वहाँ भी परमात्मा के भक्त रहते हैं और हमें उन्हें सच्चे धर्म का संदेश देना है।”
मरदाना ने कहा, “गुरु जी, वह तो बहुत दूर है और वहाँ के लोग हमारी बात सुनेंगे भी या नहीं?”
गुरु नानक जी मुस्कराए और बोले, “मरदाना, सच्चाई की कोई सीमा नहीं होती। जहाँ भी इंसान हैं, वहाँ परमात्मा का संदेश पहुँचाना हमारा कर्तव्य है।”
इस प्रकार दोनों साथी मक्का-मदीना की घटना के लिए तैयार हुए। उन्होंने लंबी यात्रा की और आखिरकार मक्का पहुँचे। वहाँ पहुँचकर गुरु नानक जी ने देखा कि हजारों श्रद्धालु काबा की परिक्रमा कर रहे थे।
रात के समय जब गुरु जी आराम करने लेटे, तो उन्होंने अपने पैर काबा की दिशा में कर लिए। यह देखकर वहाँ के कुछ लोग बहुत गुस्से में आ गए।
एक व्यक्ति ने कहा, “यह कैसी बेअदबी है! तुम अपने पैर हमारे पवित्र काबा की तरफ कैसे कर सकते हो?”
गुरु नानक जी शांति से बोले, “भाई, मैं बहुत थका हुआ हूँ। कृपया मेरे पैर उस दिशा में कर दो जहाँ परमात्मा नहीं है।”
वह व्यक्ति गुस्से में गुरु जी के पैर पकड़कर दूसरी दिशा में करने लगा। लेकिन आश्चर्य की बात यह थी कि जिस भी दिशा में वह गुरु जी के पैर करता, काबा भी उसी दिशा में घूम जाता।
यह अद्भुत मक्का-मदीना की घटना देखकर सभी लोग हैरान रह गए। वे समझ गए कि यह कोई साधारण व्यक्ति नहीं है।
गुरु नानक जी ने समझाया, “देखो भाइयों, परमात्मा हर दिशा में है, हर जगह है। वह किसी एक स्थान तक सीमित नहीं है। सच्ची भक्ति यह है कि हम अपने दिल में उसे बसाएं, न कि केवल बाहरी रीति-रिवाजों में उलझें।”
इसके बाद गुरु जी मदीना भी गए। वहाँ भी उन्होंने लोगों को यही संदेश दिया कि सभी धर्म एक ही परमात्मा की राह दिखाते हैं। जाति, धर्म, और रंग-भेद से ऊपर उठकर हमें मानवता की सेवा करनी चाहिए।
मदीना में एक बुजुर्ग ने पूछा, “आप कौन हैं और कहाँ से आए हैं?”
गुरु नानक जी ने उत्तर दिया, “मैं न हिंदू हूँ, न मुसलमान। मैं सिर्फ परमात्मा का दास हूँ और उसी का संदेश लेकर आया हूँ।”
यह सुनकर वहाँ के कई विद्वान गुरु जी से मिलने आए। उन्होंने धर्म और आध्यात्म पर गहरी चर्चा की। गुरु जी ने उन्हें बताया कि सच्चा धर्म प्रेम, दया, और सेवा में है।
मक्का-मदीना की घटना के दौरान गुरु नानक जी ने यह भी सिखाया कि परमात्मा के सामने सभी बराबर हैं। अमीर हो या गरीब, राजा हो या प्रजा, सभी उसकी संतान हैं।
मरदाना ने देखा कि कैसे गुरु जी के सरल शब्दों ने लोगों के दिलों को छू लिया था। वहाँ के कई लोग गुरु जी के शिष्य बन गए और उनसे जीवन जीने की सही राह सीखी।
जब वापसी का समय आया, तो वहाँ के लोगों ने गुरु जी से विनती की कि वे और कुछ दिन रुकें। लेकिन गुरु जी ने कहा, “मेरा काम यहाँ पूरा हो गया है। अब मुझे और जगह जाकर लोगों तक सच्चाई का संदेश पहुँचाना है।”
इस प्रकार मक्का-मदीना की घटना समाप्त हुई, लेकिन इसका संदेश आज भी हमारे दिलों में जीवित है। गुरु नानक जी ने सिखाया कि धर्म का मतलब आपस में लड़ना नहीं, बल्कि प्रेम और एकता से रहना है।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि परमात्मा सभी जगह है और सभी धर्म उसी तक पहुँचने के अलग-अलग रास्ते हैं। हमें किसी भी धर्म या जाति के लोगों से भेदभाव नहीं करना चाहिए। सच्ची भक्ति दिल की पवित्रता और अच्छे कर्मों में है, न कि केवल बाहरी दिखावे में।











