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गोपाल कृष्ण गोखले: राष्ट्र के महान शिक्षक

बहुत समय पहले, जब हमारा भारत अंग्रेजों के शासन में था, तब महाराष्ट्र के एक छोटे से गाँव कोटलुक में एक विशेष बालक का जन्म हुआ। यह बालक था गोपाल कृष्ण गोखले, जो आगे चलकर भारत माता के सच्चे सेवक बने।

गोपाल के पिता कृष्ण राव गोखले एक साधारण किसान थे, और माता वालुबाई एक धर्मपरायण महिला थीं। घर में गरीबी थी, लेकिन माता-पिता के दिल में अपने बेटे को पढ़ाने की प्रबल इच्छा थी।

“बेटा गोपाल,” माता वालुबाई कहती थीं, “पढ़ाई ही तुम्हारा सच्चा धन है। इससे तुम न केवल अपना बल्कि देश का भी भला कर सकोगे।”

छोटे गोपाल बड़े ध्यान से माँ की बात सुनते और मन में ठान लेते कि वे जरूर पढ़ेंगे। गाँव के स्कूल में गोपाल सबसे होशियार छात्र थे। उनकी स्मरण शक्ति इतनी तेज़ थी कि एक बार पढ़ी गई बात वे कभी नहीं भूलते थे।

जब गोपाल कृष्ण गोखले दस साल के हुए, तो उनके गुरुजी ने उनके पिता से कहा, “कृष्ण राव जी, आपका बेटा बहुत प्रतिभाशाली है। इसे आगे की पढ़ाई के लिए शहर भेजना चाहिए।”

यह सुनकर कृष्ण राव की आँखों में आँसू आ गए। वे बोले, “गुरुजी, हमारे पास इतने पैसे कहाँ हैं कि बेटे को शहर भेज सकें?”

लेकिन गुरुजी ने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने गाँव के अन्य लोगों से मदद माँगी और आखिरकार गोपाल को पुणे भेजने का इंतजाम हो गया।

पुणे में गोपाल ने कड़ी मेहनत की। वे सुबह जल्दी उठते, पढ़ाई करते, और रात देर तक किताबों में डूबे रहते। उनके सहपाठी कभी-कभी उनसे पूछते, “गोपाल, तुम इतनी मेहनत क्यों करते हो?”

गोपाल मुस्कराकर जवाब देते, “मित्रों, मैं सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि अपने देश के लिए पढ़ रहा हूँ। हमारा भारत गुलाम है, और शिक्षा ही वह हथियार है जो हमें आजादी दिला सकती है।”

समय बीतता गया और गोपाल कृष्ण गोखले एक प्रसिद्ध शिक्षक बन गए। वे फर्ग्यूसन कॉलेज में पढ़ाते थे और अपने छात्रों को न केवल किताबी ज्ञान देते थे, बल्कि देशभक्ति की भावना भी जगाते थे।

एक दिन कॉलेज में एक विशेष सभा हुई। गोखले जी ने अपने छात्रों से कहा, “बच्चों, हमारे देश की स्थिति बहुत दुखदायी है। अंग्रेज हमसे भारी कर वसूलते हैं, हमारे साथ भेदभाव करते हैं। लेकिन हमें हिंसा का रास्ता नहीं अपनाना चाहिए।”

“तो फिर हम क्या करें, गुरुजी?” एक छात्र ने पूछा.

“हमें शिक्षा और शांतिपूर्ण तरीकों से अपने अधिकारों की माँग करनी चाहिए,” गोखले जी ने समझाया। “क्रोध और हिंसा से कुछ नहीं मिलता, बल्कि बुद्धि और धैर्य से हम अपना लक्ष्य पा सकते हैं।”

इसी समय गोखले जी की मुलाकात एक युवक से हुई, जिसका नाम था मोहनदास करमचंद गांधी। गांधी जी दक्षिण अफ्रीका से भारत लौटे थे और गोपाल कृष्ण गोखले को अपना राजनीतिक गुरु मानते थे।

“गोखले जी,” गांधी जी ने कहा, “आपने मुझे सिखाया है कि सत्य और अहिंसा ही हमारे सबसे बड़े हथियार हैं। मैं आपके बताए रास्ते पर चलूँगा।”

गोखले जी मुस्कराए और बोले, “मोहन, तुम्हारे अंदर कुछ खास बात है। मुझे विश्वास है कि तुम एक दिन हमारे देश को आजादी दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाओगे।”

गोखले जी ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी महत्वपूर्ण काम किया। वे तीन बार कांग्रेस के अध्यक्ष बने और हमेशा शांतिपूर्ण तरीकों से अंग्रेजों से भारतीयों के अधिकारों की माँग करते रहे।

एक बार ब्रिटिश सरकार ने भारतीयों पर बहुत भारी कर लगा दिया। लोग परेशान थे और कुछ लोग हिंसक विरोध करना चाहते थे। लेकिन गोपाल कृष्ण गोखले ने सबको समझाया।

“भाइयों,” उन्होंने एक बड़ी सभा में कहा, “हिंसा से हमें कुछ नहीं मिलेगा। हमें अपनी बात को तर्क और प्रमाणों के साथ रखना चाहिए। मैं सरकार से मिलकर इस अन्याय के खिलाफ आवाज उठाऊंगा।”

गोखले जी ने वास्तव में ब्रिटिश अधिकारियों से मुलाकात की और उन्हें समझाया कि यह कर भारतीय जनता के लिए कितना हानिकारक है। उनकी बातों का प्रभाव हुआ और कर में कमी की गई।

गोखले जी का सबसे बड़ा सपना था भारत में शिक्षा का प्रसार। उन्होंने “सर्वेंट्स ऑफ इंडिया सोसाइटी” नामक संस्था बनाई, जिसका उद्देश्य था देश की सेवा करना और शिक्षा फैलाना।

“शिक्षा ही हमारी मुक्ति का रास्ता है,” वे अक्सर कहते थे। “जब तक हमारे देश का हर बच्चा शिक्षित नहीं होगा, तब तक हम सच्ची आजादी नहीं पा सकते।”

गोखले जी की मेहनत और त्याग को देखकर लोग उन्हें “राष्ट्र के शिक्षक” कहने लगे। वे न केवल स्कूल-कॉलेज में पढ़ाते थे, बल्कि पूरे देश को सही रास्ता दिखाते थे।

एक दिन गोखले जी बीमार पड़ गए। डॉक्टर ने उन्हें आराम करने की सलाह दी, लेकिन वे अपने काम से रुक नहीं सकते थे। वे बिस्तर पर लेटे-लेटे भी देश की समस्याओं के बारे में सोचते रहते थे।

“गोखले जी, आप आराम कीजिए,” उनके मित्र कहते थे.

“मित्र,” गोखले जी कमजोर आवाज में कहते, “जब तक मेरे देश के लोग दुखी हैं, मैं कैसे आराम कर सकता हूँ? मेरा जीवन देश की सेवा के लिए है।”

15 फरवरी 1915 को, मात्र 49 साल की उम्र में, गोपाल कृष्ण गोखले इस संसार को छोड़कर चले गए। उनकी मृत्यु की खबर सुनकर पूरा देश शोक में डूब गया.

महात्मा गांधी ने उनकी मृत्यु पर कहा था, “गोखले जी मेरे राजनीतिक गुरु थे। उन्होंने मुझे सिखाया कि देश की सेवा कैसे करनी चाहिए। उनकी शिक्षाएँ हमेशा मेरे साथ रहेंगी।”

आज भी जब हम गोपाल कृष्ण गोखले को याद करते हैं, तो हमें उनकी वे बातें याद आती हैं जो उन्होंने अपने जीवन से सिखाईं:

पहला पाठ: शिक्षा सबसे बड़ी शक्ति है। गोखले जी ने दिखाया कि पढ़ाई-लिखाई से ही हम अपने और देश के जीवन को बेहतर बना सकते हैं.

दूसरा पाठ: धैर्य और शांति से बड़ी से बड़ी समस्या का समाधान हो सकता है। उन्होंने कभी हिंसा का रास्ता नहीं अपनाया.

तीसरा पाठ: देश की सेवा सबसे बड़ा धर्म है। गोखले जी ने अपना पूरा जीवन भारत माता की सेवा में लगा दिया.

चौथा पाठ: गुरु का सम्मान करना चाहिए। जैसे गांधी जी ने गोखले जी को अपना गुरु माना, वैसे ही हमें भी अपने शिक्षकों का आदर करना चाहिए.

आज जब तुम स्कूल जाते हो, तो याद रखना कि गोपाल कृष्ण गोखले जैसे महान व्यक्ति ने तुम्हारे लिए शिक्षा का रास्ता आसान बनाया है। उन्होंने दिखाया कि पढ़ाई-लिखाई से ही हम अपने सपनों को पूरा कर सकते हैं और अपने देश का नाम रोशन कर सकते हैं.

इस प्रकार गोपाल कृष्ण गोखले का जीवन हमें सिखाता है कि सच्ची देशभक्ति हिंसा में नहीं, बल्कि शिक्षा, सेवा और त्याग में है। वे हमेशा हमारे दिलों में जीवित रहेंगे और हमें सही रास्ता दिखाते रहेंगे.

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