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गणेश जी का द्वारपाल बनना – माता की रक्षा का संकल्प
बहुत समय पहले की बात है, जब कैलाश पर्वत पर भगवान शिव और माता पार्वती का निवास था। माता पार्वती अपने दैनिक कार्यों में व्यस्त रहती थीं, परंतु उन्हें एक समस्या का सामना करना पड़ता था। जब वे स्नान करने जातीं या अपने निजी कार्य करतीं, तो कोई भी बिना अनुमति के उनके कक्ष में प्रवेश कर जाता था।
एक दिन माता पार्वती ने सोचा, “मुझे एक ऐसे द्वारपाल की आवश्यकता है जो मेरी रक्षा करे और बिना मेरी अनुमति के किसी को भी अंदर न आने दे।” यह विचार आते ही उन्होंने एक अद्भुत निर्णय लिया।
माता पार्वती ने अपने शरीर से उबटन लेकर एक सुंदर बालक की मूर्ति बनाई। उस मूर्ति में अपनी शक्ति का संचार करते हुए, उन्होंने उसे जीवन प्रदान किया। इस प्रकार एक तेजस्वी और बलवान बालक का जन्म हुआ, जिसे माता ने अपना पुत्र माना।
“हे वत्स!” माता पार्वती ने प्रेम से कहा, “तुम मेरे द्वारपाल बनोगे। जब मैं स्नान करूं या अपने निजी कार्य करूं, तो तुम्हें द्वार पर खड़े होकर मेरी रक्षा करनी होगी। बिना मेरी अनुमति के किसी को भी अंदर नहीं आने देना।”
बालक ने माता के चरणों में प्रणाम करते हुए कहा, “माता जी, मैं आपकी रक्षा का संकल्प लेता हूं। आपकी आज्ञा का पालन करना मेरा धर्म है।”
इस प्रकार गणेश जी का द्वारपाल बनना प्रारंभ हुआ। वे माता पार्वती के कक्ष के द्वार पर खड़े होकर पहरा देने लगे। उनका संकल्प दृढ़ था और वे अपने कर्तव्य के प्रति पूर्णतः समर्पित थे।
कुछ दिन बाद, भगवान शिव तपस्या से लौटे। वे अपने घर जाना चाहते थे, परंतु द्वार पर एक अपरिचित बालक को खड़ा देखकर आश्चर्यचकित हुए। गणेश जी ने विनम्रता से कहा, “रुकिए! माता जी ने आज्ञा दी है कि बिना उनकी अनुमति के कोई भी अंदर नहीं जा सकता।”
भगवान शिव ने कहा, “बालक, मैं इस घर का स्वामी हूं। यह मेरा निवास स्थान है।” परंतु गणेश जी अपने संकल्प पर अडिग रहे। उन्होंने उत्तर दिया, “मुझे खुशी है कि आप यहां के स्वामी हैं, परंतु माता जी की आज्ञा के बिना मैं किसी को भी अंदर नहीं जाने दूंगा।”
भगवान शिव को गणेश जी की निष्ठा और माता पार्वती के प्रति उनका समर्पण देखकर प्रसन्नता हुई, परंतु साथ ही वे इस स्थिति से परेशान भी थे। उन्होंने समझाने का प्रयास किया, परंतु गणेश जी अपने निर्णय पर दृढ़ रहे।
अंततः एक संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई। भगवान शिव के क्रोध में आने पर, उन्होंने अपने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया। यह देखकर माता पार्वती अत्यंत दुखी हुईं और उन्होंने भगवान शिव से कहा कि वे अपने पुत्र को पुनः जीवित करें।
भगवान शिव ने तुरंत एक हाथी का सिर लाकर गणेश जी के धड़ पर लगाया और उन्हें पुनः जीवन प्रदान किया। इस प्रकार गणेश जी हाथी के सिर वाले देवता बने।
भगवान शिव ने गणेश जी को आशीर्वाद देते हुए कहा, “हे गणेश! तुम्हारी माता के प्रति निष्ठा और द्वारपाल के रूप में तुम्हारे संकल्प से मैं अत्यंत प्रभावित हूं। आज से तुम सभी देवताओं में प्रथम पूज्य होगे। कोई भी शुभ कार्य तुम्हारी पूजा के बिना संपन्न नहीं होगा।”
माता पार्वती ने भी अपने प्रिय पुत्र को गले लगाते हुए कहा, “वत्स, तुमने मेरी रक्षा का जो संकल्प लिया था, उसे निभाने में तुमने अपने प्राण तक न्योछावर कर दिए। तुम्हारी यह निष्ठा सदैव याद रखी जाएगी।”
इस प्रकार गणेश जी का द्वारपाल बनना और माता की रक्षा का संकल्प एक महान कथा बन गई। उन्होंने सिखाया कि कर्तव्य और संकल्प के आगे कोई भी बाधा नहीं टिक सकती।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जब हम किसी के प्रति अपना कर्तव्य निभाने का संकल्प लेते हैं, तो हमें उसे पूरी निष्ठा और दृढ़ता से निभाना चाहिए। गणेश जी की भांति हमें भी अपने माता-पिता की रक्षा और सेवा करनी चाहिए।
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