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दत्तात्रेय अवतार की कथा – त्रिदेव का संयुक्त रूप

बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर धर्म और सत्य की रक्षा के लिए एक विशेष अवतार की आवश्यकता थी। यह दत्तात्रेय अवतार की कथा है, जो त्रिदेव – ब्रह्मा, विष्णु और महेश के संयुक्त रूप की अद्भुत गाथा है।

अत्रि ऋषि और माता अनुसूया का आश्रम हिमालय की तलहटी में स्थित था। अत्रि ऋषि अपनी तपस्या और ज्ञान के लिए प्रसिद्ध थे, वहीं माता अनुसूया अपनी पतिव्रता धर्म और सेवा भाव के लिए तीनों लोकों में प्रसिद्ध थीं। उनका नाम ही अनुसूया था – जिसका अर्थ है ‘ईर्ष्या रहित’।

एक दिन देवर्षि नारद जी त्रिलोक में भ्रमण करते हुए सरस्वती, लक्ष्मी और पार्वती के पास पहुंचे। उन्होंने कहा, “हे देवियों! पृथ्वी पर अनुसूया नाम की एक स्त्री है जो अपने पतिव्रत धर्म के कारण तीनों लोकों में प्रसिद्ध है। लोग कहते हैं कि उसके सामने आप तीनों का पतिव्रत धर्म कुछ भी नहीं है।”

यह सुनकर तीनों देवियों के मन में अहंकार जाग गया। उन्होंने अपने-अपने पतियों से कहा, “प्रभु! आप जाकर इस अनुसूया की परीक्षा लीजिए। देखिए कि उसका पतिव्रत धर्म कितना दृढ़ है।”

त्रिदेव ने अपनी पत्नियों की बात मानकर एक योजना बनाई। वे तीनों साधु का वेश धारण करके अत्रि ऋषि के आश्रम पहुंचे। उस समय अत्रि ऋषि तपस्या में लीन थे और माता अनुसूया अकेली थीं।

तीनों साधुओं ने आश्रम के द्वार पर आकर कहा, “माते! हम भूखे हैं। कृपया हमें भोजन दें।”

अनुसूया ने हाथ जोड़कर कहा, “स्वागत है महात्माओं! मैं तुरंत भोजन की व्यवस्था करती हूं।”

जब अनुसूया भोजन लेकर आईं, तो तीनों साधुओं ने एक अजीब शर्त रखी। उन्होंने कहा, “माते! हम केवल तभी भोजन करेंगे जब आप निर्वस्त्र होकर हमें भोजन परोसेंगी।”

यह सुनकर अनुसूया चकित रह गईं। उन्होंने सोचा कि ये कैसे साधु हैं जो इतनी अधर्म की बात कह रहे हैं। लेकिन अतिथि सेवा उनका धर्म था। उन्होंने मन ही मन अपने पति अत्रि ऋषि का स्मरण किया और कहा, “यदि मेरा पतिव्रत धर्म सच्चा है, तो ये तीनों साधु छह महीने के शिशु बन जाएं।”

अनुसूया के इन वचनों के साथ ही एक चमत्कार हुआ। तीनों साधु तुरंत छह महीने के छोटे बच्चे बन गए और रोने लगे। अनुसूया ने उन्हें अपनी गोद में उठाया और माता का प्रेम देकर उन्हें दूध पिलाया।

जब अत्रि ऋषि तपस्या से लौटे तो उन्होंने तीन बच्चों को देखा। अनुसूया ने सारी घटना बताई। अत्रि ऋषि अपनी दिव्य दृष्टि से समझ गए कि ये कोई साधारण बच्चे नहीं हैं।

इधर स्वर्गलोक में तीनों देवियां अपने पतियों की प्रतीक्षा कर रही थीं। जब काफी समय बीत गया तो वे चिंतित हो गईं। देवर्षि नारद से पूछने पर पता चला कि त्रिदेव अनुसूया के पतिव्रत धर्म के कारण बच्चे बन गए हैं।

तीनों देवियों को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे तुरंत अत्रि आश्रम पहुंचीं और अनुसूया के चरणों में गिरकर क्षमा मांगी। “माता अनुसूया! हमसे बहुत बड़ी गलती हुई है। कृपया हमारे पतियों को वापस कर दीजिए।”

अनुसूया का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने कहा, “देवियों! मैं आपके पतियों को वापस कर दूंगी, लेकिन एक शर्त है। ये तीनों मेरे पुत्र के रूप में एक संयुक्त अवतार लेंगे।”

त्रिदेव प्रसन्न हुए और अपने वास्तविक रूप में आकर बोले, “माता अनुसूया! आपके पतिव्रत धर्म की जय हो। हम तीनों मिलकर आपके पुत्र के रूप में जन्म लेंगे। यह बालक दत्तात्रेय नाम से प्रसिद्ध होगा।”

इस प्रकार दत्तात्रेय अवतार की कथा में त्रिदेव का संयुक्त रूप धरती पर अवतरित हुआ। दत्तात्रेय में ब्रह्मा जी का ज्ञान, विष्णु भगवान की करुणा और शिव जी की तपस्या – तीनों के गुण विद्यमान थे।

बालक दत्तात्रेय बचपन से ही असाधारण थे। उनके तीन मुख और छह भुजाएं थीं। वे हमेशा अपने साथ एक गाय, चार कुत्ते और एक त्रिशूल रखते थे। गाय माता पृथ्वी का प्रतीक थी, चार कुत्ते चार वेदों के प्रतीक थे।

जैसे-जैसे दत्तात्रेय बड़े होते गए, उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैलने लगी। वे प्रकृति से शिक्षा लेते थे। उन्होंने चौबीस गुरु बनाए थे – पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, चंद्रमा, सूर्य, कबूतर, अजगर, समुद्र, पतंगा, भ्रमर, हाथी, मधुमक्खी, हिरण, मछली, पिंगला वेश्या, कुरर पक्षी, बालक, कुमारी कन्या, सर्प, बाण बनाने वाला, मकड़ी और भृंगी कीट।

एक दिन राजा यदु दत्तात्रेय के पास आए और पूछा, “भगवन! आप इतने प्रसन्न कैसे रहते हैं? आपके पास कोई संपत्ति नहीं है, फिर भी आप हमेशा आनंदित रहते हैं।”

दत्तात्रेय मुस्कराए और बोले, “राजन! मैंने प्रकृति से शिक्षा ली है। पृथ्वी से धैर्य सीखा है, जल से पवित्रता, अग्नि से तेज, वायु से निरपेक्षता और आकाश से व्यापकता। जब मन में संतुष्टि हो तो बाहरी वस्तुओं की आवश्यकता नहीं रहती।”

दत्तात्रेय ने राजा यदु को चौबीस गुरुओं की शिक्षा दी। उन्होंने बताया कि कैसे प्रकृति का हर तत्व हमें जीवन की महत्वपूर्ण शिक्षा देता है। यह ज्ञान आज भी ‘अवधूत गीता’ के नाम से प्रसिद्ध है।

दत्तात्रेय का एक और महत्वपूर्ण कार्य था दुष्ट राक्षसों का संहार। उन्होंने कई असुरों को अपनी दिव्य शक्ति से नष्ट किया और धर्म की स्थापना की। उनके भक्त उन्हें ‘गुरु दत्त’ भी कहते हैं।

एक बार एक गर्भवती गाय दत्तात्रेय के पास आई। वह बहुत परेशान थी क्योंकि उसका बछड़ा पेट में मर गया था। दत्तात्रेय ने अपनी दिव्य शक्ति से उस बछड़े को जीवित कर दिया। यह देखकर सभी लोग आश्चर्यचकित हो गए।

दत्तात्रेय की शिक्षाओं का मुख्य संदेश था – “सभी में एक ही परमात्मा का वास है। भेदभाव मन का भ्रम है। जो व्यक्ति इस सत्य को समझ लेता है, वह मोक्ष प्राप्त कर लेता है।”

उन्होंने बताया कि सच्चा गुरु वही है जो शिष्य को आत्मज्ञान दे। बाहरी आडंबर और दिखावे से कुछ नहीं होता। सच्ची भक्ति निष्काम होती है।

दत्तात्रेय के कई शिष्य हुए जो बाद में महान संत बने। उनमें से परशुराम भी एक थे। दत्तात्रेय ने परशुराम को अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा दी।

समय के साथ दत्तात्रेय की ख्याति पूरे भारत में फैल गई। दक्षिण भारत में उनके कई मंदिर बने। महाराष्ट्र में गिरनार पर्वत पर उनका प्रसिद्ध मंदिर है।

दत्तात्रेय का संदेश था कि धर्म किसी एक मत या संप्रदाय में बंधा नहीं है। सच्चा धर्म तो प्रेम, करुणा और सेवा में है। उन्होंने दिखाया कि कैसे त्रिदेव की शक्तियों को मिलाकर संपूर्ण व्यक्तित्व का विकास किया जा सकता है।

आज भी दत्तात्रेय अवतार की कथा हमें सिखाती है कि सच्ची शक्ति विनम्रता में है, सच्चा ज्ञान प्रकृति से सीखने में है, और सच्ची भक्ति निष्काम सेवा में है। माता अनुसूया के पुत्र दत्तात्रेय का यह संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है।

इस प्रकार त्रिदेव के संयुक्त रूप दत्तात्रेय ने धरती पर आकर दिखाया कि कैसे ब्रह्मा का ज्ञान, विष्णु की करुणा और शिव की तपस्या मिलकर एक संपूर्ण व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। यही है दत्तात्रेय अवतार की कथा का महान संदेश।

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