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बीरबल और क़र्ज़ का बोझ
बादशाह अकबर के दरबार में एक दिन एक गरीब किसान आया। उसका चेहरा उदास था और आंखों में आंसू थे। वह अकबर के सामने झुका और बोला, “जहांपनाह, मैं एक गरीब किसान हूं। मुझ पर बहुत बड़ा क़र्ज़ का बोझ है। साहूकार मुझसे रोज़ पैसे मांगता है, लेकिन मेरे पास कुछ भी नहीं है।”
अकबर ने दया से किसान की ओर देखा और पूछा, “तुम्हारा क़र्ज़ कितना है?”
“हुज़ूर, पांच सौ अशर्फियां,” किसान ने कांपती आवाज़ में कहा। “अगर मैं जल्दी पैसे नहीं दूंगा तो साहूकार मेरा घर और खेत छीन लेगा।”
अकबर का दिल पिघल गया। वे तुरंत किसान को पांच सौ अशर्फियां देने को तैयार हो गए। लेकिन बीरबल ने इशारे से अकबर को रोका।
बीरबल ने किसान से पूछा, “भाई, तुम्हारे पास कितनी ज़मीन है?”
“दो बीघा खेत है, हुज़ूर,” किसान ने जवाब दिया।
“और तुम्हारे घर में कौन-कौन है?” बीरबल ने आगे पूछा।
“मेरी पत्नी, दो बेटे और एक बेटी है। सभी मेहनत करते हैं।”
बीरबल मुस्कराए और बोले, “अच्छा, तो तुम्हारे पास पांच जोड़ी हाथ हैं, दो बीघा उपजाऊ ज़मीन है, फिर भी तुम पर इतना क़र्ज़ का बोझ कैसे आ गया?”
किसान ने सिर झुकाकर कहा, “हुज़ूर, मैं बहुत आलसी हूं। दिन भर सोता रहता हूं और शराब पीता हूं। खेती का काम मेरी पत्नी और बच्चे करते हैं, लेकिन मैं उनकी मेहनत की कमाई भी शराब में उड़ा देता हूं।”
अकबर को गुस्सा आया, लेकिन बीरबल ने शांति से कहा, “जहांपनाह, इस आदमी को पैसे देना इसकी समस्या का समाधान नहीं है। यह तो इसकी बुरी आदतों को और बढ़ावा देगा।”
फिर बीरबल ने किसान से कहा, “सुनो भाई, मैं तुम्हें एक रास्ता बताता हूं। तुम अपनी आलस्य और शराब की लत छोड़ो। रोज़ सुबह उठकर अपने खेत में काम करो। अपने परिवार के साथ मिलकर मेहनत करो।”
“लेकिन हुज़ूर, साहूकार तो अभी पैसे मांग रहा है,” किसान ने चिंता से कहा।
बीरबल ने समझाया, “मैं साहूकार से बात करूंगा। उसे कहूंगा कि तुम्हें छह महीने का समय दे। इन छह महीनों में तुम मेहनत करके अपना क़र्ज़ चुका सकते हो।”
किसान ने सोचा और बोला, “अगर आप साहूकार को मना लें तो मैं वादा करता हूं कि मैं अपनी बुरी आदतें छोड़ूंगा।”
बीरबल ने साहूकार को बुलवाया और उससे कहा कि वह किसान को छह महीने का समय दे। साहूकार मान गया।
छह महीने बाद वही किसान दरबार में आया, लेकिन इस बार उसका चेहरा खुशी से चमक रहा था। उसने अकबर और बीरबल को प्रणाम किया और बोला, “हुज़ूर, मैंने अपना सारा क़र्ज़ चुका दिया है। अब मेरे ऊपर क़र्ज़ का बोझ नहीं है।”
“कैसे?” अकबर ने आश्चर्य से पूछा।
“जहांपनाह, मैंने बीरबल साहब की सलाह मानी। शराब छोड़ दी, आलस्य त्यागा और मेहनत करना शुरू किया। मेरे खेत में इतनी अच्छी फसल हुई कि न केवल क़र्ज़ चुका पाया, बल्कि कुछ पैसे बचत भी कर लिए।”
अकबर बहुत खुश हुए और बीरबल की तारीफ करते हुए बोले, “बीरबल, तुमने सच कहा था। अगर मैं उसे पैसे दे देता तो वह फिर से वही गलतियां करता। लेकिन तुमने उसे सही रास्ता दिखाया।”
बीरबल ने विनम्रता से कहा, “हुज़ूर, क़र्ज़ का बोझ केवल पैसों से नहीं उतरता। इसके लिए मेहनत, ईमानदारी और अच्छी आदतों की ज़रूरत होती है। जब इंसान अपनी बुरी आदतें छोड़कर मेहनत करता है, तो कोई भी क़र्ज़ का बोझ उसे दबा नहीं सकता।”
किसान ने आभार से कहा, “बीरबल साहब, आपने मुझे केवल क़र्ज़ से मुक्ति नहीं दिलाई, बल्कि जीने का सही तरीका भी सिखाया है। अब मैं हमेशा मेहनत करूंगा और कभी आलस्य नहीं करूंगा।”
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि क़र्ज़ का बोझ केवल पैसों से नहीं बल्कि मेहनत और अच्छी आदतों से उतरता है। आलस्य और बुरी लतें इंसान को गर्त में धकेल देती हैं, जबकि मेहनत और ईमानदारी उसे सफलता दिलाती है।












