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अर्जुन के रथ की ध्वजा पर हनुमान जी की कथा

बहुत समय पहले की बात है, जब महाभारत का युद्ध होने वाला था। पांडवों के सबसे बड़े धनुर्धर अर्जुन अपने रथ की तैयारी कर रहे थे। उनका रथ सुंदर था, परंतु उसकी ध्वजा पर कोई चिह्न नहीं था।

एक दिन भगवान श्री कृष्ण अर्जुन के पास आए और बोले, “हे पार्थ! तुम्हारे रथ की ध्वजा खाली क्यों है? युद्ध में ध्वजा का बहुत महत्व होता है।”

अर्जुन ने विनम्रता से कहा, “प्रभु, मैं समझ नहीं पा रहा कि किस देवता का चिह्न लगाऊं। आप ही बताइए।”

श्री कृष्ण मुस्कराए और बोले, “मैं तुम्हें एक महान भक्त से मिलवाता हूं।” उन्होंने आकाश की ओर देखकर पुकारा, “हे पवनपुत्र हनुमान! यहां आइए।”

तुरंत ही आकाश में एक तेज प्रकाश दिखाई दिया और महावीर हनुमान जी प्रकट हुए। उनका तेजस्वी रूप देखकर अर्जुन का मन श्रद्धा से भर गया।

हनुमान जी ने श्री कृष्ण को प्रणाम करके कहा, “प्रभु, आपने क्यों बुलाया है?”

श्री कृष्ण बोले, “हनुमान जी, यह अर्जुन है। इसे युद्ध में विजय दिलाने के लिए आपकी सहायता चाहिए। क्या आप इसके रथ की ध्वजा पर विराजमान होंगे?”

हनुमान जी ने अर्जुन को देखा। अर्जुन ने हाथ जोड़कर कहा, “हे महावीर! मैं आपका दास हूं। कृपया मेरी रक्षा करें।”

हनुमान जी का हृदय अर्जुन की विनम्रता देखकर प्रसन्न हो गया। वे बोले, “वत्स अर्जुन! मैं तुम्हारे रथ की ध्वजा पर विराजना स्वीकार करता हूं। परंतु एक शर्त है।”

“कैसी शर्त, प्रभु?” अर्जुन ने पूछा।

हनुमान जी बोले, “तुम्हें हमेशा धर्म का साथ देना होगा। अधर्म के विरुद्ध लड़ना होगा। और सबसे महत्वपूर्ण बात – कभी भी अहंकार नहीं करना।”

अर्जुन ने सिर झुकाकर कहा, “मैं वचन देता हूं, हनुमान जी।”

उसी क्षण हनुमान जी ने अपना छोटा रूप धारण किया और अर्जुन के रथ की ध्वजा पर जा बैठे। ध्वजा पर उनकी छवि सुनहरे रंग में चमकने लगी।

जब महाभारत का युद्ध शुरू हुआ, तो अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजमान हनुमान जी की शक्ति से पूरा रथ सुरक्षित रहा। दुश्मनों के तीर और अस्त्र रथ को छू भी नहीं पाते थे।

एक दिन भीष्म पितामह ने अर्जुन पर इतने शक्तिशाली बाण चलाए कि पूरा आकाश धुएं से भर गया। परंतु हनुमान जी की कृपा से अर्जुन का बाल भी बांका नहीं हुआ।

युद्ध के अंत में जब अर्जुन रथ से उतरे, तो हनुमान जी भी ध्वजा से उतर आए। उन्होंने अर्जुन से कहा, “वत्स, तुमने अपना वचन निभाया। तुम सच्चे योद्धा हो।”

अर्जुन ने हनुमान जी के चरण छूकर कहा, “प्रभु, यह सब आपकी कृपा है। आपके बिना मैं कुछ भी नहीं।”

हनुमान जी प्रसन्न होकर बोले, “जो भक्त विनम्र रहता है और धर्म का साथ देता है, उसकी मैं हमेशा रक्षा करता हूं।”

इस प्रकार अर्जुन के रथ की ध्वजा पर विराजना करके हनुमान जी ने न केवल अर्जुन की रक्षा की, बल्कि धर्म की विजय में भी योगदान दिया। आज भी जब कोई भक्त सच्चे मन से हनुमान जी को पुकारता है, तो वे तुरंत उसकी सहायता के लिए आ जाते हैं।

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जो व्यक्ति विनम्र रहकर धर्म का साथ देता है, भगवान हमेशा उसके साथ होते हैं।

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