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अधिक साहसी कौन – बेताल पच्चीसी सत्रहवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।

“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।

प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक समृद्ध नगर था। वहाँ राजा भूपाल सिंह का शासन था। उनके दो पुत्र थे – वीरसिंह और धीरसिंह। दोनों राजकुमार अपने-अपने गुणों के लिए प्रसिद्ध थे।

वीरसिंह अत्यंत बलशाली और युद्ध कला में निपुण था। वह सिंहों से भी निडर होकर लड़ता था। धीरसिंह बुद्धिमान और धैर्यवान था। वह कठिन परिस्थितियों में भी शांत रहकर समाधान खोजता था।

एक दिन राज्य में भयंकर संकट आया। पास के जंगल में एक राक्षस आकर बस गया था। वह रोज रात को नगर में आकर लोगों को परेशान करता था। प्रजा डर के मारे घरों से बाहर नहीं निकलती थी।

राजा ने दरबार में घोषणा की – “जो भी इस राक्षस का वध करेगा, उसे आधा राज्य और मेरी पुत्री राजकुमारी सुंदरी से विवाह का अधिकार मिलेगा।”

यह सुनकर दोनों राजकुमारों ने राक्षस से युद्ध करने की इच्छा प्रकट की। राजा चिंता में पड़ गए कि दोनों में से किसे भेजा जाए।

वीरसिंह ने कहा – “पिताजी! मैं अपनी तलवार और बल से उस राक्षस को परास्त कर दूंगा। मेरा साहस ही सबसे बड़ा है।”

धीरसिंह ने विनम्रता से कहा – “महाराज! मैं बुद्धि और धैर्य से राक्षस की समस्या का समाधान करूंगा। सच्चा साहस तो बुद्धि में है।”

राजा ने निर्णय लिया कि दोनों राजकुमार अलग-अलग रात्रि में राक्षस से मुकाबला करेंगे। जो सफल होगा, वही विजेता माना जाएगा।

पहली रात वीरसिंह गया। उसने अपनी चमकदार तलवार और कवच पहना। जैसे ही राक्षस आया, वीरसिंह ने उस पर आक्रमण कर दिया। घंटों तक भयंकर युद्ध चला। वीरसिंह की वीरता देखकर राक्षस भी चकित रह गया।

अंततः वीरसिंह ने राक्षस को बुरी तरह घायल कर दिया, लेकिन राक्षस भागकर जंगल में छुप गया। वीरसिंह विजयी होकर महल लौटा।

दूसरी रात धीरसिंह की बारी थी। वह कोई हथियार नहीं ले गया, केवल एक दीपक और कुछ मिठाइयाँ लेकर गया। जब राक्षस आया तो धीरसिंह ने उससे कहा –

“मित्र! तुम क्यों इतने क्रोधित हो? क्या कष्ट है तुम्हें?”

राक्षस को आश्चर्य हुआ। उसने बताया – “मैं वास्तव में एक ऋषि था। एक श्राप के कारण राक्षस बन गया हूँ। भूख और क्रोध के कारण मैं लोगों को परेशान करता हूँ।”

धीरसिंह ने दया दिखाते हुए कहा – “तो फिर तुम रोज यहाँ आकर भोजन ले जाया करो। हम तुम्हारे लिए व्यवस्था करेंगे। और श्राप मुक्ति के लिए तपस्या करो।”

राक्षस की आँखों में आँसू आ गए। उसने कहा – “राजकुमार! आपकी दया और समझदारी ने मेरे हृदय को बदल दिया है। मैं अब किसी को कष्ट नहीं दूंगा।”

उसी रात राक्षस ने तपस्या आरंभ की और कुछ दिनों बाद श्राप से मुक्त होकर वापस ऋषि बन गया।

अब प्रश्न यह था कि अधिक साहसी कौन था? वीरसिंह जिसने शारीरिक बल से राक्षस से युद्ध किया, या धीरसिंह जिसने बुद्धि और दया से समस्या का स्थायी समाधान किया?

राजा और प्रजा दुविधा में पड़ गए। दोनों राजकुमारों ने अपने-अपने तरीके से साहस दिखाया था।

बेताल ने कहानी समाप्त करके पूछा – “राजा विक्रम! बताइए, इन दोनों में अधिक साहसी कौन था? यदि आप जानते हुए भी चुप रहे तो आपका सिर फट जाएगा।”

राजा विक्रमादित्य ने सोचकर उत्तर दिया – “बेताल! धीरसिंह अधिक साहसी था। वीरसिंह ने केवल शारीरिक साहस दिखाया, लेकिन धीरसिंह ने मानसिक साहस दिखाया। बिना हथियार के शत्रु के पास जाना, उसकी बात सुनना और समस्या की जड़ तक पहुँचना – यह सच्चा साहस है। उसने न केवल समस्या का समाधान किया बल्कि एक आत्मा को भी मुक्ति दिलाई।”

“सच्चा साहस वह है जो दया, बुद्धि और धैर्य के साथ हो। केवल शारीरिक बल साहस नहीं, बल्कि मन की दृढ़ता ही वास्तविक साहस है।”

विक्रम के सही उत्तर से प्रसन्न होकर बेताल फिर से उड़कर पेड़ पर जा लटका। राजा विक्रमादित्य पुनः उसे लेने के लिए चल पड़े।

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