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चोरी की गयी चीज़ पर चोर का अधिकार होता है? – बेताल पच्चीसी – पन्द्रहवीं कहानी
राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए घने जंगल से गुजर रहे थे। रात का समय था और चारों ओर सन्नाटा छाया हुआ था। अचानक बेताल ने अपनी कर्कश आवाज़ में कहा, “राजन्! आज मैं तुम्हें एक ऐसी कहानी सुनाता हूँ जो तुम्हारी बुद्धि की परीक्षा लेगी।”
विक्रमादित्य चुपचाप सुनते रहे और बेताल ने अपनी कहानी शुरू की।
“सुनो राजा विक्रम!” बेताल बोला, “कई वर्ष पहले मगध देश में एक धनी सेठ रहता था। उसका नाम था धनपाल। उसके पास अपार संपत्ति थी – सोने-चांदी के सिक्के, हीरे-जवाहरात और कीमती वस्त्र।”
धनपाल सेठ बहुत ही कंजूस था। वह अपना धन तिजोरी में बंद करके रखता था और किसी गरीब की सहायता नहीं करता था। उसी नगर में एक गरीब ब्राह्मण रहता था जिसका नाम था विद्यानंद। उसके पास अपनी बीमार पत्नी और दो छोटे बच्चे थे।
एक दिन विद्यानंद की पत्नी की हालत बहुत खराब हो गई। वैद्य ने कहा कि उसे तुरंत दवाई की जरूरत है, वरना उसकी जान जा सकती है। लेकिन दवाई बहुत महंगी थी और विद्यानंद के पास पैसे नहीं थे।
विद्यानंद ने सोचा, “मैं धनपाल सेठ से पैसे मांगूंगा। वह धनी है, शायद मेरी सहायता कर दे।”
विद्यानंद सेठ के घर गया और उससे विनती की, “सेठजी, मेरी पत्नी बहुत बीमार है। कृपया मुझे कुछ पैसे उधार दे दीजिए। मैं जल्दी ही वापस कर दूंगा।”
लेकिन कंजूस सेठ ने उसे भगा दिया और कहा, “मैं किसी को पैसे नहीं देता। जाओ यहाँ से!”
निराश होकर विद्यानंद घर लौटा। उसकी पत्नी की हालत और भी खराब हो रही थी। रात के समय, जब पूरा नगर सो रहा था, विद्यानंद ने एक गलत फैसला लिया। उसने सोचा कि सेठ के पास इतना धन है कि थोड़ा सा लेने से उसे पता भी नहीं चलेगा।
विद्यानंद चुपके से सेठ के घर गया और तिजोरी से कुछ सोने के सिक्के चुरा लिए। उन पैसों से उसने अपनी पत्नी की दवाई खरीदी और उसकी जान बच गई।
कुछ दिन बाद, सेठ को अपनी तिजोरी में कमी का पता चला। उसने चोरी की शिकायत राजा से की। राजा के सिपाहियों ने जांच की और विद्यानंद को पकड़ लिया।
जब विद्यानंद को राजा के सामने पेश किया गया, तो उसने सच्चाई बताई। उसने कहा, “महाराज, मैंने अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए यह किया है। मैं जानता हूं कि चोरी गलत है, लेकिन मेरे पास कोई और रास्ता नहीं था।”
राजा ने पूछा, “तुमने सेठ से सहायता मांगी थी?”
“हां महाराज,” विद्यानंद ने उत्तर दिया, “लेकिन उसने मना कर दिया।”
राजा ने सेठ से पूछा, “क्या यह सच है?”
सेठ ने स्वीकार किया कि उसने विद्यानंद की सहायता से मना कर दिया था।
अब राजा एक कठिन स्थिति में था। एक तरफ चोरी का अपराध था, दूसरी तरफ एक पति का अपनी पत्नी की जान बचाने का प्रयास था।
राजा ने फैसला सुनाया, “विद्यानंद, तुमने चोरी की है जो गलत है। लेकिन तुमने यह अपनी पत्नी की जान बचाने के लिए किया है। सेठ धनपाल, तुम्हारे पास अपार संपत्ति है फिर भी तुमने एक जरूरतमंद की सहायता नहीं की।”
“मेरा फैसला यह है,” राजा ने कहा, “विद्यानंद को जो पैसे चाहिए थे, वह सेठ देगा। और आगे से सेठ को अपनी संपत्ति का एक हिस्सा गरीबों की सहायता में लगाना होगा।”
यह सुनकर बेताल ने कहानी समाप्त की और बोला, “अब बताओ राजा विक्रम, क्या चोरी की गयी चीज़ पर चोर का अधिकार होता है? विद्यानंद ने जो पैसे चुराए थे, क्या वे उसके हो गए थे?”
विक्रमादित्य ने सोचा और फिर उत्तर दिया, “बेताल, चोरी की गयी चीज़ पर चोर का कभी अधिकार नहीं होता। चाहे कितनी भी मजबूरी हो, चोरी गलत है। लेकिन इस मामले में विद्यानंद की मजबूरी को देखते हुए और सेठ की कंजूसी को देखते हुए, न्याय यही था कि सेठ को विद्यानंद की सहायता करनी चाहिए थी।”
“चोरी की गयी चीज़ पर चोर का अधिकार नहीं होता,” विक्रम ने आगे कहा, “लेकिन जब समाज में धनी लोग गरीबों की सहायता नहीं करते, तो ऐसी परिस्थितियां बनती हैं। सच्चा न्याय यह है कि हर व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की सहायता करे।”
विक्रम का उत्तर सुनकर बेताल प्रसन्न हुआ और बोला, “सही कहा राजन्! तुमने सही न्याय किया है। चोरी गलत है, लेकिन कंजूसी भी उतनी ही गलत है।”
यह कहकर बेताल फिर से पेड़ पर जा लटका और विक्रमादित्य को फिर से उसे लाना पड़ा।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि चोरी करना गलत है, लेकिन जरूरतमंदों की सहायता न करना भी उतना ही गलत है। हमें हमेशा दूसरों की मदद करने के लिए तैयार रहना चाहिए।
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