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संतुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार – अकबर बीरबल की कहानी

एक दिन बादशाह अकबर अपने दरबार में बैठे थे। उनके मन में एक अजीब सा सवाल आया। वे अपने सबसे बुद्धिमान मंत्री बीरबल से बोले, “बीरबल, मैं जानना चाहता हूँ कि इस संसार में कोई ऐसा व्यक्ति है भी या नहीं जो पूर्णतः संतुष्ट हो।”

बीरबल ने सोचते हुए कहा, “हुजूर, यह बहुत दिलचस्प सवाल है। क्यों न हम इसका पता लगाने के लिए पूरे राज्य में घोषणा करवा दें?”

अकबर को यह विचार पसंद आया। उन्होंने तुरंत घोषणा करवाई कि “जो व्यक्ति अपने जीवन से पूर्णतः संतुष्ट है, वह दरबार में आकर इसका प्रमाण दे। उसे संतुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार के रूप में हजार स्वर्ण मुद्राएं दी जाएंगी।”

घोषणा सुनकर राज्य भर से लोग दरबार में आने लगे। पहले आया एक धनी व्यापारी। उसने कहा, “महाराज, मेरे पास बहुत धन है, बड़ा महल है, मैं संतुष्ट हूँ।”

अकबर ने पूछा, “तो क्या तुम्हें और कुछ नहीं चाहिए?”

व्यापारी ने झिझकते हुए कहा, “हुजूर, अगर आप दें तो थोड़ा और धन मिल जाए तो अच्छा होगा।” अकबर ने उसे वापस भेज दिया।

फिर आया एक विद्वान पंडित। उसने कहा, “महाराज, मैं ज्ञान से संतुष्ट हूँ।” लेकिन जब अकबर ने पूछा कि क्या उसे कुछ और चाहिए, तो उसने कहा कि यदि कुछ और पुस्तकें मिल जाएं तो बेहतर होगा। इस तरह एक के बाद एक कई लोग आए – किसान, सैनिक, कारीगर – लेकिन सभी के मन में कुछ न कुछ इच्छा थी। कोई भी व्यक्ति पूर्णतः संतुष्ट नहीं था।

दिन भर यह सिलसिला चलता रहा। शाम होते-होते अकबर निराश हो गए। उन्होंने बीरबल से कहा, “लगता है इस संसार में कोई संतुष्ट व्यक्ति है ही नहीं।”

तभी दरबार के बाहर से एक मधुर आवाज आई। कोई व्यक्ति बहुत खुशी से गा रहा था। बीरबल ने कहा, “हुजूर, चलिए देखते हैं कि यह कौन है जो इतना प्रसन्न है।”

बाहर जाकर देखा तो एक गरीब मजदूर अपना काम करते हुए गा रहा था। उसके कपड़े फटे हुए थे, लेकिन चेहरे पर अद्भुत शांति और प्रसन्नता थी।

अकबर ने उससे पूछा, “तुम इतने खुश क्यों हो?”

मजदूर ने हाथ जोड़कर कहा, “महाराज, आज मुझे पूरे दिन का काम मिला। मेरे बच्चों को खाना मिलेगा। भगवान का शुक्र है कि मैं स्वस्थ हूँ और काम कर सकता हूँ। मुझे और क्या चाहिए?”

अकबर ने पूछा, “अगर तुम्हें हजार स्वर्ण मुद्राएं दी जाएं तो?”

मजदूर ने मुस्कराते हुए कहा, “महाराज, मैं आपका आभारी रहूंगा, लेकिन मैं तो अभी भी खुश हूँ। पैसा मिले या न मिले, मेरी खुशी में कोई फर्क नहीं पड़ता।”

यह सुनकर अकबर और बीरबल दोनों चकित रह गए। यह व्यक्ति वास्तव में संतुष्ट था। अकबर ने उसे संतुष्ट व्यक्ति के लिए उपहार देना चाहा, लेकिन मजदूर ने विनम्रता से कहा, “महाराज, यह पैसा किसी जरूरतमंद को दे दीजिए। मेरे पास जो है, वही मेरे लिए काफी है।”

बीरबल ने अकबर से कहा, “हुजूर, देखिए कितना अद्भुत है यह व्यक्ति। इसके पास सबसे कम है, लेकिन यह सबसे ज्यादा संतुष्ट है।”

अकबर ने गहरी सांस लेते हुए कहा, “बीरबल, आज मुझे एक महत्वपूर्ण सबक मिला है। संतुष्टि धन से नहीं, बल्कि मन की शांति से आती है।”

उस दिन के बाद अकबर ने अपने जीवन को नए नजरिए से देखना शुरू किया। उन्होंने समझा कि सच्ची संपत्ति वह है जो मन को शांति दे, न कि वह जो केवल तिजोरी भरे।

इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि संतुष्टि बाहरी चीजों में नहीं, बल्कि हमारे मन की स्थिति में होती है। जो व्यक्ति अपने पास जो कुछ है उसमें खुश रहता है, वही सच्चा संतुष्ट व्यक्ति है। धन और भौतिक सुख-सुविधाएं खुशी दे सकती हैं, लेकिन संतुष्टि केवल कृतज्ञता और संतोष से आती है।

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