Summarize this Article with:

शैलपुत्री माता की पावन कथा – नवरात्रि की प्रथम देवी
बहुत समय पहले की बात है, जब पृथ्वी पर धर्म और अधर्म के बीच संघर्ष चल रहा था। उस समय हिमालय पर्वत के राजा हिमवान और उनकी पत्नी मैनावती का एक सुंदर महल था। इस दिव्य दंपति के यहाँ एक अत्यंत तेजस्वी कन्या का जन्म हुआ, जिसका नाम शैलपुत्री रखा गया।
शैलपुत्री का अर्थ है पर्वत की पुत्री। यह कन्या कोई साधारण बालिका नहीं थी, बल्कि स्वयं आदिशक्ति माँ दुर्गा का अवतार थी। उनके मुखमंडल पर दिव्य तेज था और आँखों में करुणा की धारा बहती रहती थी।
एक दिन छोटी शैलपुत्री अपनी माता मैनावती से पूछती है, “माता जी, मैं कभी-कभी अपने अंदर एक अजीब सी शक्ति महसूस करती हूँ। ऐसा लगता है जैसे मैं किसी महान कार्य के लिए जन्मी हूँ।”
मैनावती मुस्कराते हुए कहती हैं, “पुत्री, तुम कोई साधारण कन्या नहीं हो। तुम्हारे अंदर माँ भगवती की शक्ति निवास करती है। समय आने पर तुम्हें अपना सच्चा स्वरूप पता चल जाएगा।”
जैसे-जैसे शैलपुत्री बड़ी होती गईं, उनकी दिव्यता और भी स्पष्ट होने लगी। वे प्रकृति से गहरा जुड़ाव महसूस करती थीं। पहाड़ों की चोटियाँ, बहते झरने, और हरे-भरे वन उनसे बात करते प्रतीत होते थे।
एक दिन जब शैलपुत्री हिमालय की ऊँची चोटी पर ध्यान कर रही थीं, तो अचानक आकाश से एक दिव्य ज्योति प्रकट हुई। उस ज्योति से एक मधुर आवाज आई, “पुत्री शैलपुत्री, तुम्हारा समय आ गया है। पृथ्वी पर अधर्म बढ़ रहा है और असुरों का अत्याचार चरम पर है।”
शैलपुत्री ने विनम्रता से पूछा, “हे दिव्य ज्योति, मुझे बताइए कि मैं क्या करूँ? मैं धर्म की रक्षा के लिए तैयार हूँ।”
तब आकाशवाणी हुई, “तुम नवदुर्गा की प्रथम शक्ति हो। तुम्हें अपना दिव्य रूप धारण करना होगा और भक्तों की रक्षा करनी होगी। तुम्हारे हाथ में त्रिशूल और कमल होगा, और तुम वृषभ पर सवार होकर संसार की रक्षा करोगी।”
इस आकाशवाणी के बाद शैलपुत्री का रूप परिवर्तित होने लगा। उनके चारों ओर दिव्य प्रकाश फैल गया। उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का फूल प्रकट हुआ। एक सुंदर सफेद वृषभ उनके सामने प्रकट हुआ, जिस पर वे सवार हुईं।
अब शैलपुत्री माता अपने पूर्ण दिव्य स्वरूप में थीं। उनका तेज इतना प्रबल था कि समस्त देवता भी उनके सामने नतमस्तक हो गए। ब्रह्मा जी, विष्णु जी और महेश जी भी उनकी स्तुति करने लगे।
उसी समय पृथ्वी पर महिषासुर नामक एक भयंकर राक्षस का आतंक फैला हुआ था। वह स्वयं को अजेय समझता था और देवताओं को परेशान कर रहा था। जब उसे शैलपुत्री माता के अवतार की खबर मिली, तो वह क्रोधित हो गया।
महिषासुर गर्जना करते हुए बोला, “कौन है यह शैलपुत्री? मैं उसे दिखाता हूँ कि असली शक्ति किसके पास है!”
जब महिषासुर अपनी विशाल सेना के साथ हिमालय पर आक्रमण करने पहुँचा, तो शैलपुत्री माता शांति से उसका इंतजार कर रही थीं। उनके चेहरे पर कोई भय नहीं था, बल्कि करुणा और दृढ़ता का भाव था।
युद्ध शुरू हुआ। शैलपुत्री माता ने अपने त्रिशूल से महिषासुर की सेना का संहार करना शुरू किया। उनका वृषभ भी अपने सींगों से राक्षसों को मार गिराता जा रहा था। माता का तेज इतना प्रबल था कि राक्षस उनके सामने टिक ही नहीं पा रहे थे।
अंत में महिषासुर और शैलपुत्री माता के बीच भयंकर युद्ध हुआ। महिषासुर ने अपने सभी माया-जाल का प्रयोग किया, लेकिन माता के सामने उसकी एक भी चाल काम नहीं आई। अंततः शैलपुत्री माता ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का वध कर दिया।
युद्ध समाप्त होने के बाद सभी देवता, ऋषि-मुनि और भक्तजन शैलपुत्री माता की जय-जयकार करने लगे। “जय माता शैलपुत्री! जय जगदम्बे!” के नारे से पूरा आकाश गूंज उठा।
तब शैलपुत्री माता ने सभी को आशीर्वाद देते हुए कहा, “मैं सदैव अपने भक्तों की रक्षा करूंगी। जो भी सच्चे मन से मेरी पूजा करेगा, उसके सभी कष्ट दूर हो जाएंगे। मैं नवरात्रि के प्रथम दिन विशेष रूप से अपने भक्तों पर कृपा करूंगी।”
इस प्रकार शैलपुत्री माता ने धर्म की स्थापना की और अधर्म का नाश किया। आज भी नवरात्रि के पहले दिन भक्तजन शैलपुत्री माता की पूजा करते हैं और उनसे शक्ति, साहस और सुख-समृद्धि की कामना करते हैं।
शैलपुत्री माता की यह कथा हमें सिखाती है कि बुराई कितनी भी शक्तिशाली हो, अंत में सत्य और धर्म की ही विजय होती है। माता शैलपुत्री आज भी अपने भक्तों की रक्षा करती हैं और उन्हें जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा देती हैं।









