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तृणावर्त का वध – कृष्ण की वीरता की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्री कृष्ण छोटे बालक थे और गोकुल में माता यशोदा और नंद बाबा के साथ रहते थे। उस समय दुष्ट राजा कंस अपने महल में बैठकर कृष्ण को मारने की योजनाएं बनाता रहता था।
एक दिन कंस ने अपने दरबार में तृणावर्त नामक एक भयंकर राक्षस को बुलाया। तृणावर्त एक शक्तिशाली असुर था जो हवा के रूप में कहीं भी जा सकता था और भयंकर आंधी-तूफान लाने की शक्ति रखता था।
कंस ने तृणावर्त से कहा, “हे महाबली तृणावर्त! तुम्हें गोकुल जाकर उस बालक कृष्ण को मार देना है जो मेरी मृत्यु का कारण बनेगा। तुम अपनी शक्ति से भयंकर आंधी लाकर उसे उड़ा ले जाना।”
तृणावर्त ने कंस से कहा, “महाराज, मैं अपनी शक्ति से ऐसी भयंकर आंधी लाऊंगा कि पूरा गोकुल धूल-मिट्टी से भर जाएगा। उस छोटे बालक को मारना मेरे लिए बहुत आसान काम है।”
यह कहकर तृणावर्त हवा का रूप धारण करके गोकुल की ओर चल पड़ा। रास्ते में उसने अपनी शक्ति का प्रयोग करके भयंकर आंधी और तूफान शुरू कर दिया।
उस दिन माता यशोदा अपने प्यारे कन्हैया को गोद में लेकर घर के आंगन में बैठी थीं। अचानक तेज हवा चलने लगी और आकाश में काले बादल छा गए। धूल-मिट्टी का भयंकर तूफान आया जिससे कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था।
माता यशोदा घबरा गईं और बोलीं, “हे भगवान! यह कैसी भयंकर आंधी आई है। मैं अपने कन्हैया को अंदर ले चलूं।” लेकिन आंधी इतनी तेज थी कि वे कुछ भी नहीं देख पा रही थीं।
इसी समय तृणावर्त ने अपना असली रूप दिखाया और बालक कृष्ण को माता यशोदा की गोद से उठाकर आकाश में उड़ने लगा। माता यशोदा चिल्लाईं, “कन्हैया! मेरा बेटा कहां गया?”
तृणावर्त बालक कृष्ण को लेकर आकाश में बहुत ऊंचाई पर पहुंच गया। वह सोच रहा था कि अब इस छोटे बच्चे को नीचे गिराकर मार दूंगा। लेकिन अचानक उसे लगा कि यह बालक बहुत भारी हो गया है।
भगवान कृष्ण ने अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग करके अपना वजन इतना बढ़ा दिया कि तृणावर्त उन्हें उठाने में असमर्थ हो गया। फिर छोटे कृष्ण ने तृणावर्त की गर्दन को अपने नन्हे हाथों से कसकर पकड़ लिया।
तृणावर्त ने बहुत कोशिश की कि वह इस बालक को अपनी गर्दन से हटा दे, लेकिन कृष्ण की पकड़ इतनी मजबूत थी कि वह सांस भी नहीं ले पा रहा था। वह आकाश में इधर-उधर भागने लगा लेकिन कृष्ण की पकड़ से छूट नहीं पाया।
अंत में तृणावर्त का वध हो गया और वह एक पहाड़ के समान बड़े शरीर के साथ धरती पर गिर पड़ा। उसकी मृत्यु के साथ ही भयंकर आंधी भी शांत हो गई और आकाश साफ हो गया।
गोकुल के लोग बाहर आए तो उन्होंने देखा कि एक विशाल राक्षस मरा पड़ा है और उसके ऊपर छोटे कृष्ण खेल रहे हैं। सभी लोग आश्चर्य में पड़ गए कि इस छोटे बालक ने इतने बड़े राक्षस को कैसे मारा।
माता यशोदा दौड़कर आईं और अपने कन्हैया को गले से लगा लिया। वे बोलीं, “मेरे लाल! तू कहां चला गया था? मैं तो बहुत डर गई थी।”
नंद बाबा और गोकुल के सभी ग्वाले आकर बालक कृष्ण की जय-जयकार करने लगे। उन्होंने कहा, “यह कोई साधारण बालक नहीं है। इसमें दिव्य शक्ति है जो हमारी रक्षा करती है।”
इस प्रकार भगवान श्री कृष्ण ने छोटी उम्र में ही तृणावर्त का वध करके गोकुल वासियों की रक्षा की। यह घटना दिखाती है कि भगवान हमेशा अपने भक्तों की रक्षा करते हैं और बुराई पर अच्छाई की जीत होती है।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि भगवान हमेशा हमारे साथ हैं और हमारी रक्षा करते हैं। हमें कभी भी बुरी शक्तियों से डरना नहीं चाहिए क्योंकि सत्य और धर्म की हमेशा जीत होती है। छोटे कृष्ण की तरह हमें भी साहस और धैर्य रखना चाहिए।
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