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महमूद की परीक्षा – गुरु नानक की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब गुरु नानक देव जी अपनी उदासियों के दौरान विभिन्न स्थानों पर जाकर लोगों को सच्चाई का मार्ग दिखाते थे। उन दिनों मक्का में एक शक्तिशाली बादशाह महमूद राज करता था। वह अपनी शक्ति और धन-दौलत पर बहुत गर्व करता था।

एक दिन महमूद के दरबार में खबर आई कि एक हिंदुस्तानी फकीर शहर में आया है जो अजीब बातें करता है। वह कहता है कि “न कोई हिंदू है, न कोई मुसलमान” और सभी धर्मों को एक समान मानता है। यह सुनकर बादशाह महमूद को बहुत गुस्सा आया।

“यह कैसी बात है?” महमूद ने अपने मंत्रियों से कहा। “इस फकीर को तुरंत मेरे सामने लाओ। मैं इसकी परीक्षा लूंगा।”

जब गुरु नानक देव जी को दरबार में लाया गया, तो महमूद ने देखा कि यह व्यक्ति बिल्कुल साधारण दिखता है। न कोई राजसी वस्त्र, न कोई मुकुट। केवल सफेद कपड़े और चेहरे पर अद्भुत शांति।

महमूद की परीक्षा शुरू हुई। बादशाह ने कहा, “सुनो फकीर! तुम कहते हो कि सभी धर्म एक हैं? यह कैसे संभव है? मैं मुसलमान हूं और अल्लाह में विश्वास करता हूं।”

गुरु नानक जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “हे राजन! बताओ, सूर्य कितने हैं आकाश में?”

“एक ही तो है,” महमूद ने कहा।

“तो फिर उसकी रोशनी अलग-अलग घरों में अलग-अलग नाम से क्यों जानी जाती है? कोई उसे सूरज कहता है, कोई आफताब, कोई रवि। पर सूर्य तो एक ही है ना?” गुरु जी ने समझाया।

महमूद थोड़ा सोच में पड़ गया, लेकिन उसका अहंकार अभी भी बना हुआ था। उसने दूसरी परीक्षा ली। “अच्छा, तो बताओ, मैं बादशाह हूं और तुम एक साधारण फकीर। क्या हम दोनों बराबर हैं?”

गुरु नानक जी ने कहा, “महाराज, क्या आप मिट्टी से बने हैं या सोने से?”

“मिट्टी से ही तो,” महमूद ने कहा।

“और मैं भी मिट्टी से ही बना हूं। जब दोनों का मूल तत्व एक ही है, तो भेद कहां है? आपके पास राज-पाट है, मेरे पास प्रभु का नाम है। दोनों अपनी-अपनी जगह ठीक हैं।”

अब महमूद की परीक्षा और कठिन हो गई। उसने तीसरा प्रश्न किया, “यदि सब कुछ एक ही परमात्मा की रचना है, तो दुख-सुख क्यों है? गरीबी-अमीरी क्यों है?”

गुरु जी ने एक सुंदर उदाहरण दिया, “राजन! देखिए, एक ही बगीचे में अलग-अलग फूल खिलते हैं। गुलाब अलग है, चमेली अलग है, कमल अलग है। पर सभी को एक ही माली पानी देता है, एक ही सूर्य रोशनी देता है। फिर भी हर फूल की अपनी खुशबू है, अपना रंग है। यही तो परमात्मा की लीला है।”

महमूद के मन में अब संदेह होने लगा। उसने चौथी परीक्षा ली। “अगर तुम सच्चे हो, तो कोई चमत्कार दिखाओ।”

गुरु नानक जी ने कहा, “महाराज, सबसे बड़ा चमत्कार तो यह है कि आप एक साधारण फकीर से इतनी देर बात कर रहे हैं। आपका अहंकार पिघल रहा है, यही सबसे बड़ा चमत्कार है।”

यह सुनकर महमूद को अपनी गलती का एहसास हुआ। उसने देखा कि वास्तव में उसका मन शांत हो रहा था। गुरु जी की बातों में कोई जादू था जो उसके दिल को छू रहा था।

महमूद की परीक्षा अब उल्टी हो गई थी। अब वह खुद की परीक्षा हो रही थी। उसने पूछा, “गुरु जी, मैं एक राजा हूं। मेरे पास सब कुछ है, फिर भी मन में शांति नहीं है। क्यों?”

गुरु जी ने प्रेम से कहा, “बेटा महमूद, जब तक तुम ‘मैं’ और ‘मेरा’ में फंसे रहोगे, तब तक शांति नहीं मिलेगी। जो कुछ भी है, वह परमात्मा का है। हम तो केवल उसके सेवक हैं।”

महमूद का हृदय परिवर्तन हो गया। उसने गुरु जी के चरणों में सिर झुकाया और कहा, “गुरु जी, आपने मेरी आंखें खोल दीं। मैं समझ गया कि सच्चा राजा वह है जो अपने अहंकार पर विजय पा ले।”

गुरु नानक देव जी ने महमूद को आशीर्वाद दिया और कहा, “पुत्र, अब तुम सच्चे अर्थों में एक राजा बनोगे। प्रजा की सेवा करो, न्याय करो, और सबको एक समान प्रेम दो।”

उस दिन के बाद महमूद एक बदला हुआ इंसान बन गया। उसने अपने राज्य में सभी धर्मों का सम्मान किया और प्रजा की भलाई के लिए काम किया। महमूद की परीक्षा ने उसे सिखाया कि सच्ची शक्ति अहंकार में नहीं, बल्कि विनम्रता में है।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा ज्ञान वह है जो हमारे अहंकार को मिटाकर हमें विनम्र बनाता है। सभी धर्म एक ही परमात्मा तक पहुंचने के अलग-अलग रास्ते हैं। जब हम दूसरों का सम्मान करते हैं और अपने अहंकार को छोड़ते हैं, तभी हमें सच्ची शांति मिलती है।

और इसी तरह, सामाजिकता और विनम्रता का महत्व भी हमें सिखाता है।

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