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लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा – गुरु नानक की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब संसार में अंधकार छाया हुआ था और लोग दुःख में डूबे हुए थे। उस समय गुरु नानक देव जी अपने शिष्यों के साथ एक गांव में पहुंचे। वहां के लोग बहुत परेशान थे क्योंकि उनके खेत सूख गए थे और घरों में अन्न की कमी हो गई थी।
गांव के मुखिया ने गुरु जी से कहा, “हे गुरु जी, हमारे गांव में बहुत गरीबी है। माता लक्ष्मी हमसे रूठ गई हैं। कृपया हमें बताएं कि हम कैसे उनकी कृपा पा सकते हैं?”
गुरु नानक देव जी मुस्कराए और बोले, “पुत्र, आओ मैं तुम्हें लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा की कहानी सुनाता हूं। इससे तुम्हें समझ आ जाएगा कि सच्ची संपत्ति क्या है।”
सभी गांववासी गुरु जी के चारों ओर बैठ गए। गुरु नानक देव जी ने कहानी शुरू की:
“जब समुद्र मंथन हुआ था, तब देवताओं और असुरों ने मिलकर क्षीर सागर को मथा था। उस मंथन से चौदह रत्न निकले थे। उन्हीं में से एक थीं माता लक्ष्मी। जब लक्ष्मी का जन्म हुआ, तो वे अपूर्व सुंदरता से भरी हुई थीं। उनके हाथों में कमल के फूल थे और वे कमल के आसन पर विराजमान थीं।”
एक छोटा बच्चा पूछा, “गुरु जी, फिर लक्ष्मी माता ने क्या किया?”
गुरु जी ने प्रेम से उत्तर दिया, “बेटा, लक्ष्मी का जन्म होने के बाद, उन्होंने अपनी शिक्षा ब्रह्मा जी से प्राप्त की। ब्रह्मा जी ने उन्हें सिखाया कि सच्ची संपत्ति केवल धन-दौलत नहीं है, बल्कि मन की शुद्धता, दयालुता, और परोपकार की भावना है।”
“लक्ष्मी माता ने अपनी शिक्षा के दौरान सीखा कि जो व्यक्ति ईमानदारी से काम करता है, दूसरों की सहायता करता है, और अपने मन को पवित्र रखता है, उसके घर में वे सदा निवास करती हैं। उन्होंने यह भी सीखा कि लालच, झूठ, और अहंकार से भरे घरों में वे कभी नहीं रहतीं।”
गांव की एक बुजुर्ग महिला ने पूछा, “गुरु जी, तो हमें क्या करना चाहिए?”
गुरु नानक देव जी ने समझाया, “माता जी, लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा हमें यह सिखाती है कि सच्ची संपत्ति पाने के लिए हमें पहले अपने मन को साफ करना होगा। जैसे लक्ष्मी माता ने सीखा था कि केवल पवित्र स्थानों पर ही निवास करना है, वैसे ही हमें भी अपने घर और मन को पवित्र बनाना होगा।”
गुरु जी ने आगे कहा, “देखो, इस गांव में एक गरीब किसान रहता है – रामदास। वह रोज सुबह उठकर ईश्वर का नाम लेता है, ईमानदारी से खेती करता है, और जो कुछ भी मिलता है, उसमें से जरूरतमंदों को भी देता है। उसके घर में भले ही सोना-चांदी न हो, लेकिन खुशी और संतुष्टि है। यही तो लक्ष्मी की सच्ची कृपा है।”
एक युवक ने कहा, “लेकिन गुरु जी, हमें तो धन की भी जरूरत है।”
गुरु नानक देव जी ने मुस्कराते हुए कहा, “हां पुत्र, धन की जरूरत है, लेकिन लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा हमें बताती है कि धन कैसे कमाना चाहिए। ईमानदारी से, मेहनत से, और दूसरों का भला करते हुए। जब तुम इस तरह काम करोगे, तो लक्ष्मी माता खुद तुम्हारे पास आएंगी।”
“लक्ष्मी माता की शिक्षा यह भी थी कि जो व्यक्ति अपनी संपत्ति को केवल अपने लिए रखता है और दूसरों की मदद नहीं करता, वह जल्दी ही सब कुछ खो देता है। इसलिए साझा करना, दान करना, और परोपकार करना बहुत जरूरी है।”
गुरु जी ने गांववासियों से कहा, “आज से तुम सब मिलकर एक काम करो। सुबह उठकर ईश्वर का नाम लो, ईमानदारी से काम करो, एक-दूसरे की मदद करो, और जो कुछ भी मिले, उसमें से कुछ हिस्सा जरूरतमंदों को भी दो। देखना, कैसे तुम्हारे जीवन में खुशी और समृद्धि आती है।”
गांववासियों ने गुरु जी की बात मानी। वे सभी मिलकर काम करने लगे, एक-दूसरे की सहायता करने लगे। धीरे-धीरे उनके खेत हरे-भरे हो गए, घरों में अन्न आ गया, और सबके चेहरों पर खुशी छा गई।
कुछ महीनों बाद जब गुरु नानक देव जी दोबारा उस गांव से गुजरे, तो उन्होंने देखा कि पूरा गांव खुशहाल हो गया था। गांववासियों ने गुरु जी के चरण छूए और कहा, “गुरु जी, आपने हमें लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा की सच्ची कहानी सुनाई। हमने समझ लिया कि सच्ची संपत्ति मन की पवित्रता और परोपकार में है।”
गुरु नानक देव जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “यही तो लक्ष्मी माता की सच्ची शिक्षा है। जब तुम्हारा मन साफ होता है, तुम्हारे कर्म अच्छे होते हैं, तो माता लक्ष्मी खुद तुम्हारे घर आकर बस जाती हैं। याद रखो, धन आता-जाता रहता है, लेकिन अच्छे कर्म और पवित्र मन की संपत्ति हमेशा तुम्हारे साथ रहती है।”
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि लक्ष्मी का जन्म और शिक्षा हमें सिखाती है कि सच्ची संपत्ति केवल धन में नहीं, बल्कि अच्छे कर्मों, ईमानदारी, और परोपकार में है। जब हम इन गुणों को अपनाते हैं, तो हमारे जीवन में खुशी और समृद्धि अपने आप आ जाती है।
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