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इंद्र के वज्र से हनुमत् नाम की प्राप्ति
बहुत समय पहले की बात है, जब देवराज इंद्र स्वर्गलोक में राज करते थे और पृथ्वी पर अनेक ऋषि-मुनि तपस्या करते थे। उस समय अंजना नाम की एक अप्सरा थी, जो एक श्राप के कारण पृथ्वी पर वानर रूप में रह रही थी।
अंजना ने भगवान शिव की कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर महादेव ने उन्हें वरदान दिया कि उनका पुत्र अत्यंत बलवान और तेजस्वी होगा। इसी समय पवनदेव भी अंजना की भक्ति से प्रभावित हुए और उन्होंने अंजना को अपना आशीर्वाद दिया।
समय आने पर अंजना के गर्भ से एक दिव्य बालक का जन्म हुआ। यह बालक पवनपुत्र था, जिसमें अद्भुत शक्ति और तेज था। बालक का जन्म होते ही वह सामान्य बच्चों से कहीं अधिक चंचल और शक्तिशाली था।
एक दिन प्रातःकाल का समय था। नवजात बालक ने आकाश में चमकते हुए सूर्य को देखा। सूर्य की सुनहरी किरणें और उसका तेज देखकर बालक को लगा कि यह कोई मीठा फल है। “यह कितना सुंदर और मीठा फल लग रहा है!” बालक ने मन में सोचा।
अपनी दिव्य शक्ति का प्रयोग करते हुए, बालक ने आकाश में छलांग लगाई। वह तेजी से सूर्य की ओर उड़ने लगा। उसकी गति इतनी तीव्र थी कि हवा में तूफान सा मच गया। पवनदेव ने अपने पुत्र को सहायता प्रदान की और उसे और भी तेज गति से आगे बढ़ाया।
जब बालक सूर्य के निकट पहुंचा, तो सूर्यदेव चकित रह गए। उन्होंने सोचा, “यह कौन सा दिव्य बालक है जो मेरे तेज से डरे बिना मेरे पास आ रहा है?” सूर्यदेव ने अपना तेज कम कर दिया ताकि बालक को कोई हानि न हो।
इसी समय राहु का समय था, जो सूर्य को ग्रसने के लिए आ रहा था। राहु ने जब देखा कि कोई बालक सूर्य की ओर जा रहा है, तो वह क्रोधित हो गया। “यह दुष्ट बालक मेरे कार्य में बाधा डाल रहा है!” राहु ने सोचा और वह तुरंत देवराज इंद्र के पास गया।
राहु ने इंद्र से कहा, “हे देवराज! एक अजीब बालक सूर्य को निगलने जा रहा है। यदि ऐसा हुआ तो सारी सृष्टि अंधकार में डूब जाएगी। कृपया इसे रोकिए!”
देवराज इंद्र ने अपने दिव्य नेत्रों से देखा और पाया कि वास्तव में एक बालक सूर्य की ओर तेजी से बढ़ रहा है। इंद्र को लगा कि यह कोई राक्षस है जो सूर्य को हानि पहुंचाना चाहता है।
देवराज इंद्र ने अपना प्रसिद्ध वज्र उठाया। यह वज्र अत्यंत शक्तिशाली था और किसी भी शत्रु को परास्त कर सकता था। इंद्र ने पूरी शक्ति के साथ अपना वज्र बालक की ओर फेंका।
वज्र की चोट बालक की ठुड्डी पर लगी। “हनु” का अर्थ होता है ठुड्डी, और वज्र की चोट से बालक की ठुड्डी टूट गई। इस कारण बालक “हनुमत्” कहलाया, जिसका अर्थ है “टूटी हुई ठुड्डी वाला”।
वज्र की चोट से बालक बेहोश होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा। जब पवनदेव ने देखा कि उनके प्रिय पुत्र को इंद्र के वज्र से चोट लगी है, तो वे अत्यंत क्रोधित हो गए। पवनदेव ने तुरंत अपनी गति रोक दी।
पवनदेव के रुकने से सारी सृष्टि में हाहाकार मच गया। हवा न चलने से सभी प्राणी सांस लेने में कष्ट अनुभव करने लगे। पेड़-पौधे मुरझाने लगे और सारा संसार स्थिर हो गया।
जब ब्रह्मा जी ने यह स्थिति देखी, तो वे तुरंत पवनदेव के पास आए। उन्होंने पवनदेव से कहा, “हे पवनदेव! आपका क्रोध उचित है, परंतु इससे सारी सृष्टि का नाश हो जाएगा। कृपया अपने पुत्र को जीवित करने का उपाय करते हैं।”
ब्रह्मा जी ने अपनी दिव्य शक्ति से बालक को पुनः जीवित किया। साथ ही उन्होंने बालक को आशीर्वाद दिया कि वह अजेय होगा और किसी भी अस्त्र-शस्त्र से उसकी मृत्यु नहीं होगी।
जब इंद्र को पता चला कि यह बालक कोई राक्षस नहीं बल्कि पवनपुत्र है, तो उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ। इंद्र ने बालक के पास आकर कहा, “हे वीर बालक! मुझसे भूल हुई है। मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम वज्र के समान कठोर और शक्तिशाली होगे।”
सभी देवताओं ने मिलकर बालक को अनेक वरदान दिए। सूर्यदेव ने उसे अपने तेज का सौवां भाग दिया। वरुणदेव ने जल से सुरक्षा का वरदान दिया। अग्निदेव ने अग्नि से बचाव का आशीर्वाद दिया।
इस प्रकार इंद्र के वज्र से हनुमत् नाम की प्राप्ति हुई। यह नाम केवल एक दुर्घटना का परिणाम नहीं था, बल्कि यह दिव्य लीला का हिस्सा था। हनुमान जी का यह नाम उनकी वीरता और शक्ति का प्रतीक बना।
बड़े होकर हनुमान जी ने अपनी अद्भुत शक्ति और भक्ति से सभी को चमत्कृत किया। वे भगवान राम के सबसे प्रिय भक्त बने और उनकी सेवा में अपना जीवन समर्पित कर दिया।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में जो कुछ भी घटित होता है, वह ईश्वर की इच्छा से होता है। कभी-कभी जो हमें दुख लगता है, वह भी हमारे कल्याण के लिए ही होता है। हनुमान जी का नाम भले ही एक चोट के कारण पड़ा हो, परंतु यही नाम आज संसार भर में पूजा जाता है।







