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परशुराम अवतार की कथा – भगवान विष्णु का छठा अवतार
बहुत समय पहले की बात है, जब धरती पर अधर्म और अत्याचार का राज था। क्षत्रिय राजा अपनी शक्ति का दुरुपयोग करके प्रजा पर अत्याचार कर रहे थे। ब्राह्मणों और निर्दोष लोगों को सताया जा रहा था। तब भगवान विष्णु ने धर्म की स्थापना के लिए परशुराम के रूप में अवतार लिया।
महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के घर में एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। इस बालक का नाम राम था, लेकिन बाद में भगवान शिव से परशु (फरसा) प्राप्त करने के कारण वे परशुराम कहलाए। बचपन से ही राम में अद्भुत शक्ति और तेज था।
एक दिन राम ने अपने पिता से पूछा, “पिताजी, मैं कैसे जानूं कि मेरा जीवन किस उद्देश्य के लिए है?”
महर्षि जमदग्नि ने मुस्कराते हुए कहा, “वत्स, तुम्हारे भीतर दिव्य शक्ति है। तुम्हें कठोर तपस्या करनी होगी और अपने गुरुओं से शिक्षा लेनी होगी।”
राम ने अपने पिता की बात मानकर कड़ी तपस्या शुरू की। वे दिन-रात अभ्यास करते रहे। उनकी भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें दर्शन दिए।
भगवान शिव ने कहा, “राम, तुम्हारी तपस्या से मैं अत्यंत प्रसन्न हूं। मैं तुम्हें यह दिव्य परशु प्रदान करता हूं। इससे तुम अधर्मियों का नाश कर सकोगे।”
इस प्रकार राम को परशुराम नाम मिला। उन्होंने अस्त्र-शस्त्र की शिक्षा भी पूरी की और एक महान योद्धा बने।
एक दिन हैहयवंशी राजा कार्तवीर्य अर्जुन अपनी सेना के साथ महर्षि जमदग्नि के आश्रम में आया। महर्षि ने अपनी दिव्य कामधेनु गाय की सहायता से राजा और उसकी पूरी सेना का स्वागत किया।
राजा कार्तवीर्य अर्जुन ने कामधेनु गाय को देखकर लालच किया और कहा, “महर्षि, यह गाय मुझे दे दीजिए। एक राजा के पास ही ऐसी दिव्य संपत्ति होनी चाहिए।”
महर्षि जमदग्नि ने विनम्रता से कहा, “राजन्, यह गाय हमारे यज्ञ और धर्म कार्यों के लिए आवश्यक है। कृपया इसे यहीं रहने दें।”
लेकिन अहंकारी राजा ने जबरदस्ती कामधेनु गाय को छीन लिया और अपने साथ ले गया। जब परशुराम को यह पता चला, तो उनका क्रोध भड़क उठा।
परशुराम ने राजा के पास जाकर कहा, “राजन्, आपने अन्याय किया है। कामधेनु गाय को वापस कर दीजिए।”
कार्तवीर्य अर्जुन ने घमंड से कहा, “तुम एक ब्राह्मण हो, मुझसे युद्ध की बात मत करो। मैं हजार भुजाओं वाला महान योद्धा हूं।”
परशुराम ने अपना दिव्य परशु उठाया और कहा, “अधर्म का नाश करना मेरा कर्तव्य है।” एक ही वार में उन्होंने राजा कार्तवीर्य अर्जुन का वध कर दिया और कामधेनु गाय को वापस ले आए।
राजा के पुत्रों को जब यह पता चला, तो वे बदला लेने के लिए आश्रम पर आक्रमण कर दिए। उस समय परशुराम आश्रम में नहीं थे। राजकुमारों ने महर्षि जमदग्नि की हत्या कर दी।
जब परशुराम वापस आए और अपने पिता की मृत्यु का समाचार सुना, तो वे अत्यंत दुखी हुए। माता रेणुका रो रही थीं।
परशुराम ने माता से कहा, “माता, मैं पिताजी की हत्या का बदला लूंगा।”
माता रेणुका ने कहा, “पुत्र, तुम्हारे पिता की आत्मा तभी शांति पाएगी जब तुम उनकी आज्ञा का पालन करोगे।”
यहां पिता की आज्ञा पालन की महत्वपूर्ण घटना घटी। एक बार महर्षि जमदग्नि ने माता रेणुका के मन में आए विकार के कारण क्रोधित होकर परशुराम से कहा था कि वे माता का वध कर दें। परशुराम ने बिना किसी प्रश्न के पिता की आज्ञा का पालन किया था, लेकिन तुरंत ही पिता से माता को जीवित करने का वरदान मांगा था।
महर्षि जमदग्नि अपने पुत्र की आज्ञाकारिता से प्रसन्न होकर बोले थे, “वत्स, तुम्हारी आज्ञाकारिता अद्वितीय है। मैं तुम्हें वरदान देता हूं कि तुम युद्ध में अजेय रहोगे।”
अब परशुराम ने प्रण लिया कि वे पृथ्वी से सभी अधर्मी क्षत्रियों का नाश करेंगे। इस प्रकार क्षत्रियों का संहार शुरू हुआ।
परशुराम ने अपना दिव्य परशु उठाया और कहा, “मैं प्रतिज्ञा करता हूं कि जब तक पृथ्वी पर एक भी अधर्मी क्षत्रिय जीवित है, मैं शांत नहीं बैठूंगा।”
परशुराम ने इक्कीस बार पृथ्वी को क्षत्रियों से मुक्त किया। वे एक स्थान से दूसरे स्थान जाते और अधर्मी राजाओं का वध करते। उनका परशु अचूक था और कोई भी अधर्मी उनसे बच नहीं सकता था।
जब पृथ्वी अधर्मी क्षत्रियों से मुक्त हो गई, तो परशुराम ने ब्राह्मणों को पूरी पृथ्वी दान कर दी। फिर वे महेंद्र पर्वत पर तपस्या करने चले गए।
एक दिन परशुराम को पता चला कि अयोध्या में राजा दशरथ के पुत्र राम ने शिव धनुष तोड़कर सीता से विवाह किया है। परशुराम को लगा कि कोई नया योद्धा उनकी बराबरी कर रहा है।
परशुराम अयोध्या पहुंचे और राम से मिले। उन्होंने कहा, “राम, तुमने शिव धनुष तोड़ा है। अब मेरे विष्णु धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाकर दिखाओ।”
भगवान राम ने विनम्रता से विष्णु धनुष पर प्रत्यंचा चढ़ाई। उसी क्षण परशुराम को एहसास हुआ कि सामने स्वयं भगवान विष्णु खड़े हैं।
परशुराम ने कहा, “प्रभु, मैं आपको पहचान गया हूं। आप स्वयं भगवान विष्णु हैं। अब मेरा कार्य पूरा हो गया है।”
भगवान राम ने कहा, “परशुराम जी, आपने धर्म की स्थापना का महान कार्य किया है। अब आप शांति से तपस्या करें।”
परशुराम ने महेंद्र पर्वत पर जाकर तपस्या शुरू की। लेकिन उनकी कथा यहीं समाप्त नहीं होती। कल्कि अवतार तक जीवित रहना उनकी विशेषता है।
भगवान विष्णु ने परशुराम को वरदान दिया था कि वे चिरंजीवी रहेंगे। वे कलयुग के अंत में भगवान कल्कि के गुरु बनेंगे और उन्हें युद्ध कला सिखाएंगे।
परशुराम आज भी महेंद्र पर्वत पर तपस्या कर रहे हैं। जब भी धरती पर अधर्म बढ़ता है, वे प्रकट होकर धर्म की रक्षा करते हैं।
द्वापर युग में उन्होंने भीष्म पितामह और द्रोणाचार्य को युद्ध कला सिखाई। कर्ण को भी उन्होंने शिक्षा दी थी।
एक बार कर्ण ने अपनी जाति छुपाकर परशुराम से शिक्षा ली। जब सच्चाई पता चली, तो परशुराम ने कहा, “कर्ण, तुमने झूठ बोला है। इसलिए जब तुम्हें सबसे ज्यादा जरूरत होगी, तब तुम मेरी दी हुई विद्या भूल जाओगे।”
यह श्राप महाभारत युद्ध में पूरा हुआ जब कर्ण अर्जुन से युद्ध के दौरान ब्रह्मास्त्र का मंत्र भूल गया।
परशुराम की कथा हमें सिखाती है कि धर्म की रक्षा के लिए कभी-कभी कठोर कदम उठाने पड़ते हैं। उन्होंने दिखाया कि पिता की आज्ञा का पालन कितना महत्वपूर्ण है और अधर्म का नाश करना धर्म है।
आज भी जब कोई सच्चे मन से परशुराम का स्मरण करता है, तो वे उसकी रक्षा करते हैं। वे न्याय और धर्म के प्रतीक हैं।
इस प्रकार परशुराम अवतार की कथा हमें बताती है कि भगवान विष्णु हमेशा धर्म की रक्षा के लिए अवतार लेते हैं। परशुराम का जीवन त्याग, तपस्या और धर्म के लिए संघर्ष का उदाहरण है। बच्चों, इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा सत्य और धर्म का साथ देना चाहिए। माता-पिता की आज्ञा का पालन करना चाहिए और अन्याय के खिलाफ आवाज उठानी चाहिए।
परशुराम आज भी हमारे बीच हैं और कल्कि अवतार के समय तक रहेंगे। वे धर्म के रक्षक हैं और सदा रहेंगे।











