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सती और दक्ष यज्ञ की पावन कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं का राज स्वर्ग में था। उस समय प्रजापति दक्ष एक महान राजा थे। उनकी सबसे छोटी और प्यारी बेटी का नाम सती था। सती बचपन से ही भगवान शिव की भक्त थी।
सती रोज सुबह उठकर शिव जी की पूजा करती थी। वह कहती थी, “मैं केवल भगवान शिव से ही विवाह करूंगी।” यह सुनकर दक्ष जी को बहुत गुस्सा आता था क्योंकि वे शिव जी को पसंद नहीं करते थे।
एक दिन दक्ष जी ने सती से कहा, “बेटी, तुम किसी राजकुमार से शादी करो। शिव तो जंगल में रहते हैं, उनके पास कुछ भी नहीं है।”
लेकिन सती ने जवाब दिया, “पिता जी, भगवान शिव सबसे महान हैं। वे सारे संसार के स्वामी हैं। मैं उनसे ही विवाह करूंगी।”
सती की दृढ़ता देखकर, अंत में दक्ष जी को मानना पड़ा। सती और भगवान शिव का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ। सभी देवता खुश थे, लेकिन दक्ष जी अभी भी नाराज़ थे।
विवाह के बाद सती कैलाश पर्वत पर शिव जी के साथ खुशी से रहने लगी। वे दोनों एक-दूसरे से बहुत प्रेम करते थे।
कुछ समय बाद, दक्ष जी ने एक महान यज्ञ का आयोजन किया। उन्होंने सभी देवताओं, ऋषि-मुनियों को निमंत्रण भेजा। लेकिन अपने दामाद भगवान शिव और बेटी सती को निमंत्रण नहीं भेजा।
जब सती को पता चला कि उनके पिता ने यज्ञ का आयोजन किया है, तो वे बहुत उदास हो गईं। उन्होंने शिव जी से कहा, “प्रभु, मैं अपने पिता के यज्ञ में जाना चाहती हूं।”
शिव जी ने प्रेम से समझाया, “प्रिये, तुम्हारे पिता ने हमें निमंत्रण नहीं भेजा है। बिना निमंत्रण के जाना उचित नहीं है।”
लेकिन सती का मन बहुत व्याकुल था। वे बोलीं, “वह मेरे पिता हैं, मुझे निमंत्रण की जरूरत नहीं। मैं जाकर उनसे मिलूंगी।”
अंत में शिव जी ने सती को जाने की अनुमति दे दी। सती अपने पिता के घर पहुंची, लेकिन वहां का माहौल बहुत अजीब था।
दक्ष जी ने सती का स्वागत नहीं किया। उल्टे वे गुस्से में बोले, “तुम यहां क्यों आई हो? मैंने तुम्हें और तुम्हारे पति को निमंत्रण नहीं भेजा था।”
सती ने विनम्रता से कहा, “पिता जी, मैं आपसे मिलने आई हूं। आप मुझसे नाराज़ क्यों हैं?”
तब दक्ष जी ने बहुत गुस्से में भगवान शिव के बारे में बुरी बातें कहीं। उन्होंने कहा, “वह जंगली है, भिखारी है। मेरी बेटी ने गलत चुनाव किया है।”
यह सुनकर सती का दिल टूट गया। उन्होंने कहा, “पिता जी, आप भगवान शिव का अपमान कर रहे हैं। वे सारे संसार के स्वामी हैं।”
लेकिन दक्ष जी नहीं माने। वे और भी बुरी बातें कहने लगे। सती को बहुत दुख हुआ। उन्होंने सोचा, “मैं इस शरीर से अपने पिता की बेटी हूं, जो मेरे प्रभु का अपमान कर रहे हैं।”
सती ने मन में निश्चय किया। वे यज्ञ की अग्नि के पास गईं और बोलीं, “हे अग्निदेव! मैं इस शरीर को त्याग रही हूं जो मेरे प्रभु का अपमान सह रहा है।”
यह कहकर सती ने यज्ञ की अग्नि में प्राण त्याग दिए. सभी लोग हैरान रह गए। यज्ञ में उपस्थित सभी देवता और ऋषि-मुनि दुखी हो गए।
जब भगवान शिव को यह समाचार मिला, तो वे बहुत क्रोधित हुए। उन्होंने अपनी जटा से वीरभद्र को उत्पन्न किया और कहा, “जाओ और दक्ष के यज्ञ को नष्ट कर दो।”
वीरभद्र ने दक्ष के यज्ञ को तहस-नहस कर दिया। सभी देवता डर गए। तब ब्रह्मा जी और विष्णु जी ने शिव जी से प्रार्थना की।
विष्णु जी ने कहा, “हे महादेव! कृपया अपना क्रोध शांत करें। दक्ष को माफ कर दें।”
शिव जी का क्रोध शांत हुआ। उन्होंने दक्ष को जीवनदान दिया। दक्ष जी को अपनी गलती का एहसास हुआ। वे शिव जी के चरणों में गिर गए और माफी मांगी।
दक्ष जी ने कहा, “हे महादेव! मैंने बहुत बड़ी गलती की है। कृपया मुझे माफ कर दें।”
भगवान शिव ने दक्ष को माफ कर दिया। लेकिन सती के वियोग में वे बहुत दुखी थे। वे सती के शरीर को लेकर पूरे संसार में घूमने लगे।
तब भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए। जहां-जहां सती के शरीर के अंग गिरे, वहां-वहां शक्तिपीठ बन गए।
बाद में सती ने हिमालय की बेटी पार्वती के रूप में जन्म लिया। उन्होंने फिर से तपस्या करके भगवान शिव को पति के रूप में पाया।
इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि हमें कभी भी भगवान का अपमान नहीं करना चाहिए। माता-पिता का सम्मान करना चाहिए, लेकिन अगर वे गलत बात कहें तो उनका विरोध भी करना चाहिए।
सती और दक्ष यज्ञ की कहानी हमें यह भी सिखाती है कि सच्चा प्रेम कभी नहीं मरता। भगवान शिव और सती का प्रेम आज भी अमर है।
इसीलिए आज भी लोग शिव-पार्वती की पूजा करते हैं और उनसे सच्चे प्रेम की प्रार्थना करते हैं। यह कहानी हमें सिखाती है कि धर्म और सत्य के लिए हमें हमेशा खड़ा होना चाहिए।












