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ब्राह्मण, चोर और राक्षस की शिक्षाप्रद कहानी
एक समय की बात है, एक गांव में विद्यासागर नाम का एक विद्वान ब्राह्मण रहता था। वह बहुत ही धर्मपरायण और दयालु था। उसके पास एक सुंदर गाय थी जो बहुत दूध देती थी।
एक दिन विद्यासागर को पास के गांव में एक यज्ञ में भाग लेने जाना था। वह अपनी गाय को लेकर चल पड़ा। रास्ते में एक घने जंगल से गुजरना था।
उसी जंगल में कालिया नाम का एक चोर रहता था। जब उसने ब्राह्मण की सुंदर गाय देखी, तो उसके मन में लालच आ गया। वह सोचने लगा, “यह गाय तो बहुत कीमती लगती है। इसे चुराकर मैं अच्छे पैसे कमा सकूंगा।”
चोर ने ब्राह्माण का पीछा करना शुरू किया। थोड़ी देर बाद जंगल के सबसे घने हिस्से में एक भयानक राक्षस मिला। राक्षस का नाम भीमकाय था। वह बहुत भूखा था और ब्राह्माण को देखकर उसके मुंह में पानी आ गया।
राक्षस ने चोर से कहा, “अरे चोर! तू भी इस ब्राह्मण के पीछे क्यों आ रहा है?”
चोर ने जवाब दिया, “मैं इसकी गाय चुराना चाहता हूं। तू क्यों पीछे आ रहा है?”
राक्षस हंसते हुए बोला, “मैं तो इस मोटे-ताजे ब्राह्मण को खाना चाहता हूं। चल, हम दोनों मिलकर इसे पकड़ते हैं।”
लेकिन जल्दी ही दोनों में झगड़ा हो गया। चोर कहने लगा, “पहले मैं गाय चुराऊंगा, फिर तू ब्राह्मण को खा लेना।”
राक्षस गुस्से में बोला, “नहीं! पहले मैं ब्राह्मण को खाऊंगा। अगर वह मर गया तो गाय भी मेरी हो जाएगी।”
दोनों में तेज़ बहस होने लगी। आवाज़ सुनकर ब्राह्मण समझ गया कि कोई खतरा है। वह चुपचाप पेड़ के पीछे छुप गया और उनकी बात सुनने लगा।
चोर चिल्लाया, “तू बहुत लालची है! अगर तूने ब्राह्मण को मार दिया तो मुझे गाय कैसे मिलेगी?”
राक्षस गरजा, “और तू अगर गाय चुरा लेगा तो मेरा खाना कैसे मिलेगा? ब्राह्मण भाग जाएगा!”
दोनों में इतना तेज़ झगड़ा हुआ कि वे एक-दूसरे से लड़ने लगे। चोर ने अपनी तलवार निकाली और राक्षस ने अपने नाखून तेज़ किए।
भयानक लड़ाई में दोनों एक-दूसरे को बुरी तरह घायल कर दिया। अंत में दोनों ही मर गए।
यह सब देखकर ब्राह्मण बहुत हैरान हुआ। वह समझ गया कि लालच और स्वार्थ के कारण ये दोनों दुष्ट अपनी जान गंवा बैठे।
ब्राह्मण ने भगवान का धन्यवाद किया और अपनी गाय के साथ सुरक्षित अपने गंतव्य पहुंच गया। उसने यज्ञ में भाग लिया और खुशी-खुशी अपने घर वापस लौट आया।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि लालच और स्वार्थ हमेशा विनाश का कारण बनते हैं। जो लोग दूसरों का नुकसान करने की सोचते हैं, वे अक्सर अपना ही नुकसान कर बैठते हैं। हमें हमेशा ईमानदारी और धर्म के रास्ते पर चलना चाहिए। यह कहानी भी इसी विषय पर है।









