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स्कंदमाता की महान कथा – पांचवें नवरात्र की देवी

बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। तारकासुर नामक एक महाबली असुर ने स्वर्गलोक पर अधिकार कर लिया था। उसे ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त था कि केवल भगवान शिव का पुत्र ही उसका वध कर सकता है।

देवताओं की प्रार्थना पर माता पार्वती ने कठोर तपस्या की और भगवान शिव से विवाह किया। समय आने पर उनके घर एक तेजस्वी पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम कार्तिकेय रखा गया। यही बालक आगे चलकर स्कंद के नाम से प्रसिद्ध हुआ।

जब माता पार्वती अपने पुत्र स्कंद को गोद में लेकर बैठती थीं, तो उनका रूप अत्यंत दिव्य और तेजस्वी हो जाता था। इसी रूप में वे स्कंदमाता के नाम से जानी गईं। स्कंदमाता की कथा में उनकी महानता और मातृत्व का अद्भुत वर्णन मिलता है।

“हे माता! आप अपने पुत्र के साथ कितनी सुंदर लग रही हैं,” देवताओं ने प्रणाम करते हुए कहा।

स्कंदमाता का रूप अत्यंत मनोहारी था। वे सिंह पर विराजमान होकर अपने चार हाथों में कमल पुष्प धारण करती थीं। उनकी गोद में छोटे स्कंद भगवान शोभायमान रहते थे। उनका मुख चंद्रमा के समान उज्ज्वल था और उनकी आंखों से करुणा की धारा बहती रहती थी।

एक दिन की बात है, जब तारकासुर का अत्याचार बहुत बढ़ गया। देवराज इंद्र सहित सभी देवता स्कंदमाता के पास पहुंचे और विनती की।

“हे जगत्जननी! आपका पुत्र ही हमारा उद्धार कर सकता है। कृपया उसे युद्ध के लिए तैयार करें,” इंद्र देव ने हाथ जोड़कर कहा।

स्कंदमाता ने अपने पुत्र को देखा। छोटा स्कंद अभी बालक था, परंतु उसमें असीम शक्ति छुपी हुई थी। माता ने प्रेम से अपने पुत्र का मस्तक सहलाया और कहा:

“वत्स! तुम्हारा जन्म धर्म की रक्षा के लिए हुआ है। जाओ और असुरों का संहार करके देवताओं की रक्षा करो।”

स्कंदमाता की कथा में यह प्रसंग बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने अपने पुत्र को युद्ध के लिए भेजते समय कोई दुख नहीं दिखाया। बल्कि उन्होंने उसे अपना आशीर्वाद दिया और कहा कि धर्म की रक्षा करना ही क्षत्रिय का कर्तव्य है।

युद्ध के दिन स्कंदमाता ने अपने पुत्र को दिव्य अस्त्र-शस्त्र प्रदान किए। उन्होंने उसे मयूर वाहन दिया और कहा:

“पुत्र! यह शक्ति वेल तुम्हारी रक्षा करेगी। तुम्हारे साथ सभी देवताओं का आशीर्वाद है।”

स्कंद भगवान ने तारकासुर से भयंकर युद्ध किया। उनकी शक्ति वेल से निकली हुई अग्नि से पूरा युद्धक्षेत्र प्रकाशित हो गया। अंततः उन्होंने तारकासुर का वध कर दिया और देवताओं को विजय दिलाई।

जब स्कंद विजयी होकर वापस लौटे, तो स्कंदमाता ने उन्हें गले लगाया। उनकी आंखों में गर्व और प्रेम के आंसू थे।

“धन्य है मेरा पुत्र! तुमने धर्म की रक्षा की है,” स्कंदमाता ने कहा।

स्कंदमाता की कथा हमें सिखाती है कि एक माता अपने पुत्र को सही राह दिखाने के लिए कितना त्याग करती है। उन्होंने अपने व्यक्तिगत मोह को त्यागकर धर्म को प्राथमिकता दी।

नवरात्रि के पांचवें दिन स्कंदमाता की पूजा की जाती है। भक्त उनसे प्रार्थना करते हैं:

“हे स्कंदमाता! आप हमारे बच्चों की रक्षा करें और उन्हें सही राह दिखाएं। जैसे आपने अपने पुत्र को महान बनाया, वैसे ही हमारे बच्चों को भी आशीर्वाद दें।”

स्कंदमाता की कथा में यह संदेश छुपा है कि मातृत्व केवल स्नेह में ही नहीं, बल्कि संस्कारों में भी होता है। एक माता अपने बच्चे को वीर, धर्मनिष्ठ और न्यायप्रिय बनाने के लिए कठोर निर्णय भी लेती है।

आज भी जब कोई माता अपने बच्चे को अच्छे संस्कार देती है, तो वह स्कंदमाता के आदर्श का पालन करती है। स्कंदमाता की कथा हमें बताती है कि सच्चा प्रेम वही है जो बच्चे को सही और गलत की पहचान सिखाए।

इस प्रकार स्कंदमाता ने अपने पुत्र के माध्यम से संसार को दिखाया कि धर्म की रक्षा के लिए कोई भी त्याग छोटा नहीं होता। उनकी यह कथा आज भी माताओं के लिए प्रेरणास्रोत है और बच्चों के लिए एक महान शिक्षा है। जैसे आपने अपने पुत्र को महान बनाया, वैसे ही हमारे बच्चों को भी आशीर्वाद दें।

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