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सबसे बढ़कर कौन ? – बेताल पच्चीसी – आठवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर चले जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।

“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।

प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक समृद्ध नगर था। वहाँ राजा चंद्रगुप्त का शासन था। उस नगर में तीन मित्र रहते थे – विद्यानंद जो एक महान विद्वान था, धनपाल जो अत्यंत धनवान था, और वीरसिंह जो एक पराक्रमी योद्धा था।

एक दिन तीनों मित्रों में यह चर्चा छिड़ गई कि सबसे बढ़कर कौन है। विद्यानंद का कहना था कि विद्या सबसे श्रेष्ठ है, धनपाल कहता था कि धन के बिना कुछ भी संभव नहीं, और वीरसिंह का मानना था कि वीरता ही सर्वोपरि है।

इसी बहस के दौरान उन्होंने सुना कि पास के राज्य की राजकुमारी सुंदरी का स्वयंवर होने वाला है। राजकुमारी अपने सौंदर्य और गुणों के लिए प्रसिद्ध थी। तीनों मित्रों ने निश्चय किया कि वे स्वयंवर में भाग लेंगे और देखेंगे कि सबसे बढ़कर कौन है।

स्वयंवर के दिन राजकुमारी सुंदरी ने घोषणा की – “जो व्यक्ति मुझे सबसे अधिक प्रभावित करेगा, मैं उसे अपना पति चुनूंगी।”

पहले विद्यानंद आगे आया। उसने अपनी विद्या का प्रदर्शन करते हुए संस्कृत के श्लोक पढ़े, गणित की जटिल समस्याओं को हल किया, और दर्शन पर गहरी चर्चा की। राजकुमारी प्रभावित हुई और बोली – “आपकी विद्या वास्तव में प्रशंसनीय है।”

फिर धनपाल का नंबर आया। उसने राजकुमारी के सामने सोने-चांदी के ढेर, बहुमूल्य रत्न, और अनगिनत संपत्ति का प्रदर्शन किया। उसने कहा – “राजकुमारी! मैं आपको संसार की हर खुशी दे सकता हूँ।” राजकुमारी ने मुस्कराते हुए कहा – “आपका धन निश्चित रूप से आकर्षक है।”

अंत में वीरसिंह आगे बढ़ा। उसने अपनी तलवार निकाली और युद्ध कौशल का प्रदर्शन किया। उसने कहा – “राजकुमारी! मैं आपकी हर विपत्ति से रक्षा कर सकता हूँ।”

राजकुमारी सुंदरी सोच में पड़ गई। तभी अचानक दुश्मन राज्य के सैनिकों ने महल पर आक्रमण कर दिया। चारों ओर अफरा-तफरी मच गई।

इस संकट की घड़ी में विद्यानंद ने अपनी बुद्धि से शत्रुओं की योजना को समझा और सबको बताया कि वे कहाँ से आक्रमण करेंगे। धनपाल ने तुरंत अपने धन से सैनिकों को प्रेरित किया और आवश्यक हथियार उपलब्ध कराए। वीरसिंह ने अपनी वीरता से शत्रुओं का सामना किया और राजकुमारी की रक्षा की।

युद्ध समाप्त होने के बाद राजकुमारी ने कहा – “आज मुझे समझ आया कि विद्या, धन और वीरता तीनों ही अपने-अपने स्थान पर महत्वपूर्ण हैं। विद्या के बिना योजना नहीं बन सकती, धन के बिना साधन नहीं मिलते, और वीरता के बिना कार्यान्वयन संभव नहीं।”

राजकुमारी ने आगे कहा – “मैं तीनों को अपना भाई मानती हूँ क्योंकि आप सभी ने मिलकर मेरी और राज्य की रक्षा की है। सच्चा मित्र वही है जो विपत्ति में साथ खड़ा हो।”

तीनों मित्रों को अपनी गलती का एहसास हुआ। उन्होंने समझा कि सबसे बढ़कर कौन यह प्रश्न ही गलत था। सच्चाई यह थी कि हर गुण अपनी जगह पर महत्वपूर्ण है और मिलकर ही वे पूर्णता प्राप्त करते हैं।

कहानी समाप्त करके बेताल ने राजा विक्रमादित्य से पूछा – “राजन्! बताइए कि इन तीनों में सबसे बढ़कर कौन था?”

राजा विक्रमादित्य ने उत्तर दिया – “बेताल! कोई भी एक गुण दूसरे से बढ़कर नहीं था। विद्या, धन और वीरता तीनों ही जीवन के लिए आवश्यक हैं। जैसे एक पहिए के लिए सभी तीलियाँ जरूरी होती हैं, वैसे ही समाज के लिए सभी गुण आवश्यक हैं।”

राजा का उत्तर सुनकर बेताल प्रसन्न हुआ और बोला – “सत्य कहा आपने राजन्! जब व्यक्ति अहंकार छोड़कर सभी गुणों का सम्मान करता है, तभी वह सच्चा ज्ञानी बनता है।”

यह कहकर बेताल फिर से पेड़ पर जा लटका और राजा विक्रमादित्य को पुनः उसे लाने के लिए जाना पड़ा।

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