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कृष्ण की माखन चोरी – नंदलाल की मधुर लीला

वृंदावन की गलियों में एक मधुर कहानी गूंजती है, जहाँ छोटे कन्हैया की माखन चोरी की लीलाएं आज भी माताओं के दिलों में बसी हैं। यह कहानी है उस नटखट बालक की, जिसने अपनी मासूमियत से पूरे गोकुल को मोहित कर दिया था।

गोकुल में नंद बाबा के घर में छोटा कृष्ण अपनी माता यशोदा के साथ रहता था। वह अत्यंत सुंदर और चंचल बालक था, जिसकी आंखों में शरारत की चमक हमेशा नाचती रहती थी। कृष्ण को सबसे अधिक प्रिय था ताजा माखन, और इसी प्रेम ने उसे गोकुल का सबसे प्रसिद्ध माखन चोर बना दिया था।

प्रतिदिन प्रातःकाल जब गोपियां अपने घरों में दूध मथकर ताजा माखन निकालती थीं, तो वे उसे मटकों में भरकर रस्सियों से छत पर लटका देती थीं। वे सोचती थीं कि इस तरह उनका माखन सुरक्षित रहेगा, परंतु वे नहीं जानती थीं कि उनका प्यारा कन्हैया कितना चतुर है।

एक दिन की बात है, राधा की मां ने बहुत स्वादिष्ट माखन तैयार किया था। उसने सोचा, “आज मैं इस माखन को इतनी ऊंचाई पर लटकाऊंगी कि कोई भी बच्चा इसे नहीं पहुंच सकेगा।” वह माखन से भरे मटके को रस्सी से बांधकर बहुत ऊंचे लटका गई।

जब कृष्ण अपने सखाओं के साथ खेलते-खेलते उधर से गुजरा, तो उसकी नजर उस मटके पर पड़ी। उसके मुंह में पानी आ गया। वह अपने मित्रों से बोला, “देखो मित्रों, कितना सुंदर माखन का मटका लटका है! आओ, हम सब मिलकर इसे प्राप्त करते हैं।”

कृष्ण ने एक योजना बनाई। उसने अपने सभी सखाओं को एक के ऊपर एक खड़े होने को कहा। सबसे नीचे सबसे मजबूत बालक खड़ा हुआ, फिर उसके कंधों पर दूसरा, इस प्रकार एक मानव स्तंभ बन गया। सबसे ऊपर नन्हा कृष्ण चढ़ गया।

जैसे ही कृष्ण ने मटके तक पहुंचने की कोशिश की, मटका और भी ऊंचा लगने लगा। तभी उसे एक और युक्ति सूझी। उसने अपनी बांसुरी निकाली और मटके को तोड़ने के लिए उसका प्रयोग किया। “छन्न” की आवाज के साथ मटका टूट गया और सारा माखन नीचे गिर गया।

सभी बच्चे खुशी से चिल्लाए और माखन खाने लगे। कृष्ण ने अपने छोटे-छोटे हाथों से माखन उठाया और बड़े प्रेम से खाने लगा। उसका चेहरा माखन से सना हुआ था, और वह बेहद प्रसन्न दिख रहा था।

इसी समय राधा की मां वापस आई। जब उसने अपना टूटा हुआ मटका और बिखरा हुआ माखन देखा, तो वह समझ गई कि यह कृष्ण की शरारत है। वह गुस्से में कृष्ण को ढूंढने लगी।

कृष्ण अपने सखाओं के साथ छुप गया था, परंतु उसके चेहरे पर लगा माखन उसकी माखन चोरी की गवाही दे रहा था। जब राधा की मां ने उसे देखा, तो वह हंसे बिना नहीं रह सकी। कृष्ण का मासूम चेहरा और उसकी शरारती मुस्कान देखकर उसका गुस्सा गायब हो गया।

राधा की मां ने प्रेम से कृष्ण को अपने पास बुलाया और कहा, “कन्हैया, तुमने मेरा माखन क्यों चुराया? अगर तुम्हें चाहिए था तो मांग लेते।”

कृष्ण ने अपनी मधुर आवाज में उत्तर दिया, “मैया, माखन तो मेरा प्रिय भोजन है। जब मैं इसे देखता हूं तो रुक नहीं पाता। और फिर, चुराकर खाने में अलग ही मजा आता है!” यह कहकर वह शरारत से मुस्कराया।

सभी गोपियां कृष्ण की इस बात को सुनकर हंस पड़ीं। उन्हें एहसास हुआ कि यह कोई साधारण बालक नहीं है। इसकी हर शरारत में एक दिव्यता छुपी हुई है।

उस दिन के बाद से गोपियों ने एक नई परंपरा शुरू की। वे जानबूझकर माखन के मटके ऐसी जगह रखने लगीं जहां कृष्ण आसानी से पहुंच सके। वे चाहती थीं कि उनका प्यारा कन्हैया खुश रहे और उसकी माखन चोरी की लीला जारी रहे।

माता यशोदा जब इस घटना के बारे में सुनीं, तो वे मुस्कराईं। वे जानती थीं कि उनका लाल कोई साधारण बच्चा नहीं है। उसकी हर शरारत में प्रेम और आनंद छुपा हुआ है।

इस प्रकार कृष्ण की माखन चोरी की यह लीला वृंदावन में प्रसिद्ध हो गई। आज भी जब माताएं अपने बच्चों को यह कहानी सुनाती हैं, तो वे सिखाती हैं कि जीवन में थोड़ी शरारत और मस्ती होनी चाहिए, परंतु वह प्रेम और मासूमियत से भरी होनी चाहिए।

कृष्ण की यह माखन चोरी हमें सिखाती है कि बचपन की मासूमियत और प्रेम के आगे सभी नियम छोटे हो जाते हैं। जब हृदय में सच्चा प्रेम हो, तो छोटी-मोटी शरारतें भी मधुर लगती हैं।

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