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हातिम ताई और जादुई पेड़ – अकबर बीरबल की कहानी
एक दिन बादशाह अकबर अपने दरबार में बैठे थे। उनके चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। बीरबल ने देखा तो पूछा, “जहांपनाह, आप परेशान क्यों लग रहे हैं?”
अकबर ने कहा, “बीरबल, मैंने हातिम ताई की दानवीरता के बारे में बहुत सुना है। लेकिन क्या वाकई कोई व्यक्ति इतना उदार हो सकता है कि अपना सब कुछ दूसरों के लिए त्याग दे?”
बीरबल मुस्कराए और बोले, “हुजूर, हातिम ताई की दानवीरता केवल कहानियों में नहीं, बल्कि हकीकत में भी थी। चलिए, मैं आपको एक ऐसी घटना सुनाता हूं जो मैंने अपनी आंखों से देखी है।”
बीरबल ने कहानी शुरू की: “कुछ साल पहले, मैं एक यात्रा पर था। रास्ते में मुझे एक गांव मिला जहां लोग बहुत परेशान थे। वहां के मुखिया ने बताया कि उनके गांव में एक जादुई पेड़ था जो सबकी मनोकामनाएं पूरी करता था।”
“लेकिन एक दिन वह पेड़ सूख गया था।” बीरबल ने आगे कहा। “गांववाले बहुत दुखी थे क्योंकि अब उनकी कोई समस्या का समाधान नहीं हो रहा था।”
अकबर ने उत्सुकता से पूछा, “फिर क्या हुआ?”
बीरबल ने कहा, “तभी हातिम ताई वहां पहुंचे। उन्होंने गांववालों की समस्या सुनी। एक बुजुर्ग ने बताया कि जादुई पेड़ तभी फिर से हरा-भरा होगा जब कोई सच्चा दानवीर अपना सबसे कीमती खजाना उसकी जड़ों में दबाएगा।”
“हातिम ताई ने बिना सोचे अपनी सबसे कीमती अंगूठी निकाली।” बीरबल की आवाज में भावना थी। “वह अंगूठी उनके पिता की निशानी थी। लेकिन उन्होंने उसे जादुई पेड़ की जड़ों में दबा दिया।”
अकबर ने पूछा, “क्या पेड़ फिर से हरा हो गया?”
“नहीं हुजूर,” बीरबल ने कहा। “पेड़ वैसा ही सूखा रहा। गांववाले निराश हो गए। लेकिन हातिम ताई ने हार नहीं मानी।”
बीरबल ने आगे कहा, “हातिम ताई ने अपने घोड़े, अपने कपड़े, यहां तक कि अपने जूते भी उतारकर गांववालों में बांट दिए। वे केवल एक साधारण कुर्ता पहनकर रह गए।”
“तब भी जादुई पेड़ नहीं खिला?” अकबर ने पूछा।
“नहीं, जहांपनाह।” बीरबल ने कहा। “लेकिन हातिम ताई ने कहा – ‘मेरे पास देने के लिए और कुछ नहीं है, लेकिन मैं अपनी सेवा दे सकता हूं।’ और वे गांव में ही रुक गए।”
बीरबल की आंखों में चमक थी। “हातिम ताई ने बीमारों की सेवा की, बुजुर्गों की मदद की, बच्चों को पढ़ाया। वे दिन-रात गांववालों की सेवा में लगे रहे।”
“और एक दिन चमत्कार हुआ!” बीरबल ने उत्साह से कहा। “जादुई पेड़ अचानक हरा-भरा हो गया। उसमें सुंदर फूल खिले और मीठे फल लगे।”
अकबर हैरान रह गए। “लेकिन यह कैसे हुआ? हातिम ताई ने तो कोई खजाना नहीं दिया था।”
बीरबल मुस्कराए और बोले, “हुजूर, हातिम ताई ने अपना सबसे बड़ा खजाना दिया था – अपना प्रेम, अपनी सेवा, और अपना समय। यही तो सच्ची दानवीरता है।”
“उस दिन मैंने समझा कि जादुई पेड़ का असली जादू यह था कि वह लोगों के दिलों में छुपी दानवीरता को बाहर लाता था।” बीरबल ने समझाया।
अकबर ने गहरी सांस ली और कहा, “बीरबल, आज तुमने मुझे एक बहुत बड़ी सीख दी है। सच्चा खजाना धन में नहीं, बल्कि दूसरों की सेवा में है।”
बीरबल ने कहा, “जी हुजूर, हातिम ताई और जादुई पेड़ की यह कहानी हमें सिखाती है कि सबसे बड़ा दान प्रेम और सेवा का है।”
उस दिन से अकबर ने भी अपनी प्रजा की सेवा को अपना सबसे बड़ा धर्म माना। और यह कहानी आज भी लोगों को सिखाती है कि सच्ची दानवीरता केवल धन देने में नहीं, बल्कि दिल से किसी की मदद करने में है।










