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हनुमान जी ने सीता को राम की अंगूठी दी
बहुत समय पहले की बात है, जब त्रेता युग में भगवान राम का राज्य था। एक दिन माता सीता को रावण ने धोखे से अपहरण कर लिया और उन्हें लंका ले गया। प्रभु राम और लक्ष्मण जी सीता माता की खोज में निकले।
जब राम जी को पता चला कि सीता माता लंका में हैं, तो उन्होंने अपने सबसे प्रिय भक्त हनुमान जी को बुलाया। “हे पवनपुत्र हनुमान!” राम जी ने कहा, “तुम्हें लंका जाकर सीता माता का पता लगाना होगा।”
हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, “प्रभु, आपकी आज्ञा मेरे लिए सर्वोपरि है। परंतु माता सीता कैसे विश्वास करेंगी कि मैं आपका दूत हूं?”
तब राम जी ने अपनी अंगुली से एक सुंदर अंगूठी निकाली। यह अंगूठी सोने की थी और उस पर “राम” लिखा हुआ था। राम जी ने हनुमान जी को वह अंगूठी देते हुए कहा, “यह मेरी अंगूठी है। जब तुम सीता को राम की अंगूठी देना, तो वे समझ जाएंगी कि तुम मेरे भेजे हुए हो।”
हनुमान जी ने अंगूठी को अपने हृदय से लगाया और कहा, “जय श्री राम! मैं माता सीता तक यह संदेश अवश्य पहुंचाऊंगा।”
हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और समुद्र को पार करके लंका पहुंचे। वहां उन्होंने अशोक वाटिका में माता सीता को देखा। सीता माता एक वृक्ष के नीचे बैठी हुई राम जी का स्मरण कर रही थीं।
हनुमान जी ने धीरे से पेड़ की आड़ से कहा, “हे माता! मैं राम जी का दूत हनुमान हूं।” सीता माता चौंक गईं और डर गईं।
“तुम कौन हो? कैसे यहां आए हो?” सीता माता ने पूछा।
हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, “माता, मैं आपके प्रमाण के लिए राम जी की यह अंगूठी लाया हूं।” और उन्होंने वह सुनहरी अंगूठी सीता माता के सामने रखी।
जैसे ही सीता माता ने राम जी की अंगूठी देखी, उनकी आंखों में आंसू आ गए। वे समझ गईं कि यह वास्तव में राम जी का दूत है। “हे हनुमान! तुम सच में राम जी के भेजे हुए हो। यह अंगूठी मेरे प्राणप्रिय राम की है।”
हनुमान जी ने कहा, “माता, राम जी आपकी खोज में दिन-रात व्याकुल रहते हैं। वे जल्द ही यहां आकर आपको मुक्त कराएंगे।”
सीता माता ने अपने बालों से एक मणि निकालकर हनुमान जी को दी और कहा, “यह मणि राम जी को देना और कहना कि सीता उनकी प्रतीक्षा कर रही है।”
इस प्रकार हनुमान जी ने सफलतापूर्वक सीता को राम की अंगूठी देना का कार्य पूरा किया। यह अंगूठी न केवल राम जी का संदेश थी, बल्कि सीता माता के लिए आशा की किरण भी थी।
हनुमान जी वापस राम जी के पास गए और सारा वृत्तांत सुनाया। राम जी बहुत प्रसन्न हुए और हनुमान जी की वीरता की प्रशंसा की।
इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि सच्ची भक्ति और विश्वास से कोई भी कार्य असंभव नहीं है। हनुमान जी की तरह हमें भी अपने कर्तव्यों का पालन पूरी निष्ठा से करना चाहिए।












