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हनुमान जी द्वारा मीराबाई की रक्षा

बहुत समय पहले की बात है, जब मेवाड़ की राजकुमारी मीराबाई श्री कृष्ण की अनन्य भक्त थीं। वे दिन-रात कृष्ण भजन में लीन रहती थीं और उनका पूरा जीवन भगवान की भक्ति में समर्पित था।

मीराबाई का विवाह राणा सांगा के पुत्र भोजराज से हुआ था, परंतु विवाह के कुछ समय बाद ही भोजराज का देहांत हो गया। इसके बाद मीराबाई की भक्ति और भी गहरी हो गई। वे अपना सारा समय कृष्ण भजन और सत्संग में बिताने लगीं।

राजपरिवार के कुछ लोगों को मीराबाई का यह व्यवहार पसंद नहीं आता था। वे चाहते थे कि मीराबाई एक सामान्य रानी की तरह रहें, परंतु मीराबाई का मन तो केवल कृष्ण भक्ति में ही लगता था।

एक दिन राजपरिवार के कुछ दुष्ट लोगों ने मीराबाई को हानि पहुंचाने की योजना बनाई। उन्होंने सोचा कि यदि मीराबाई नहीं रहेंगी तो राजपरिवार की “मर्यादा” बनी रहेगी।

उस रात जब मीराबाई अपने कमरे में कृष्ण भजन कर रही थीं, तो कुछ दुष्ट लोग उन्हें हानि पहुंचाने के लिए आए। परंतु मीराबाई निडर होकर भजन करती रहीं। वे जानती थीं कि उनके कृष्ण उनकी रक्षा करेंगे।

अचानक कमरे में एक तेज़ प्रकाश फैला और वहां एक विशालकाय वानर प्रकट हुआ। यह कोई और नहीं बल्कि हनुमान जी थे, जो राम भक्त होने के साथ-साथ सभी भक्तों के रक्षक भी हैं।

हनुमान जी ने गर्जना करते हुए कहा, “जो भी सच्चे भक्त की हानि करने का दुस्साहस करता है, उसे मुझसे पार पाना होगा!”

दुष्ट लोग हनुमान जी का विशाल रूप देखकर भयभीत हो गए। उनके हाथ से हथियार गिर गए और वे कांपने लगे। हनुमान जी की आंखों से निकलने वाली ज्वाला देखकर वे समझ गए कि यह कोई साधारण शक्ति नहीं है।

हनुमान जी ने उन दुष्टों से कहा, “मीराबाई एक सच्ची भक्त हैं। जो भी उनकी हानि करने का प्रयास करेगा, उसे मेरे क्रोध का सामना करना पड़ेगा। अब यहां से चले जाओ और फिर कभी इस पवित्र आत्मा को परेशान करने का दुस्साहस मत करना।”

डरे हुए दुष्ट लोग वहां से भाग गए। मीराबाई ने हनुमान जी को प्रणाम किया और कहा, “हे पवनपुत्र, आपने मेरी रक्षा की है। मैं जानती थी कि भगवान अपने भक्तों को कभी अकेला नहीं छोड़ते।”

हनुमान जी ने मुस्कराते हुए कहा, “हे देवी, तुम्हारी भक्ति सच्ची है। जब तक तुम भगवान का नाम लेती रहोगी, तब तक कोई भी शक्ति तुम्हारा बाल भी बांका नहीं कर सकती। मैं सदा तुम्हारी रक्षा के लिए तैयार हूं।”

उस दिन के बाद से मीराबाई की रक्षा के लिए हनुमान जी हमेशा उनके आसपास रहते थे। जब भी कोई मीराबाई को परेशान करने का प्रयास करता, तो रहस्यमय तरीके से वह व्यक्ति असफल हो जाता था।

एक बार राजपरिवार के लोगों ने मीराबाई के भोजन में विष मिलाया, परंतु जब मीराबाई ने भगवान को भोग लगाकर प्रसाद खाया, तो विष अमृत बन गया। यह भी हनुमान जी की कृपा थी।

दूसरी बार जब मीराबाई को सांप के साथ एक पेटी भेजी गई, तो पेटी खोलने पर उसमें से भगवान कृष्ण की सुंदर मूर्ति निकली। सांप कहीं गायब हो गया था।

मीराबाई समझ गईं कि यह सब हनुमान जी की कृपा है। वे रोज़ हनुमान जी का स्मरण करतीं और उनका धन्यवाद करतीं।

अंत में, मीराबाई ने अपना पूरा जीवन भगवान की भक्ति में बिताया। हनुमान जी की रक्षा में वे निर्भय होकर कृष्ण भजन करती रहीं और लोगों को भक्ति का मार्ग दिखाती रहीं।

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि सच्ची भक्ति करने वाले व्यक्ति की रक्षा स्वयं भगवान करते हैं। हनुमान जी सभी भक्तों के रक्षक हैं और जो भी सच्चे मन से उनका स्मरण करता है, उसकी रक्षा अवश्य होती है। मीराबाई की तरह यदि हम भी सच्चे मन से भगवान की भक्ति करें, तो कोई भी बुरी शक्ति हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सकती।

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