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द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य की पावन कथा
बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं और असुरों के बीच निरंतर युद्ध चलता रहता था। उस समय भगवान ब्रह्मा और भगवान विष्णु के बीच एक विवाद हुआ कि उनमें से कौन सबसे महान है।
दोनों देवताओं का अहंकार बढ़ता जा रहा था। तभी अचानक उनके सामने एक विशाल ज्योतिर्लिंग प्रकट हुआ। यह ज्योति इतनी तेजस्वी थी कि न तो इसका आदि दिखाई दे रहा था और न ही अंत।
भगवान ब्रह्मा ने कहा, “मैं इस ज्योति के ऊपरी छोर को खोजूंगा।” और भगवान विष्णु बोले, “मैं इसके निचले छोर को ढूंढूंगा।”
ब्रह्मा जी हंस पर सवार होकर ऊपर की ओर उड़े और विष्णु जी वराह रूप धारण करके नीचे की ओर गए। हजारों वर्षों तक खोजने के बाद भी दोनों को उस ज्योतिर्लिंग का छोर नहीं मिला।
जब वे वापस लौटे तो भगवान शिव उस ज्योतिर्लिंग से प्रकट हुए। उन्होंने मुस्कराते हुए कहा, “हे देवगणों! यह ज्योतिर्लिंग मेरा स्वरूप है। मैं ही सबसे महान हूं क्योंकि मैं निराकार और साकार दोनों रूपों में विद्यमान हूं।”
भगवान विष्णु ने तुरंत शिव जी के चरणों में प्रणाम किया और कहा, “हे महादेव! आप ही परम सत्य हैं। कृपया हमें क्षमा करें।”
परंतु ब्रह्मा जी ने झूठ बोला कि उन्होंने ज्योतिर्लिंग का ऊपरी छोर देख लिया है। इस पर भगवान शिव ने उन्हें श्राप दिया कि पृथ्वी पर उनकी पूजा नहीं होगी।
तब भगवान शिव ने घोषणा की, “मैं पृथ्वी पर बारह स्थानों पर ज्योतिर्लिंग के रूप में स्थापित होऊंगा। जो भक्त इन द्वादश ज्योतिर्लिंग के दर्शन करेगा, उसके सभी पाप नष्ट हो जाएंगे।”
पहला ज्योतिर्लिंग सोमनाथ में प्रकट हुआ, जहां चंद्रदेव ने शिव जी की आराधना की थी। दूसरा मल्लिकार्जुन में, जहां शिव-पार्वती का निवास है।
तीसरा ज्योतिर्लिंग महाकालेश्वर उज्जैन में स्थापित हुआ, जो काल के भी काल हैं। चौथा ओंकारेश्वर में, जहां ॐकार की ध्वनि सदा गूंजती रहती है।
पांचवां केदारनाथ हिमालय में प्रकट हुआ, जहां पांडवों ने तपस्या की थी। छठा भीमशंकर में, जहां भीम नामक राक्षस का वध हुआ था।
सातवां ज्योतिर्लिंग काशी विश्वनाथ में स्थापित हुआ, जो मोक्ष की नगरी है। आठवां त्र्यंबकेश्वर में, जहां गंगा का उद्गम है।
नौवां वैद्यनाथ में प्रकट हुआ, जो सभी रोगों को हरने वाला है। दसवां नागेश्वर में, जहां नागों का राज है।
ग्यारहवां ज्योतिर्लिंग रामेश्वर में स्थापित हुआ, जहां भगवान राम ने शिव जी की पूजा की थी। बारहवां और अंतिम घृष्णेश्वर में प्रकट हुआ।
भगवान शिव ने कहा, “जो भक्त श्रद्धा और भक्ति से इन द्वादश ज्योतिर्लिंग के नाम का स्मरण करेगा, उसे मोक्ष की प्राप्ति होगी। ये ज्योतिर्लिंग युगों-युगों तक भक्तों की मनोकामनाएं पूर्ण करते रहेंगे।”
तभी से द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य की महिमा सारे संसार में फैल गई। देवता, मनुष्य और ऋषि-मुनि सभी इन पवित्र स्थानों पर जाकर भगवान शिव की आराधना करने लगे।
एक दिन नारद मुनि ने भगवान शिव से पूछा, “हे प्रभु! इन ज्योतिर्लिंगों की पूजा का क्या विधान है?”
भगवान शिव ने उत्तर दिया, “हे नारद! सच्चे मन से ‘ॐ नमः शिवाय’ का जाप करते हुए जो भक्त इन ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करता है, उसके सभी कष्ट दूर हो जाते हैं। बिल्वपत्र, धतूरा, और गंगाजल से पूजा करने से विशेष फल मिलता है।”
इस प्रकार द्वादश ज्योतिर्लिंग माहात्म्य की यह पावन कथा हमें सिखाती है कि भगवान शिव सर्वत्र विद्यमान हैं। वे अपने भक्तों की सदा रक्षा करते हैं और उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं।
आज भी लाखों श्रद्धालु इन पवित्र ज्योतिर्लिंगों के दर्शन करने जाते हैं और भगवान शिव का आशीर्वाद प्राप्त करते हैं। यही है हमारे सनातन धर्म की महानता और द्वादश ज्योतिर्लिंग की अद्भुत शक्ति।







