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बालक क्यों हँसा? बेताल पच्चीसी – बीसवीं कहानी

राजा विक्रमादित्य अपने कंधे पर बेताल को लिए हुए श्मशान की ओर जा रहे थे। रास्ते में बेताल ने फिर से एक कहानी सुनाने की इच्छा प्रकट की।

“राजन्! सुनिए एक और रोचक कथा।” बेताल ने कहा।

विक्रम मौन रहकर सुनने लगे।

बेताल की कहानी:

प्राचीन काल में कल्याणपुर नामक एक नगर था। वहाँ राजा चंद्रगुप्त का शासन था। राजा बहुत न्यायप्रिय और प्रजावत्सल था। उसके राज्य में एक धनी सेठ रहता था जिसका नाम मणिकांत था।

सेठ मणिकांत के पास अपार धन-संपत्ति थी, परंतु उसके कोई संतान नहीं थी। वह बहुत दुखी रहता था। एक दिन उसकी पत्नी ने कहा, “स्वामी! हमें किसी योग्य बालक को गोद ले लेना चाहिए।”

सेठ ने इस सुझाव को मान लिया। उन्होंने नगर में घोषणा करवाई कि वे एक योग्य बालक को गोद लेना चाहते हैं।

कुछ दिनों बाद एक गरीब ब्राह्मण अपने दस वर्षीय पुत्र के साथ सेठ के पास आया। बालक का नाम विद्यासागर था। वह बहुत बुद्धिमान और सुशील था।

“सेठजी! मैं बहुत गरीब हूँ। अपने पुत्र का पालन-पोषण नहीं कर सकता। यदि आप इसे गोद ले लें तो मैं धन्य हो जाऊंगा।” ब्राह्मण ने विनती की।

सेठ और उसकी पत्नी ने बालक को देखा। विद्यासागर का चेहरा तेजस्वी था और उसकी आँखों में बुद्धि की चमक थी। उन्होंने तुरंत उसे गोद ले लिया।

विद्यासागर को सेठ के घर में राजकुमार की भांति सुविधाएं मिलीं। उसे सर्वोत्तम शिक्षा दी गई। वह संस्कृत, गणित, ज्योतिष और व्यापार की कला में निपुण हो गया।

समय बीतता गया। विद्यासागर युवा हो गया। सेठ मणिकांत ने उसका विवाह एक सुंदर और गुणवती कन्या से कर दिया। विद्यासागर का जीवन सुखमय था।

एक दिन सेठ मणिकांत बीमार पड़ गया। उसकी हालत गंभीर हो गई। मृत्यु से पूर्व उसने विद्यासागर को अपने पास बुलाया।

“पुत्र! मैं तुम्हें अपनी सारी संपत्ति सौंप रहा हूँ। तुम इसका सदुपयोग करना। गरीबों की सहायता करना और धर्म के मार्ग पर चलना।” सेठ ने कहा।

विद्यासागर ने आँसू भरी आँखों से वचन दिया। कुछ दिनों बाद सेठ मणिकांत का देहांत हो गया।

अब विद्यासागर घर का मुखिया बन गया। वह अपने पिता की भांति न्यायप्रिय और दानवीर था। उसकी ख्याति दूर-दूर तक फैली।

एक दिन विद्यासागर के वास्तविक पिता, वह गरीब ब्राह्मण, उसके पास आया। वह अब बूढ़ा और कमजोर हो गया था। उसके पास पहनने को कपड़े नहीं थे और खाने को अन्न नहीं था।

“पुत्र! मैं तुम्हारा वास्तविक पिता हूँ। मुझे पहचानते हो?” ब्राह्मण ने कहा।

विद्यासागर ने उसे देखा और तुरंत पहचान गया। परंतु उसके चेहरे पर कोई भाव नहीं आया।

“मैं आपको नहीं जानता। आप कौन हैं?” विद्यासागर ने ठंडे स्वर में कहा।

ब्राह्मण का हृदय टूट गया। उसकी आँखों में आँसू आ गए। “पुत्र! मैंने तुम्हें जन्म दिया है। तुम मेरे रक्त हो। क्या तुम अपने पिता को भूल गए?”

“मेरे पिता तो सेठ मणिकांत थे जिन्होंने मुझे पाला-पोसा। आप एक अजनबी हैं।” विद्यासागर ने कठोरता से कहा।

ब्राह्मण निराश होकर वापस चला गया। रास्ते में उसकी मुलाकात एक छोटे बालक से हुई। बालक ने ब्राह्मण की दुर्दशा देखी और पूछा, “बाबा! आप इतने दुखी क्यों हैं?”

ब्राह्मण ने अपनी पूरी कहानी सुनाई। यह सुनकर बालक जोर से हँसने लगा।

“हा हा हा! कितनी मूर्खता की बात है!” बालक हँसता रहा।

ब्राह्मण को बालक का हँसना अजीब लगा। “बेटा! तुम क्यों हँस रहे हो? मेरी दुर्दशा देखकर तुम्हें दया आनी चाहिए।”

बालक ने हँसना बंद किया और गंभीर होकर कहा, “बाबा! आप स्वयं ही अपने दुख के कारण हैं। जब आपने अपने पुत्र को धन के लिए बेच दिया था, तो उसी दिन आपका पितृत्व समाप्त हो गया था। अब आप उससे पिता का व्यवहार की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं?”

ब्राह्मण को अपनी गलती का एहसास हुआ। वह चुपचाप वहाँ से चला गया।

बेताल ने कहानी समाप्त करके पूछा, “राजा विक्रम! बताइए कि वह बालक क्यों हँसा? यदि आप जानते हुए भी चुप रहे तो आपका सिर फट जाएगा।”

राजा विक्रम ने उत्तर दिया, “बेताल! बालक इसलिए हँसा क्योंकि उसे ब्राह्मण की मूर्खता पर आश्चर्य हुआ। जो व्यक्ति अपने पुत्र को धन के लालच में दूसरे को दे देता है, वह पिता कहलाने का अधिकार खो देता है। रिश्ते केवल खून से नहीं बनते, बल्कि प्रेम और त्याग से बनते हैं। सेठ मणिकांत ने विद्यासागर को पाला-पोसा, शिक्षा दी और प्रेम दिया, इसलिए वही उसका वास्तविक पिता था।”

“सत्य कहा राजन्!” बेताल बोला और फिर से पेड़ पर जा लटका।

इस प्रकार बेताल पच्चीसी की बीसवीं कहानी समाप्त हुई, जो हमें सिखाती है कि सच्चे रिश्ते प्रेम और त्याग से बनते हैं, न कि केवल रक्त संबंध से।

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