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हनुमान जी की महाभारत युद्ध में भूमिका
बहुत समय पहले की बात है, जब धर्म और अधर्म के बीच महाभारत का महान युद्ध हो रहा था। इस युद्ध में भगवान हनुमान जी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण थी, यद्यपि वे प्रत्यक्ष रूप से युद्ध में भाग नहीं ले रहे थे।
कुरुक्षेत्र के मैदान में जब अर्जुन अपने रथ पर बैठे थे, तो उन्होंने देखा कि उनके रथ की ध्वजा पर एक विशाल वानर की आकृति थी। यह कोई और नहीं बल्कि स्वयं हनुमान जी थे, जो अर्जुन के रथ की रक्षा कर रहे थे।
“हे वीर अर्जुन!” हनुमान जी ने कहा, “मैं यहाँ आपकी और धर्म की रक्षा के लिए हूँ। महाभारत युद्ध में मेरी भूमिका आपके साथ रहने की है।”
अर्जुन ने आश्चर्य से पूछा, “हे महावीर हनुमान! आप यहाँ क्यों आए हैं?”
हनुमान जी ने मुस्कराते हुए उत्तर दिया, “पुत्र, जहाँ धर्म होता है, वहाँ मैं अवश्य होता हूँ। यह महाभारत युद्ध धर्म और अधर्म के बीच है, और मेरी भूमिका यहाँ धर्म की विजय सुनिश्चित करना है।”
युद्ध के दौरान जब भीष्म पितामह के बाणों से अर्जुन का रथ हिल रहा था, तो हनुमान जी ने अपनी शक्ति से रथ को स्थिर रखा। उनकी उपस्थिति से अर्जुन को अदभुत साहस मिल रहा था।
एक दिन कर्ण ने अर्जुन पर इतने शक्तिशाली बाण चलाए कि पूरा रथ हिल गया। उस समय हनुमान जी ने अपनी पूंछ से रथ को संभाला और सभी बाणों को अपने शरीर पर झेला।
“हनुमान जी!” अर्जुन चिल्लाए, “आप घायल हो गए हैं!”
हनुमान जी ने धैर्य से कहा, “चिंता मत करो वत्स। महाभारत युद्ध में मेरी भूमिका तुम्हारी रक्षा करना है। ये छोटी चोटें मेरे लिए कुछ भी नहीं हैं।”
जब द्रोणाचार्य ने चक्रव्यूह रचा था और अभिमन्यु उसमें फंस गया था, तो हनुमान जी ने गुप्त रूप से अभिमन्यु की सहायता की। उन्होंने अपनी शक्ति से कई योद्धाओं को भ्रमित किया ताकि अभिमन्यु को बाहर निकलने का मौका मिल सके।
युद्ध के अंतिम दिन जब दुर्योधन और भीम का गदा युद्ध हो रहा था, तो हनुमान जी ने भीम को संकेत दिया कि दुर्योधन की जांघ पर प्रहार करे। इस प्रकार महाभारत युद्ध में उनकी भूमिका निर्णायक साबित हुई।
युद्ध समाप्त होने के बाद, जब पांडव विजयी हुए, तो हनुमान जी ने अर्जुन से कहा, “अब मेरा कार्य पूरा हुआ। महाभारत युद्ध में मेरी भूमिका धर्म की स्थापना करना था, जो सफल हुई।”
अर्जुन ने कृतज्ञता से कहा, “हे हनुमान जी! आपकी कृपा के बिना यह विजय संभव नहीं थी।”
हनुमान जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “पुत्र, जहाँ धर्म होता है, वहाँ विजय अवश्य होती है। महाभारत युद्ध में मेरी भूमिका केवल धर्म की सेवा करना था।”
इस प्रकार हनुमान जी ने महाभारत युद्ध में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उन्होंने सिखाया कि सच्चा वीर वही है जो धर्म की रक्षा के लिए निस्वार्थ भाव से कार्य करता है।
इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि जीवन में हमेशा धर्म का साथ देना चाहिए। हनुमान जी की तरह हमें भी कठिन समय में धर्म के पक्ष में खड़ा होना चाहिए।











