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हनुमान जी का पर्वत उठाकर ले जाना – संजीवनी की कहानी

बहुत समय पहले की बात है, जब त्रेता युग में भगवान राम और रावण के बीच भयंकर युद्ध चल रहा था। लंका की रणभूमि में वीर योद्धा लक्ष्मण जी मेघनाद के विषैले बाण से घायल होकर मूर्छित हो गए थे।

जब हनुमान जी ने अपने प्रिय लक्ष्मण भैया को इस दशा में देखा, तो उनका हृदय दुःख से भर गया। वैद्यराज सुषेण ने कहा, “हे पवनपुत्र! केवल द्रोणागिरि पर्वत पर मिलने वाली संजीवनी बूटी ही लक्ष्मण जी के प्राण बचा सकती है। परंतु यह बूटी सूर्योदय से पहले लानी होगी, अन्यथा…”

हनुमान जी तुरंत समझ गए कि समय बहुत कम है। उन्होंने भगवान राम के चरणों में प्रणाम किया और बोले, “प्रभु! आपकी आज्ञा से मैं द्रोणागिरि पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर आता हूँ।”

राम जी ने आशीर्वाद देते हुए कहा, “जाओ वत्स! तुम्हारी भक्ति और शक्ति के आगे कोई बाधा टिक नहीं सकती।”

हनुमान जी ने अपना विशाल रूप धारण किया और गर्जना करते हुए आकाश में उड़ चले। उनकी गति इतनी तेज़ थी कि हवा में बवंडर उठने लगे। पर्वत, नदियाँ और समुद्र पल भर में पीछे छूटते गए।

जब हनुमान जी द्रोणागिरि पर्वत पहुँचे, तो उन्होंने देखा कि पूरा पर्वत औषधियों से भरा हुआ है। परंतु रात के अंधकार में संजीवनी बूटी को पहचानना असंभव था। सभी बूटियाँ एक जैसी दिख रही थीं।

हनुमान जी ने सोचा, “समय बर्बाद नहीं करना चाहिए। लक्ष्मण भैया के प्राण संकट में हैं।” उन्होंने निर्णय लिया कि पूरे पर्वत को ही उठाकर ले चलेंगे।

हनुमान जी ने अपनी दोनों भुजाओं को फैलाया और पर्वत उठाकर ले जाने का संकल्प किया। उन्होंने “जय श्री राम” का उद्घोष करते हुए पूरे द्रोणागिरि पर्वत को अपनी हथेली पर उठा लिया।

यह दृश्य देखकर देवता भी आश्चर्यचकित हो गए। इतने विशाल पर्वत को एक हाथ में लेकर हनुमान जी तेज़ी से लंका की ओर उड़ चले। उनकी शक्ति और भक्ति देखकर सभी देवगण उनकी जय-जयकार करने लगे।

रास्ते में भरत जी ने आकाश में एक विशाल छाया देखी। उन्होंने सोचा कि कोई राक्षस राम जी को हानि पहुँचाने जा रहा है। उन्होंने तुरंत बाण चलाया जो हनुमान जी के पैर में लगा।

हनुमान जी नीचे गिरे और भरत जी के पास पहुँचे। जब भरत जी ने सारी स्थिति समझी, तो वे बहुत दुखी हुए। उन्होंने हनुमान जी से क्षमा माँगी और अपनी अंगूठी देकर कहा, “यह राम जी को दे देना। वे समझ जाएंगे कि मैंने आपकी सहायता की है।”

हनुमान जी फिर से पर्वत उठाकर ले जाने लगे। इस बार उनकी गति और भी तेज़ थी क्योंकि लक्ष्मण जी की स्थिति गंभीर होती जा रही थी।

जब हनुमान जी लंका पहुँचे, तो सूर्योदय होने में बहुत कम समय बचा था। उन्होंने पर्वत को रणभूमि में रख दिया। वैद्यराज सुषेण ने तुरंत संजीवनी बूटी पहचानी और उसका रस निकालकर लक्ष्मण जी को दिया।

कुछ ही क्षणों में लक्ष्मण जी की आँखें खुल गईं। उन्होंने “जय श्री राम” कहते हुए अपने भाई राम जी के चरण स्पर्श किए। सभी की आँखों में खुशी के आँसू थे।

भगवान राम ने हनुमान जी को गले लगाते हुए कहा, “हे पवनपुत्र! तुमने आज फिर से सिद्ध कर दिया कि सच्ची भक्ति के आगे कोई बाधा नहीं टिक सकती। तुम्हारी वीरता और समर्पण अतुलनीय है।”

हनुमान जी ने विनम्रता से कहा, “प्रभु! यह सब आपकी कृपा है। आपके भक्त के लिए असंभव कुछ भी नहीं।”

इस प्रकार हनुमान जी ने पर्वत उठाकर ले जाने का यह अद्भुत कार्य किया और लक्ष्मण जी के प्राण बचाए। उनकी यह वीरगाथा आज भी हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति, दृढ़ संकल्प और निस्वार्थ सेवा से कोई भी कार्य असंभव नहीं है।

शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि जब हम किसी की सच्चे मन से सहायता करते हैं, तो भगवान हमें अपार शक्ति प्रदान करते हैं। हनुमान जी की तरह हमें भी कभी हार नहीं मानना चाहिए और मुश्किल समय में धैर्य रखना चाहिए।

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