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उमा माहात्म्य: माता पार्वती की महान शक्ति

बहुत समय पहले की बात है, जब देवताओं पर संकट के बादल छाए हुए थे। तारकासुर नामक एक महान राक्षस ने तपस्या करके ब्रह्मा जी से वरदान प्राप्त किया था कि उसे केवल भगवान शिव का पुत्र ही मार सकता है। परंतु शिव जी तो सती के वियोग में समाधि में लीन थे।

देवराज इंद्र और सभी देवता चिंतित थे। वे जानते थे कि उमा माहात्म्य ही इस समस्या का समाधान है। माता पार्वती, जो उमा के नाम से भी जानी जाती हैं, ही एकमात्र शक्ति थीं जो भगवान शिव को समाधि से जगा सकती थीं।

हिमालय राज के घर में पार्वती का जन्म हुआ था। वे बचपन से ही भगवान शिव की परम भक्त थीं। उनकी माता मेनका कहती थीं, “बेटी, तुम्हारे मन में शिव के अतिरिक्त और कुछ नहीं है।”

पार्वती मुस्कराकर कहतीं, “माता जी, मेरा हृदय तो केवल महादेव के लिए ही धड़कता है। मैं उन्हीं से विवाह करूंगी।”

देवताओं ने नारद मुनि से सलाह ली। नारद जी ने कहा, “देवताओं, उमा माहात्म्य का रहस्य यह है कि माता पार्वती ही आदिशक्ति का अवतार हैं। उनकी तपस्या से ही शिव जी जागेंगे।”

पार्वती ने कठोर तपस्या आरंभ की। वे पहाड़ों में जाकर, केवल फल-फूल खाकर, कभी-कभी तो बिना कुछ खाए ही दिन बिताने लगीं। उनकी सखियां चिंतित होकर कहतीं, “सखी, इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो?”

पार्वती दृढ़ता से उत्तर देतीं, “मुझे अपने प्रियतम को पाना है। उमा माहात्म्य यही कहता है कि सच्चे प्रेम के लिए कोई भी तपस्या छोटी नहीं होती।”

वर्षों तक तपस्या करने के बाद, एक दिन एक युवा ब्राह्मण पार्वती के पास आया। वह वास्तव में भगवान शिव ही थे, जो पार्वती की परीक्षा लेने आए थे।

ब्राह्मण ने कहा, “हे सुंदरी, तुम इतनी कठोर तपस्या क्यों कर रही हो? शिव तो एक अजीब व्यक्ति है। वह सांप पहनता है, श्मशान में रहता है। तुम्हारे जैसी सुंदर कन्या के लिए कोई और अच्छा वर मिल सकता है।”

पार्वती को क्रोध आ गया। उन्होंने कहा, “ब्राह्मण देव, आप मेरे प्रियतम के बारे में ऐसा न कहें। वे संसार के कल्याणकारी हैं। उनकी महिमा अपार है।”

शिव जी पार्वती की भक्ति देखकर प्रसन्न हो गए। वे अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए और बोले, “पार्वती, तुम्हारी तपस्या सफल हुई। उमा माहात्म्य का यही सार है कि सच्चा प्रेम और भक्ति सब कुछ जीत लेती है।”

पार्वती की आंखों में खुशी के आंसू आ गए। उन्होंने कहा, “प्रभु, आपने मेरी तपस्या स्वीकार की।”

शिव जी ने कहा, “तुम केवल पार्वती नहीं हो, तुम आदिशक्ति हो। तुम्हारे बिना मैं अधूरा हूं। आओ, हम मिलकर संसार का कल्याण करें।”

इस प्रकार शिव-पार्वती का विवाह हुआ। उनके पुत्र कार्तिकेय ने तारकासुर का वध किया और देवताओं को संकट से मुक्ति दिलाई। उमा माहात्म्य यह सिखाता है कि माता पार्वती की शक्ति और भक्ति के आगे कोई भी बाधा टिक नहीं सकती।

आज भी जब भक्तगण माता पार्वती की पूजा करते हैं, तो वे उमा माहात्म्य का स्मरण करते हैं। माता उमा की कृपा से घर में सुख-शांति आती है और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।

इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि धैर्य, दृढ़ता और सच्ची भक्ति से कोई भी लक्ष्य प्राप्त किया जा सकता है। उमा माहात्म्य हमें यह भी सिखाता है कि नारी शक्ति संसार की सबसे बड़ी शक्ति है। सच्चे प्रेम की कहानी भी इसी प्रकार की है, जहाँ धैर्य और प्रेम ने सभी बाधाओं को पार किया।

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