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पांडु और कुंती का विवाह – महाभारत की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा शांतनु का पुत्र पांडु राज्य करता था। पांडु एक वीर योद्धा और न्यायप्रिय राजा था। उसका रूप सुंदर था और वह धनुर्विद्या में अत्यंत निपुण था।
उसी समय यादव वंश में राजा शूरसेन की पुत्री कुंती रहती थी। कुंती का वास्तविक नाम पृथा था, परंतु उसे प्रेम से कुंती कहा जाता था। वह अत्यंत सुंदर, गुणवान और धर्मपरायण कन्या थी।
एक दिन राजा शूरसेन ने अपनी पुत्री कुंती के लिए स्वयंवर का आयोजन किया। उस स्वयंवर में देश-विदेश के अनेक राजकुमार आए थे। सभी कुंती के रूप और गुणों से मोहित थे।
जब कुंती स्वयंवर मंडप में पहुंची, तो उसकी आंखें सभी राजकुमारों पर पड़ीं। वहां अर्जुन के समान धनुर्धर, भीम के समान बलवान और युधिष्ठिर के समान धर्मात्मा राजकुमार बैठे थे। परंतु जब उसकी नजर पांडु पर पड़ी, तो वह मुग्ध हो गई।
पांडु का तेजस्वी चेहरा, उसकी वीरता की कीर्ति और उसका शालीन व्यवहार देखकर कुंती का मन उसी पर आ गया। बिना किसी संकोच के उसने पांडु के गले में वरमाला डाल दी।
“मैं राजकुमार पांडु को अपना पति स्वीकार करती हूं,” कुंती ने स्पष्ट स्वर में कहा।
सभी राजकुमार निराश हो गए, परंतु पांडु के चेहरे पर प्रसन्नता की लहर दौड़ गई। उसने भी कुंती को देखा था और उसके गुणों से प्रभावित था।
“राजकुमारी कुंती, मैं आपको अपनी पत्नी के रूप में स्वीकार करता हूं और आजीवन आपकी रक्षा करने का वचन देता हूं,” पांडु ने गंभीर स्वर में कहा।
इस प्रकार पांडु और कुंती का विवाह संपन्न हुआ। विवाह के समय सभी देवता आशीर्वाद देने आए। ब्रह्मा जी ने कहा कि यह दंपति महान पुत्रों का जनक बनेगा।
विवाह के बाद पांडु कुंती को लेकर हस्तिनापुर आया। वहां सभी ने उनका स्वागत किया। भीष्म पितामह ने कुंती को आशीर्वाद दिया और कहा:
“पुत्री कुंती, तुम इस वंश की शोभा बढ़ाओगी। तुम्हारे पुत्र इस धरती पर धर्म की स्थापना करेंगे।”
कुछ समय बाद पांडु ने मद्र देश की राजकुमारी माद्री से भी विवाह किया। कुंती ने माद्री को बहन के समान स्वीकार किया और दोनों में गहरी मित्रता हो गई।
एक दिन पांडु शिकार खेलने वन में गया। वहां उसने एक हिरण पर बाण चलाया, परंतु वह हिरण वास्तव में एक ऋषि था जो अपनी पत्नी के साथ हिरण का रूप धारण करके विहार कर रहा था।
मरते समय उस ऋषि ने पांडु को श्राप दिया: “जिस प्रकार तुमने मुझे मेरी पत्नी के साथ रहते समय मारा है, उसी प्रकार यदि तुम अपनी पत्नी के पास जाओगे तो तुम्हारी मृत्यु हो जाएगी।”
यह श्राप सुनकर पांडु अत्यंत दुखी हुआ। उसने कुंती और माद्री को सब कुछ बताया। तीनों ने मिलकर वन में जाकर तपस्या करने का निर्णय लिया।
वन में रहते समय कुंती ने पांडु को बताया कि उसके पास एक विशेष मंत्र है जिससे वह देवताओं का आह्वान कर सकती है। इस प्रकार उन्हें संतान प्राप्त हो सकती है।
पांडु की सहमति से कुंती ने पहले धर्मराज को आह्वान किया और युधिष्ठिर का जन्म हुआ। फिर पवन देव से भीम और इंद्र देव से अर्जुन का जन्म हुआ।
बाद में कुंती ने अपना मंत्र माद्री को भी सिखाया। माद्री ने अश्विनी कुमारों का आह्वान किया और नकुल तथा सहदेव का जन्म हुआ।
इस प्रकार पांडु और कुंती के विवाह से पांच महान पुत्रों का जन्म हुआ, जो आगे चलकर पांडव कहलाए और धर्म की स्थापना के लिए महाभारत युद्ध लड़े।
शिक्षा: इस कहानी से हमें यह सीख मिलती है कि सच्चा प्रेम और विवाह केवल रूप-रंग पर आधारित नहीं होता, बल्कि गुणों और चरित्र पर आधारित होता है। कुंती ने पांडु को उसके गुणों के कारण चुना था। साथ ही यह भी सिखाता है कि कठिन परिस्थितियों में भी धैर्य रखना चाहिए और धर्म का साथ नहीं छोड़ना चाहिए।













