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धृतराष्ट्र, पांडु और विदुर का जन्म – महाभारत की कहानी
बहुत समय पहले की बात है, जब हस्तिनापुर में राजा शांतनु का राज था। उनके पुत्र विचित्रवीर्य की मृत्यु के बाद राज्य में बड़ी समस्या आ गई थी। राज्य का कोई उत्तराधिकारी नहीं था।
रानी सत्यवती बहुत चिंतित थीं। उन्होंने अपने ज्येष्ठ पुत्र महर्षि व्यास को बुलाया। व्यास जी एक महान तपस्वी और ज्ञानी थे। सत्यवती ने कहा, “हे पुत्र! हस्तिनापुर के राज्य की रक्षा के लिए तुम्हें एक कार्य करना होगा।”
व्यास जी ने माता की आज्ञा स्वीकार की। उस समय नियोग प्रथा प्रचलित थी, जिसके अनुसार राज्य की रक्षा के लिए यह आवश्यक था।
पहले व्यास जी अंबिका के पास गए। अंबिका ने व्यास जी का तेजस्वी रूप देखकर डर के कारण अपनी आंखें बंद कर लीं। इस कारण जो पुत्र जन्मा, वह जन्म से ही अंधा था। इस पुत्र का नाम धृतराष्ट्र रखा गया।
फिर व्यास जी अंबालिका के पास गए। अंबालिका ने व्यास जी को देखकर भय के कारण अपना मुंह पीला कर लिया। इस कारण जो पुत्र जन्मा, उसका रंग पीला था। इस पुत्र का नाम पांडु रखा गया।
सत्यवती को लगा कि दोनों पुत्रों में कुछ न कुछ कमी है। धृतराष्ट्र अंधे होने के कारण राजा नहीं बन सकते थे, और पांडु का स्वास्थ्य ठीक नहीं था। इसलिए उन्होंने व्यास जी से तीसरी बार प्रार्थना की।
इस बार अंबिका ने अपनी दासी को भेजा। दासी ने व्यास जी का सम्मान किया और बिना किसी भय के उनकी सेवा की। इससे जो पुत्र जन्मा, वह अत्यंत बुद्धिमान और धर्मज्ञ था। इस पुत्र का नाम विदुर रखा गया।
समय बीतने के साथ तीनों भाई बड़े हुए। धृतराष्ट्र अंधे होने के बावजूद बहुत बलवान थे। उनमें हजार हाथियों का बल था। पांडु एक कुशल धनुर्धर और न्यायप्रिय राजा बने। विदुर सबसे बुद्धिमान थे और धर्म के ज्ञाता थे।
जब राज्याभिषेक का समय आया, तो धृतराष्ट्र के अंधे होने के कारण पांडु को राजा बनाया गया। धृतराष्ट्र को यह बात अच्छी नहीं लगी, लेकिन विदुर ने समझाया कि “भैया, राज्य की भलाई सबसे पहले आती है। पांडु एक योग्य राजा हैं।”
पांडु ने बहुत अच्छा राज्य किया। उन्होंने कई युद्ध जीते और राज्य का विस्तार किया। धृतराष्ट्र का विवाह गांधारी से हुआ, जिन्होंने अपने पति के अंधेपन के कारण आजीवन आंखों पर पट्टी बांधी। पांडु का विवाह कुंती और माद्री से हुआ।
विदुर ने हमेशा दोनों भाइयों को सही सलाह दी। वे धर्म और न्याय के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देते रहे। जब भी कोई कठिन परिस्थिति आती, तो दोनों भाई विदुर से सलाह लेते थे।
एक दिन पांडु शिकार खेलने गए। वहां उन्होंने एक ऋषि और उनकी पत्नी को हिरण का रूप समझकर बाण मार दिया। मरते समय ऋषि ने श्राप दिया कि यदि पांडु कभी अपनी पत्नी के पास जाएंगे तो उनकी मृत्यु हो जाएगी।
इस श्राप के कारण पांडु ने राज्य त्याग दिया और वन में तपस्या करने चले गए। अब धृतराष्ट्र को राज्य की जिम्मेदारी संभालनी पड़ी। विदुर ने उनकी हर तरह से सहायता की।
वन में पांडु की पत्नी कुंती ने देवताओं से पांच पुत्र प्राप्त किए – युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल और सहदेव। ये पांच भाई पांडव कहलाए। धृतराष्ट्र के सौ पुत्र हुए, जो कौरव कहलाए।
जब पांडव हस्तिनापुर आए, तो विदुर ने उनका स्वागत किया। उन्होंने हमेशा पांडवों का साथ दिया क्योंकि वे धर्म के पक्ष में थे। धृतराष्ट्र अपने पुत्रों से अधिक प्रेम करते थे, जिससे भविष्य में समस्याएं आईं।
विदुर ने हमेशा धृतराष्ट्र को समझाने की कोशिश की कि वे पांडवों और कौरवों के साथ समान व्यवहार करें। उन्होंने कहा, “राजा धृतराष्ट्र, न्याय और धर्म से बड़ा कुछ नहीं है। सभी बच्चों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए।”
लेकिन धृतराष्ट्र अपने पुत्र दुर्योधन के प्रभाव में आकर गलत निर्णय लेते रहे। विदुर ने अंत तक उन्हें सही राह दिखाने की कोशिश की।
शिक्षा: इस कहानी से हमें सीख मिलती है कि जन्म से मिली कमियां हमारी सफलता में बाधक नहीं होतीं। धृतराष्ट्र अंधे थे फिर भी बलवान थे, पांडु का रंग पीला था फिर भी वे महान राजा बने, और विदुर दासी पुत्र होकर भी सबसे बुद्धिमान थे। सच्चा गुण व्यक्ति के कर्मों में होता है, जन्म में नहीं। हमें हमेशा धर्म और न्याय का साथ देना चाहिए, चाहे परिस्थिति कैसी भी हो।








