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यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार – कृष्ण की लीला
बहुत समय पहले की बात है, जब भगवान श्रीकृष्ण छोटे बालक थे और वृंदावन में अपनी माता यशोदा के साथ रहते थे। उस समय एक अद्भुत घटना घटी जिसे यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार के नाम से जाना जाता है।
वृंदावन के बाहर दो विशाल अर्जुन के पेड़ खड़े थे। ये कोई साधारण वृक्ष नहीं थे, बल्कि कुबेर के दो पुत्र नलकूबर और मणिग्रीव थे जो श्राप के कारण वृक्ष बन गए थे। कभी ये दोनों बहुत अहंकारी और धन के मद में चूर थे।
एक दिन देवर्षि नारद जी ने इन दोनों को गंगा में नग्न अवस्था में खेलते देखा था। उनके अहंकार और अशिष्टता को देखकर नारद जी ने उन्हें श्राप दिया था – “तुम दोनों वृक्ष बनकर अपने अहंकार का फल भोगोगे।”
परंतु नारद जी दयालु थे। उन्होंने यह भी कहा था – “जब स्वयं भगवान विष्णु के अवतार तुम्हें स्पर्श करेंगे, तभी तुम्हें मुक्ति मिलेगी।”
वर्षों बीत गए। नलकूबर और मणिग्रीव यमलार्जुन वृक्षों के रूप में खड़े रहे और भगवान के दर्शन की प्रतीक्षा करते रहे। वे जानते थे कि केवल भगवान ही उनका उद्धार कर सकते हैं।
एक दिन छोटे कृष्ण अपनी माता यशोदा की नजरों से बचकर मक्खन चुराने में व्यस्त थे। माता यशोदा ने उन्हें पकड़ लिया और प्रेम से डांटते हुए कहा – “कन्हैया! तुम कितने शैतान हो। अब मैं तुम्हें इस ओखली से बांधती हूं।”
यशोदा मैया ने प्रेम से कृष्ण को एक भारी ओखली से बांध दिया। छोटे कृष्ण ने सोचा कि यह तो खेल का समय है। वे ओखली को घसीटते हुए बाहर निकले।
जब कृष्ण उन दो यमलार्जुन वृक्षों के पास पहुंचे, तो ओखली दोनों पेड़ों के बीच फंस गई। कृष्ण ने जोर लगाया और अचानक एक जोरदार आवाज के साथ दोनों विशाल वृक्ष जमीन पर गिर गए।
यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार हो गया था। वृक्षों के गिरते ही दो सुंदर दिव्य पुरुष प्रकट हुए – नलकूबर और मणिग्रीव। वे अपने मूल रूप में वापस आ गए थे।
दोनों भाइयों ने भगवान कृष्ण के चरणों में प्रणाम किया। नलकूबर ने कहा – “हे प्रभु! आपकी कृपा से हमें इस श्राप से मुक्ति मिली है।”
मणिग्रीव ने भी हाथ जोड़कर कहा – “हे भगवन! हमने अपने अहंकार के कारण यह दुख भोगा। अब हम समझ गए हैं कि धन और सुंदरता का अहंकार कितना हानिकारक है।”
छोटे कृष्ण मुस्कराए और बोले – “तुम दोनों ने अपनी गलती को समझ लिया है। अब जाओ और सदैव विनम्र रहकर भगवान की भक्ति करो।”
दोनों भाई कृष्ण की स्तुति करते हुए अपने लोक को चले गए। इस प्रकार यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार संपन्न हुआ।
जब यशोदा मैया को पता चला कि दो विशाल पेड़ गिर गए हैं और उनका छोटा कन्हैया सुरक्षित है, तो वे आश्चर्यचकित रह गईं। उन्होंने कृष्ण को गले लगाया और समझ गईं कि उनका लाल कोई साधारण बालक नहीं है।
इस घटना से पूरे वृंदावन में चर्चा हुई। सभी ग्रामीण समझ गए कि कृष्ण में दिव्य शक्ति है। वे सभी कृष्ण की लीला पर मुग्ध हो गए।
इस कथा से हमें यह शिक्षा मिलती है कि अहंकार हमेशा पतन का कारण बनता है। धन, सुंदरता या किसी भी चीज का अहंकार हमें गलत राह पर ले जाता है। परंतु यदि हम अपनी गलती को समझ जाएं और सच्चे मन से भगवान से क्षमा मांगें, तो भगवान हमेशा हमारी रक्षा करते हैं।
भगवान कृष्ण की यह लीला हमें सिखाती है कि प्रभु की कृपा से कोई भी कष्ट से मुक्ति पा सकता है। यमलार्जुन वृक्षों का उद्धार इस बात का प्रमाण है कि भगवान अपने भक्तों की सदैव रक्षा करते हैं और उन्हें सही राह दिखाते हैं।














